सोशल मीडिया पर पुस्तक मेला

Book fair on social media
 
सोशल मीडिया पर पुस्तक मेला

(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)   प्रति वर्ष राजधानी में विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाता है। पुस्तक-प्रेमियों के लिए यह एक वार्षिक पर्व की तरह मनाया जाने वाला उत्सव है। आठ-दस दिनों के इस आयोजन से पुस्तक-प्रेमियों को वास्तव में कितना लाभ होता है और कितना नहीं—यह शोध का विषय हो सकता है, किंतु इतना अवश्य है कि पुस्तक मेले में वर्षों से बिछुड़े लेखक आपस में मिल ही लेते हैं।

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जब से सोशल मीडिया प्रभावी हुआ है, तब से पुस्तक मेले का आकर्षण और भी बढ़ गया है। यह मैं नहीं कहता, सोशल मीडिया पर की जा रही पोस्टें स्वयं इसकी गवाही देती हैं। विभिन्न स्टॉलों से चाहे एक भी पुस्तक न खरीदी जाए, लेकिन रील बनाकर बड़े ही गंभीर भाव से पुस्तकों के कवर पेज निहारने के दृश्य यह बताने के लिए पर्याप्त होते हैं कि भले ही पुस्तक-मित्रों की संख्या न बढ़ी हो, पर फेसबुक पर स्वयं को पुस्तक-प्रेमी सिद्ध करने की होड़ अवश्य मच गई है।

वैसे तो देश के अनेक महानगरों में प्रति सप्ताह पुस्तकों के विमोचन समारोह आयोजित होते रहते हैं। लेखक होने का सुख क्या होता है, यह विमोचन समारोह में भली-भाँति ज्ञात हो जाता है—जब पुस्तक और लेखक की प्रशंसा में अनुप्रास अलंकार से युक्त स्तुति-गान सुनकर लेखक स्वयं ही भ्रमित हो जाता है कि अब तक उसे अपनी विशिष्टता का भान क्यों नहीं था।
इसके बाद भी दस-बीस प्रतियाँ छपवाने वाले लेखक के सामने पुस्तक-बिक्री का संकट जस का तस खड़ा रहता है।
वह दो-चार पुस्तकें मित्रों को उपहार स्वरूप देकर उनसे समीक्षा की विनती करता है, पर निष्कर्ष में कुछ भी हाथ नहीं लगता। समीक्षा बैठकों में पुस्तक पढ़ने के संकट पर गंभीर चर्चा होती है। साहित्यकारों का दर्द छलकता है कि अब पुस्तक पढ़ने वालों का अकाल पड़ गया है। कोई भी पुस्तक पढ़ने में अपना समय गंवाना नहीं चाहता। पाठक सोशल मीडिया पर ही आँखें गड़ाए रहता है।
फिर भी प्रश्न उठता है—जब पाठक कम हो रहे हैं, तो पुस्तक मेले में भीड़ कहाँ से आ रही है? महिलाएँ सोशल मीडिया पर प्रतिष्ठित प्रकाशन समूहों के बड़े लेखकों के साथ फोटो क्यों खिंचवा रही हैं? जब पुस्तक पढ़ने वालों की संख्या घट रही है, तब सैकड़ों प्रकाशन स्टॉलों पर नई-नई पुस्तकों के विमोचन कैसे हो रहे हैं?
कुछ फेसबुकियों द्वारा पुस्तक मेले में घूमने की तिथि सार्वजनिक रूप से घोषित करना और फिर उसके वीडियो पोस्ट करना यह आभास देता है कि किसी भी लेखक को प्रमाणित लेखक सिद्ध होने के लिए पुस्तक मेले में उपस्थिति दर्ज कराना अब अनिवार्य हो गया है।
एक बात तो तय है—भले ही पुस्तकों की बिक्री न हो, भले ही लेखक प्रकाशन के बाद रॉयल्टी न मिलने का दिन-रात रोना रोते रहें, लेकिन प्रकाशकों की संख्या दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से बढ़ती जा रही है। उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। यदि पाठकों की कमी के बावजूद प्रकाशन संस्थान बढ़ रहे हैं और पुस्तक मेले में लेखकों-पाठकों की भीड़ उमड़ रही है, तो इसे संसार का आठवाँ आश्चर्य न कहा जाए, तो और क्या कहा जाए?

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