Border Security: सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकीय बदलाव पर केंद्र सख्त; घुसपैठ की जांच के लिए जस्टिस प्रभाकर नवलकर समिति गठित, एनआरसी की उठी मांग

Border Security: Centre takes a firm stand on demographic changes in border districts; Justice Prabhakar Navalkar Committee constituted to probe infiltration; demands for NRC raised.
 
संगठित घुसपैठ और स्थानीय पहचान पर संकट रक्षा मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल, मेघालय, त्रिपुरा और असम जैसे सीमावर्ती राज्यों में अवैध घुसपैठ कराने वाले तत्व एक सोचे-समझे और संगठित नेटवर्क के रूप में काम कर रहे हैं। यही कारण है कि भारत की सीमा में प्रवेश करते ही इन अवैध प्रवासियों के स्थानीय पहचान पत्र, मतदाता पहचान पत्र और पासपोर्ट तक आसानी से बन जाते हैं। रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिए पूर्वोत्तर राज्यों के स्थानीय सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहे हैं।  इसके अतिरिक्त, चीन और नेपाल की सीमाओं के रास्ते घुसपैठियों के मददगारों, प्रभावशाली विदेशी माफियाओं और अराजक तत्वों का प्रवेश होता है, जिन्हें कथित तौर पर कुछ स्थानीय राजनेताओं का संरक्षण भी मिल जाता है। यही सिंडिकेट इन घुसपैठियों को देश के विभिन्न महानगरों में संगठित श्रमिकों के रूप में फैला देता है।  पूर्व रक्षा अधिकारी का जमीनी अनुभव: कैसी है सीमा की जमीनी हकीकत? रक्षा मंत्रालय के पूर्व उपनिदेशक इंजी. कवि अतिवीर जैन "पराग" ने रक्षा सेवा के दौरान बेंगडुब्बी में अपनी पोस्टिंग के समय के जमीनी अनुभवों को साझा किया है:  नेपाल सीमा का मिजाज: नेपाल और भारत की सीमा पर आवाजाही पूरी तरह सामान्य है, जैसे एक गांव से दूसरे गांव जाना हो। वहां के सीमावर्ती बाजारों में नेपाली और भारतीय मुद्रा समान रूप से चलन में हैं।  बांग्लादेश सीमा की चुनौतियां: सिलीगुड़ी, न्यू जलपाईगुड़ी और बिनागुड़ी जैसे क्षेत्रों में भारत-बांग्लादेश सीमा का एक बड़ा हिस्सा नदियों, गड्ढों और छोटी पहाड़ियों से घिरा है, जहां कई जगहों पर न तो कटीले तार (Fencing) हैं और न ही सुरक्षा बलों की पर्याप्त तैनाती। इस भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर रोजमर्रा के सामान, बर्तनों, साइकिलों और मवेशियों की तस्करी व अवैध आवाजाही सामान्य बात रही है।  बंगाल में सत्ता परिवर्तन से 'चिकन नेक' कॉरिडोर में आई तेजी भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने का काम साल 1986 से चल रहा है और अधिकांश राज्यों में यह पूरा भी हो चुका है। हालांकि, पश्चिम बंगाल के रणनीतिक रूप से संवेदनशील 'चिकन नेक' (सिलीगुड़ी गलियारे) में यह काम लंबे समय से अटका हुआ था।  लेखक के अनुसार, पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार द्वारा सीमा सुरक्षा बल (BSF) को तारबंदी के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध नहीं कराई जा रही थी। परंतु, पश्चिम बंगाल में हुए हालिया सत्ता परिवर्तन के बाद नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तत्परता दिखाते हुए केंद्र सरकार को आवश्यक भूमि हस्तांतरित कर दी है, जिसके बाद अब इस बचे हुए महत्वपूर्ण सीमा क्षेत्र में कटीले तार लगाने का कार्य युद्धस्तर पर शुरू हो गया है।  मणिपुर हिंसा और 50 किमी का बीएसएफ क्षेत्राधिकार सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जब केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले क्षेत्रों की सुरक्षा और तलाशी का अधिकार बीएसएफ को सौंपने का नियम बनाया था, तब भी कुछ राज्य सरकारों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। सीमा सुरक्षा में ढील का ही परिणाम था कि वर्ष 2021 में म्यांमार में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद हजारों की संख्या में चिन-कुकी प्रवासियों ने मणिपुर में अवैध प्रवेश किया, जिसने आगे चलकर मैतई और कुकी समुदाय के बीच हुए भीषण हिंसक संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार की।  विशेषज्ञों का सुझाव: कड़े प्रशासनिक कदमों और NRC की आवश्यकता जस्टिस नवलकर समिति के निष्कर्षों से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आने की उम्मीद है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों और प्रबुद्ध वर्ग की ओर से अब कुछ कड़े प्रशासनिक सुझाव और मांगें उठने लगी हैं:  तत्काल एनआरसी (NRC): देश के सभी सीमावर्ती राज्यों में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की प्रक्रिया तुरंत शुरू कर अवैध नागरिकों की पहचान की जानी चाहिए।  सीधे निर्वासन की कार्रवाई: लंबी जांच समितियों के बजाय सीमावर्ती जिलों के स्थानीय प्रशासन को सीधे आदेश दिए जाएं कि अवैध प्रवासियों को चिन्हित कर तुरंत सीमा पार भेजा जाए (जैसा कि अमेरिका ने हाल ही में अवैध प्रवासियों को वापस भेजकर किया था)।  मददगारों पर सख्त कार्रवाई: घुसपैठियों को आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक संरक्षण देने वाले स्थानीय तत्वों को चिन्हित कर उनके खिलाफ रासुका या जेल जैसी कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो।  स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट: पूरी सीमा पर आधुनिक कटीले तार, थर्मल सेंसर, नाइट-विज़न कैमरे लगाए जाएं और सुरक्षा बलों को अवैध रूप से सीमा पार करने की कोशिश करने वाले तत्वों पर सख्त कार्रवाई करने की पूरी छूट दी जाए।

