शुभ मुहूर्त में जन्म या सुरक्षित प्रसव?
पूरन चन्द्र शर्मा — विभूति फीचर्स
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पश्चिम बंगाल के कूचबिहार के कुछ सरकारी और निजी अस्पतालों में जन्माष्टमी के अवसर पर कुछ भावी माता-पिताओं ने अपनी संतान के जन्म का समय धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप निर्धारित करने की इच्छा जताई। कुछ परिवारों ने प्राकृतिक प्रसव की प्रतीक्षा करने के बजाय निर्धारित समय पर प्रसव कराने या सिजेरियन डिलीवरी के विकल्प को लेकर चिकित्सकों से चर्चा की।
इसके पीछे धार्मिक आस्था प्रमुख कारण बताई गई। मान्यता है कि जन्माष्टमी जैसे पवित्र दिन जन्म लेने वाली संतान पर भगवान श्रीकृष्ण का विशेष आशीर्वाद होता है। लेकिन इस पूरे विषय के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—क्या किसी शुभ तिथि या मुहूर्त के लिए प्रसव की प्राकृतिक प्रक्रिया को प्रभावित करना उचित है?
जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व
भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। श्रीकृष्ण का जन्म अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध धर्म की स्थापना का प्रतीक माना जाता है।
इसी आस्था के कारण अनेक परिवार जन्माष्टमी को विशेष अवसर मानते हैं। लेकिन धार्मिक आस्था के साथ यह समझना भी जरूरी है कि बच्चे का जन्म एक अत्यंत संवेदनशील जैविक और चिकित्सकीय प्रक्रिया है।
जन्म का समय कौन निर्धारित करता है?
भारतीय ज्योतिषीय परंपरा में जन्म को केवल तिथि और घड़ी की घटना नहीं माना गया है। इसे जीव के कर्म, गर्भावस्था, माता-पिता और प्रकृति की व्यापक व्यवस्था से जोड़कर देखा जाता है।
इसी दृष्टि से केवल किसी विशेष तिथि को प्राप्त करने के लिए प्राकृतिक प्रसव में अनावश्यक हस्तक्षेप करना उचित नहीं माना जा सकता। ज्योतिष समय की व्याख्या करने का माध्यम हो सकता है, लेकिन उसे प्रकृति और चिकित्सा की सीमाओं से ऊपर रखना उचित नहीं है।
यदि किसी चिकित्सकीय कारण से प्रसव की तिथि निर्धारित करना आवश्यक हो और डॉक्टर सुरक्षित समयावधि के एक से अधिक विकल्प दें, तो परिवार अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यता के अनुसार उपलब्ध सुरक्षित विकल्पों में से किसी समय का चयन कर सकता है। लेकिन इसमें प्राथमिकता हमेशा मां और बच्चे की सुरक्षा की होनी चाहिए।
क्या सिजेरियन से जन्मी कुंडली सही होती है?
सिजेरियन अथवा किसी अन्य चिकित्सकीय सहायता से जन्म लेने वाले बच्चे की जन्मकुंडली भी उसके वास्तविक जन्म के समय के आधार पर ही बनाई जाती है। यानी जिस क्षण शिशु का वास्तविक जन्म होता है, उसी क्षण की ग्रह-नक्षत्र स्थिति को कुंडली में दर्ज किया जाता है।
लेकिन केवल मनचाहा लग्न या नक्षत्र प्राप्त कर लेने से बच्चे के पूरे जीवन को अपनी इच्छा के अनुसार निर्धारित कर देना संभव नहीं है। ज्योतिषीय परंपरा में भी कुंडली के अध्ययन के लिए केवल लग्न नहीं, बल्कि ग्रहों की स्थिति, भाव, भावेश, दृष्टि, युति, नवांश, दशा और गोचर सहित अनेक पहलुओं पर विचार किया जाता है।
इसलिए किसी एक शुभ लग्न को देखकर प्रसव का समय निर्धारित कर देना और यह मान लेना कि इससे बच्चे का भविष्य पूरी तरह अनुकूल हो जाएगा, ज्योतिष की जटिल परंपरा को बहुत सरल बना देना होगा।
क्या जन्माष्टमी पर जन्म लेना अपने आप में अत्यंत शुभ है?
किसी बड़े धार्मिक पर्व पर बच्चे का जन्म परिवार के लिए निश्चित रूप से भावनात्मक और आध्यात्मिक खुशी का अवसर हो सकता है। जन्माष्टमी, रामनवमी या अक्षय तृतीया जैसे पर्वों से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन केवल किसी पर्व विशेष की तिथि पर जन्म लेने से हर बच्चे की कुंडली एक जैसी नहीं हो जाती। एक ही दिन अलग-अलग स्थानों और अलग-अलग समय पर जन्म लेने वाले बच्चों की ग्रहस्थितियां और लग्न अलग हो सकते हैं।
बच्चे का व्यक्तित्व और भविष्य केवल जन्मतिथि से निर्धारित नहीं होते। उसके संस्कार, शिक्षा, पारिवारिक वातावरण, स्वास्थ्य, परिस्थितियां, परिश्रम और निर्णय लेने की क्षमता भी जीवन को आकार देते हैं।
मूल नक्षत्र को लेकर भय कितना उचित?
