Book Review: एल्गोरिद्म के दौर में कैसे सुरक्षित रहेगा 'डिजिटल बचपन'? डॉ. शैलेन्द्र श्रीवास्तव की नई किताब "Innocence at Risk" में छिपे हैं सटीक समाधान
विनायक फीचर्स / पुस्तक समीक्षा डेस्क (17 जून 2026):
कुछ दशक पहले तक बच्चों का बचपन स्कूल, खेल के मैदान, दादा-दादी की कहानियों और किताबों के इर्द-गिर्द बीता करता था। लेकिन आज की पीढ़ी का एक बहुत बड़ा संसार मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन के भीतर सिमट चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ऑनलाइन गेम्स, सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म्स ने बच्चों के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है। तकनीक की यह चमकीली दुनिया जहाँ असीमित अवसरों से भरी है, वहीं इसके पीछे ऐसे गहरे और अदृश्य खतरे भी छिपे हैं, जिन्हें बच्चे तो क्या, उनके माता-पिता भी अक्सर समझ नहीं पाते।
इसी प्रासंगिक और बेहद संवेदनशील विषय पर मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) डॉ. शैलेन्द्र श्रीवास्तव और उनकी अधिवक्ता पुत्री ऐश्वर्या श्रीवास्तव ने मिलकर एक बेहद महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है, जिसका नाम है— “Innocence at Risk: Protecting Children in the Age of Algorithms”। यह पुस्तक तकनीकी भूलभुलैया के बीच बच्चों के 'डिजिटल बचपन' को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बेहद सार्थक सामाजिक पहल है।
अपराध से पहले सजगता: लेखक का पुराना सरोकार
वरिष्ठ पत्रकार पवन वर्मा के अनुसार, डॉ. शैलेन्द्र श्रीवास्तव अपने 25 वर्षों से अधिक के पुलिस सेवा काल में हमेशा लीक से हटकर काम करने के लिए जाने जाते रहे हैं। अमूमन पुलिस अपराध घटित होने के बाद कानूनी एक्शन लेती है, लेकिन डॉ. श्रीवास्तव ने हमेशा अपराध की रोकथाम (Prevention) और जन-जागरूकता को अपनी प्राथमिकता माना। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका यह सामाजिक मिशन थमा नहीं है। दो पीढ़ियों (पिता और पुत्री) के दृष्टिकोण से लिखी गई यह पुस्तक पुलिस के जमीनी प्रशासनिक अनुभव और नई पीढ़ी की कानूनी व डिजिटल समझ का एक बेजोड़ और दुर्लभ संगम है।
खलनायक नहीं है तकनीक, पर बिना सुरक्षा सब कुछ है 'रिस्क'
इस पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसका संतुलित और व्यावहारिक नजरिया है। लेखकों ने डिजिटल तकनीक या इंटरनेट को किसी 'खलनायक' की तरह पेश कर बच्चों को डराने का प्रयास नहीं किया है। पुस्तक यह सहर्ष स्वीकार करती है कि इंटरनेट ने ज्ञान और प्रगति के नए द्वार खोले हैं। लेकिन, इसके साथ ही यह उन अनदेखे और अचर्चित खतरों का विस्तृत एक्सरे भी करती है, जिनसे बच्चे रोज अनजाने में घिर जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
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साइबर बुलिंग (Cyber Bullying) और ऑनलाइन ग्रूमिंग (Online Grooming)
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सेक्सटॉर्शन (Sextortion) और डिजिटल ब्लैकमेलिंग
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डीपफेक (Deepfake) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दुरुपयोग
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डेटा चोरी (Data Theft) और डार्क वेब (Dark Web) का जाल
किताब केवल इन खतरों का परिचय नहीं देती, बल्कि बहुत बारीकी से यह भी समझाती है कि इंटरनेट के पीछे काम करने वाले एल्गोरिद्म कैसे बच्चों को अपने चंगुल में फंसाते हैं।
तकनीकी समाधान के साथ मानवीय और मानसिक पक्ष पर जोर