(इंजी. कवि अतिवीर जैन "पराग"-विनायक फीचर्स) (16 जून 2026):

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यस्तताओं से मुक्त होते ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। गृह मंत्रालय ने भारत के सीमावर्ती जिलों में तेजी से हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Shift) को गंभीरता से लेते हुए इसके समाधान के लिए गठित एक उच्च स्तरीय समिति की महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक बुलाई।

उल्लेखनीय है कि इस जनसांख्यिकीय बदलाव का गहन अध्ययन करने के लिए केंद्र सरकार ने 26 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्त‍िस प्रभाकर नवलकर की अध्यक्षता में एक विशेष समिति का गठन किया है। यह समिति एक वर्ष के भीतर अपनी विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपेगी।

संगठित घुसपैठ और स्थानीय पहचान पर संकट

रक्षा मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल, मेघालय, त्रिपुरा और असम जैसे सीमावर्ती राज्यों में अवैध घुसपैठ कराने वाले तत्व एक सोचे-समझे और संगठित नेटवर्क के रूप में काम कर रहे हैं। यही कारण है कि भारत की सीमा में प्रवेश करते ही इन अवैध प्रवासियों के स्थानीय पहचान पत्र, मतदाता पहचान पत्र और पासपोर्ट तक आसानी से बन जाते हैं। रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिए पूर्वोत्तर राज्यों के स्थानीय सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहे हैं।

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इसके अतिरिक्त, चीन और नेपाल की सीमाओं के रास्ते घुसपैठियों के मददगारों, प्रभावशाली विदेशी माफियाओं और अराजक तत्वों का प्रवेश होता है, जिन्हें कथित तौर पर कुछ स्थानीय राजनेताओं का संरक्षण भी मिल जाता है। यही सिंडिकेट इन घुसपैठियों को देश के विभिन्न महानगरों में संगठित श्रमिकों के रूप में फैला देता है।

पूर्व रक्षा अधिकारी का जमीनी अनुभव: कैसी है सीमा की जमीनी हकीकत?