समाज में मूल नक्षत्र को लेकर भी कई प्रकार की आशंकाएं देखने को मिलती हैं। कई परिवार चाहते हैं कि उनकी संतान का जन्म मूल नक्षत्र में न हो। हालांकि ज्योतिष की गंभीर व्याख्या में किसी एक नक्षत्र को पूरी तरह अशुभ मानना उचित नहीं माना जा सकता।
मूल नक्षत्र के अधिष्ठाता निरृति और स्वामी केतु माने जाते हैं। परंपरागत ज्योतिषीय व्याख्याओं में इसे जीवन के गहरे परिवर्तन, खोज और पुराने बंधनों से मुक्ति जैसी प्रवृत्तियों से भी जोड़ा जाता है। किसी व्यक्ति पर इसका प्रभाव समझने के लिए पूरी कुंडली का अध्ययन आवश्यक माना जाता है।
मूल सहित कुछ नक्षत्रों को परंपरा में गण्डमूल नक्षत्र कहा जाता है। ऐसे जन्म के बाद कुछ परिवार धार्मिक परंपरा के अनुसार गण्डमूल शांति संस्कार कराते हैं। इसे आस्था और मानसिक संतोष से जुड़ा धार्मिक संस्कार समझना चाहिए, न कि इस आधार पर किसी नवजात को अशुभ मान लेना चाहिए।
किसी बच्चे को उसके जन्म नक्षत्र के कारण अशुभ मानना न धार्मिक दृष्टि से उचित है और न मानवीय दृष्टि से।
चिकित्सा विज्ञान को क्यों मिलनी चाहिए सर्वोच्च प्राथमिकता?
प्रसव मां और शिशु दोनों के जीवन से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील प्रक्रिया है। सिजेरियन सेक्शन एक महत्वपूर्ण और कई परिस्थितियों में जीवनरक्षक चिकित्सा प्रक्रिया है। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इसे चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर ही किया जाना चाहिए। गैर-जरूरी सिजेरियन से मां और बच्चे दोनों को अल्पकालिक और दीर्घकालिक जोखिम हो सकते हैं।
ऐसी स्थिति में केवल किसी विशेष धार्मिक तिथि या मुहूर्त को प्राप्त करने के लिए ऑपरेशन का निर्णय लेना उचित नहीं होगा। प्रसव की वास्तविक स्थिति का आकलन स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।
गर्भावस्था की अवधि, भ्रूण की स्थिति, गर्भनाल से जुड़ी परिस्थितियां, मां का रक्तचाप, मधुमेह, पहले हुए ऑपरेशन तथा प्रसव के दौरान संभावित जटिलताओं जैसे कई चिकित्सकीय पहलुओं को ध्यान में रखना पड़ता है।
मुहूर्त हो, लेकिन चिकित्सा की सीमा के भीतर
धार्मिक आस्था और ज्योतिषीय विश्वास व्यक्ति के निजी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। इसलिए यदि चिकित्सक यह तय करते हैं कि प्रसव को किसी निश्चित समयावधि में सुरक्षित रूप से कराया जा सकता है और उस अवधि में एक से अधिक विकल्प उपलब्ध हैं, तो परिवार अपनी आस्था के अनुरूप उनमें से समय चुन सकता है।
लेकिन यदि डॉक्टर किसी विशेष समय को मां या बच्चे के लिए जोखिमपूर्ण मानते हैं, तो किसी भी धार्मिक मुहूर्त को प्राथमिकता देना उचित नहीं होगा।
ज्योतिष को चिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि सुरक्षित चिकित्सकीय सीमाओं के भीतर एक सांस्कृतिक या आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में देखना अधिक संतुलित दृष्टिकोण होगा।
सबसे शुभ मुहूर्त आखिर कौन-सा?
बच्चे का जन्म चाहे प्राकृतिक प्रसव से हो या सिजेरियन के माध्यम से, उसकी जन्मकुंडली उसके वास्तविक जन्म समय के आधार पर ही तैयार की जाएगी। लेकिन किसी मनचाही तिथि, लग्न या नक्षत्र को चुन लेने से संतान के पूरे जीवन को नियंत्रित करने की गारंटी नहीं मिल सकती।
इसलिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि बच्चा किस मुहूर्त में पैदा हुआ, बल्कि यह होना चाहिए कि बच्चे और मां दोनों सुरक्षित हैं या नहीं।
सबसे शुभ मुहूर्त वही है, जिसमें मां सुरक्षित रहे, शिशु स्वस्थ जन्म ले और प्रसव के लिए किसी अनावश्यक चिकित्सकीय जोखिम का सामना न करना पड़े।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का संदेश भी केवल एक तिथि से जुड़ा नहीं, बल्कि धर्म, विवेक और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने से जुड़ा है। ऐसे में जन्माष्टमी की आस्था का सम्मान करते हुए मां और शिशु के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देना ही सबसे विवेकपूर्ण निर्णय होगा।