आमतौर पर साइबर सुरक्षा से जुड़ी किताबों में जटिल कोडिंग और तकनीकी शब्दों की भरमार होती है, लेकिन "Innocence at Risk" इसका अपवाद है। यह पुस्तक समस्या के मानवीय और मानसिक पक्ष को बहुत संवेदनशीलता के साथ छूती है। लेखकों का मानना है कि ऑनलाइन शोषण या निजी तस्वीरों का दुरुपयोग केवल एक तकनीकी घटना नहीं है; इसका सीधा और गहरा असर बच्चे के आत्मविश्वास, उसके मानसिक स्वास्थ्य और उसके पूरे भविष्य पर पड़ता है।
संकट के बाद का 'रोडमैप':
यदि कोई बच्चा किसी डिजिटल फ्रॉड या साइबर अपराध का शिकार हो भी जाए, तो उसके बाद परिवार को क्या करना चाहिए? पुस्तक इस पर एक व्यावहारिक गाइडलाइन देती है। इसमें डिजिटल पहचान की मरम्मत (Digital Identity Repair), साक्ष्य संरक्षण (Evidence Preservation), कानूनी प्रक्रिया, मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल और बच्चे के सामाजिक पुनर्वास में माता-पिता की भूमिका को बेहद संजीदगी से समझाया गया है।
डिजिटल सुरक्षा अब विकल्प नहीं, अनिवार्य आवश्यकता
पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि आज के दौर में बच्चों को इंटरनेट सौंपने से पहले 'डिजिटल सुरक्षा' के नियम सिखाना बेहद जरूरी है; ठीक वैसे ही जैसे सड़क पर उतरने से पहले बच्चों को ट्रैफिक नियम सिखाए जाते हैं। यह पुस्तक केवल अभिभावकों के लिए नहीं, बल्कि शिक्षकों, स्कूलों, नीति-निर्माताओं और स्वयं बच्चों के लिए भी एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका (Practical Manual) का काम करती है।
समय की मांग: विद्यालयी पाठ्यक्रम का हिस्सा बने 'डिजिटल नागरिकता'
आज जब बच्चों का कोमल बचपन स्क्रीन, एल्गोरिद्म और एआई से संचालित हो रहा है, तब यह कृति समय की सबसे बड़ी मांग बनकर उभरी है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और शिक्षा मंत्रालय इस दिशा में ठोस कदम उठाएं। जिस प्रकार पर्यावरण, स्वास्थ्य और सड़क सुरक्षा को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया है, उसी प्रकार 'डिजिटल सुरक्षा और डिजिटल नागरिकता' (Digital Citizenship) को भी प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की कक्षाओं के सिलेबस में शामिल किया जाना चाहिए।
"Innocence at Risk" जैसी उपयोगी और जीवन रक्षक सामग्री देश के हर स्कूल और कॉलेज की लाइब्रेरी में अनिवार्य रूप से उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी डरे बिना, एक सजग, जिम्मेदार और सुरक्षित डिजिटल नागरिक के रूप में राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सके।
अपराध से पहले सजगता: लेखक का पुराना सरोकार
वरिष्ठ पत्रकार पवन वर्मा के अनुसार, डॉ. शैलेन्द्र श्रीवास्तव अपने 25 वर्षों से अधिक के पुलिस सेवा काल में हमेशा लीक से हटकर काम करने के लिए जाने जाते रहे हैं। अमूमन पुलिस अपराध घटित होने के बाद कानूनी एक्शन लेती है, लेकिन डॉ. श्रीवास्तव ने हमेशा अपराध की रोकथाम (Prevention) और जन-जागरूकता को अपनी प्राथमिकता माना। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका यह सामाजिक मिशन थमा नहीं है। दो पीढ़ियों (पिता और पुत्री) के दृष्टिकोण से लिखी गई यह पुस्तक पुलिस के जमीनी प्रशासनिक अनुभव और नई पीढ़ी की कानूनी व डिजिटल समझ का एक बेजोड़ और दुर्लभ संगम है।
खलनायक नहीं है तकनीक, पर बिना सुरक्षा सब कुछ है 'रिस्क'
इस पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसका संतुलित और व्यावहारिक नजरिया है। लेखकों ने डिजिटल तकनीक या इंटरनेट को किसी 'खलनायक' की तरह पेश कर बच्चों को डराने का प्रयास नहीं किया है। पुस्तक यह सहर्ष स्वीकार करती है कि इंटरनेट ने ज्ञान और प्रगति के नए द्वार खोले हैं। लेकिन, इसके साथ ही यह उन अनदेखे और अचर्चित खतरों का विस्तृत एक्सरे भी करती है, जिनसे बच्चे रोज अनजाने में घिर जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