रक्षा मंत्रालय के पूर्व उपनिदेशक इंजी. कवि अतिवीर जैन "पराग" ने रक्षा सेवा के दौरान बेंगडुब्बी में अपनी पोस्टिंग के समय के जमीनी अनुभवों को साझा किया है:

  • नेपाल सीमा का मिजाज: नेपाल और भारत की सीमा पर आवाजाही पूरी तरह सामान्य है, जैसे एक गांव से दूसरे गांव जाना हो। वहां के सीमावर्ती बाजारों में नेपाली और भारतीय मुद्रा समान रूप से चलन में हैं।

  • बांग्लादेश सीमा की चुनौतियां: सिलीगुड़ी, न्यू जलपाईगुड़ी और बिनागुड़ी जैसे क्षेत्रों में भारत-बांग्लादेश सीमा का एक बड़ा हिस्सा नदियों, गड्ढों और छोटी पहाड़ियों से घिरा है, जहां कई जगहों पर न तो कटीले तार (Fencing) हैं और न ही सुरक्षा बलों की पर्याप्त तैनाती। इस भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर रोजमर्रा के सामान, बर्तनों, साइकिलों और मवेशियों की तस्करी व अवैध आवाजाही सामान्य बात रही है।

बंगाल में सत्ता परिवर्तन से 'चिकन नेक' कॉरिडोर में आई तेजी

भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने का काम साल 1986 से चल रहा है और अधिकांश राज्यों में यह पूरा भी हो चुका है। हालांकि, पश्चिम बंगाल के रणनीतिक रूप से संवेदनशील 'चिकन नेक' (सिलीगुड़ी गलियारे) में यह काम लंबे समय से अटका हुआ था।

लेखक के अनुसार, पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार द्वारा सीमा सुरक्षा बल (BSF) को तारबंदी के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध नहीं कराई जा रही थी। परंतु, पश्चिम बंगाल में हुए हालिया सत्ता परिवर्तन के बाद नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तत्परता दिखाते हुए केंद्र सरकार को आवश्यक भूमि हस्तांतरित कर दी है, जिसके बाद अब इस बचे हुए महत्वपूर्ण सीमा क्षेत्र में कटीले तार लगाने का कार्य युद्धस्तर पर शुरू हो गया है।

मणिपुर हिंसा और 50 किमी का बीएसएफ क्षेत्राधिकार

सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जब केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले क्षेत्रों की सुरक्षा और तलाशी का अधिकार बीएसएफ को सौंपने का नियम बनाया था, तब भी कुछ राज्य सरकारों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। सीमा सुरक्षा में ढील का ही परिणाम था कि वर्ष 2021 में म्यांमार में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद हजारों की संख्या में चिन-कुकी प्रवासियों ने मणिपुर में अवैध प्रवेश किया, जिसने आगे चलकर मैतई और कुकी समुदाय के बीच हुए भीषण हिंसक संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार की।

विशेषज्ञों का सुझाव: कड़े प्रशासनिक कदमों और NRC की आवश्यकता

जस्टिस नवलकर समिति के निष्कर्षों से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आने की उम्मीद है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों और प्रबुद्ध वर्ग की ओर से अब कुछ कड़े प्रशासनिक सुझाव और मांगें उठने लगी हैं:

  1. तत्काल एनआरसी (NRC): देश के सभी सीमावर्ती राज्यों में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की प्रक्रिया तुरंत शुरू कर अवैध नागरिकों की पहचान की जानी चाहिए।

  2. सीधे निर्वासन की कार्रवाई: लंबी जांच समितियों के बजाय सीमावर्ती जिलों के स्थानीय प्रशासन को सीधे आदेश दिए जाएं कि अवैध प्रवासियों को चिन्हित कर तुरंत सीमा पार भेजा जाए (जैसा कि अमेरिका ने हाल ही में अवैध प्रवासियों को वापस भेजकर किया था)।

  3. मददगारों पर सख्त कार्रवाई: घुसपैठियों को आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक संरक्षण देने वाले स्थानीय तत्वों को चिन्हित कर उनके खिलाफ रासुका या जेल जैसी कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो।

  4. स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट: पूरी सीमा पर आधुनिक कटीले तार, थर्मल सेंसर, नाइट-विज़न कैमरे लगाए जाएं और सुरक्षा बलों को अवैध रूप से सीमा पार करने की कोशिश करने वाले तत्वों पर सख्त कार्रवाई करने की पूरी छूट दी जाए।

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