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साइबर बुलिंग (Cyber Bullying) और ऑनलाइन ग्रूमिंग (Online Grooming)
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सेक्सटॉर्शन (Sextortion) और डिजिटल ब्लैकमेलिंग
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डीपफेक (Deepfake) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दुरुपयोग
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डेटा चोरी (Data Theft) और डार्क वेब (Dark Web) का जाल
किताब केवल इन खतरों का परिचय नहीं देती, बल्कि बहुत बारीकी से यह भी समझाती है कि इंटरनेट के पीछे काम करने वाले एल्गोरिद्म कैसे बच्चों को अपने चंगुल में फंसाते हैं।
तकनीकी समाधान के साथ मानवीय और मानसिक पक्ष पर जोर
आमतौर पर साइबर सुरक्षा से जुड़ी किताबों में जटिल कोडिंग और तकनीकी शब्दों की भरमार होती है, लेकिन "Innocence at Risk" इसका अपवाद है। यह पुस्तक समस्या के मानवीय और मानसिक पक्ष को बहुत संवेदनशीलता के साथ छूती है। लेखकों का मानना है कि ऑनलाइन शोषण या निजी तस्वीरों का दुरुपयोग केवल एक तकनीकी घटना नहीं है; इसका सीधा और गहरा असर बच्चे के आत्मविश्वास, उसके मानसिक स्वास्थ्य और उसके पूरे भविष्य पर पड़ता है।
संकट के बाद का 'रोडमैप':
यदि कोई बच्चा किसी डिजिटल फ्रॉड या साइबर अपराध का शिकार हो भी जाए, तो उसके बाद परिवार को क्या करना चाहिए? पुस्तक इस पर एक व्यावहारिक गाइडलाइन देती है। इसमें डिजिटल पहचान की मरम्मत (Digital Identity Repair), साक्ष्य संरक्षण (Evidence Preservation), कानूनी प्रक्रिया, मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल और बच्चे के सामाजिक पुनर्वास में माता-पिता की भूमिका को बेहद संजीदगी से समझाया गया है।
डिजिटल सुरक्षा अब विकल्प नहीं, अनिवार्य आवश्यकता
पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि आज के दौर में बच्चों को इंटरनेट सौंपने से पहले 'डिजिटल सुरक्षा' के नियम सिखाना बेहद जरूरी है; ठीक वैसे ही जैसे सड़क पर उतरने से पहले बच्चों को ट्रैफिक नियम सिखाए जाते हैं। यह पुस्तक केवल अभिभावकों के लिए नहीं, बल्कि शिक्षकों, स्कूलों, नीति-निर्माताओं और स्वयं बच्चों के लिए भी एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका (Practical Manual) का काम करती है।
समय की मांग: विद्यालयी पाठ्यक्रम का हिस्सा बने 'डिजिटल नागरिकता'
आज जब बच्चों का कोमल बचपन स्क्रीन, एल्गोरिद्म और एआई से संचालित हो रहा है, तब यह कृति समय की सबसे बड़ी मांग बनकर उभरी है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और शिक्षा मंत्रालय इस दिशा में ठोस कदम उठाएं। जिस प्रकार पर्यावरण, स्वास्थ्य और सड़क सुरक्षा को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया है, उसी प्रकार 'डिजिटल सुरक्षा और डिजिटल नागरिकता' (Digital Citizenship) को भी प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की कक्षाओं के सिलेबस में शामिल किया जाना चाहिए।
"Innocence at Risk" जैसी उपयोगी और जीवन रक्षक सामग्री देश के हर स्कूल और कॉलेज की लाइब्रेरी में अनिवार्य रूप से उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी डरे बिना, एक सजग, जिम्मेदार और सुरक्षित डिजिटल नागरिक के रूप में राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सके।
