ब्रिक्स सम्मेलन में भारत-ईरान सांस्कृतिक विरासत की झलक, सदियों पुराने रिश्तों की फिर जगी स्मृतियां

Glimpse of India-Iran cultural heritage at the BRICS summit; memories of centuries-old ties rekindled.
 
ब्रिक्स सम्मेलन में भारत-ईरान सांस्कृतिक विरासत की झलक, सदियों पुराने रिश्तों की फिर जगी स्मृतियां

ओंकारेश्वर पाण्डेय-विनायक फीचर्स)

नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने जहां वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बहुपक्षीय सहयोग से जुड़े मुद्दों को केंद्र में रखा, वहीं इसके आसपास दिखाई दी सांस्कृतिक गतिविधियों ने भारत और ईरान के सदियों पुराने संबंधों की याद भी ताजा कर दी। भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स से जुड़े कार्यक्रमों और प्रदर्शनों में ईरानी संस्कृति की मौजूदगी ने इस रिश्ते के उस पक्ष को सामने रखा, जो केवल कूटनीतिक समझौतों तक सीमित नहीं है।

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय परिस्थितियों पर भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पेजेशकियान के बीच BRICS सम्मेलन के दौरान हुई बैठक में द्विपक्षीय सहयोग, बहुपक्षीय मंचों पर साझेदारी और पश्चिम एशिया की स्थिति जैसे मुद्दे उठे।

राष्ट्रपति पेजेशकियान की पुत्री जहरा पेजेशकियान और उनके पति हसन मजीदी की दिल्ली में सांस्कृतिक स्थलों और BRICS से जुड़े कार्यक्रमों में मौजूदगी ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। जहरा पेजेशकियान ने भारतीय कला और शिल्प में रुचि दिखाई।

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रिश्ते सिर्फ राजनयिक दस्तावेजों में नहीं

भारत और ईरान के संबंधों को केवल आधुनिक राजनयिक इतिहास के संदर्भ में देखना इस रिश्ते की गहराई को सीमित कर देगा। दोनों सभ्यताओं के बीच संपर्क व्यापार, भाषा, कला, साहित्य, धर्म, दर्शन और समुद्री मार्गों के जरिए बहुत पुराने समय से विकसित होता रहा है।

सिंधु सभ्यता और पश्चिमी एशिया के बीच व्यापारिक संपर्कों के पुरातात्विक प्रमाण इस व्यापक संपर्क की ओर संकेत करते हैं। अरब सागर और फारस की खाड़ी प्राचीन काल में वस्तुओं के साथ-साथ विचारों और सांस्कृतिक प्रभावों के आवागमन के महत्वपूर्ण मार्ग रहे होंगे।

भारत से मसाले, वस्त्र और हस्तशिल्प जैसी वस्तुएं पश्चिमी एशिया तक पहुंचती थीं, जबकि दूसरी दिशा से धातु, कीमती पत्थर और अन्य वस्तुओं का व्यापार होता था। व्यापार के साथ भाषाएं, प्रतीक, तकनीक और जीवन-पद्धतियां भी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचती रहीं।

संस्कृत और प्राचीन ईरानी भाषाओं की समानताएं

भारत और ईरान के सभ्यतागत रिश्ते की चर्चा में भाषाई समानताएं विशेष महत्व रखती हैं। संस्कृत और अवेस्ता से जुड़ी प्राचीन ईरानी भाषाई परंपराओं में कई ऐसे शब्द और ध्वन्यात्मक समानताएं मिलती हैं, जिन्हें इंडो-ईरानी भाषाई विरासत के संदर्भ में देखा जाता है।

‘सप्त’ और अवेस्ताई ‘हप्त’ जैसे शब्दों की समानता इस साझा भाषाई विरासत का उदाहरण मानी जाती है। इसी प्रकार ‘ऋत’ और ‘अशा’ जैसे विचार नैतिक और ब्रह्मांडीय व्यवस्था की अवधारणाओं से जुड़े रहे हैं।

यह समानता इस बात की ओर संकेत करती है कि भारतीय और ईरानी भाषाई-सांस्कृतिक परंपराओं की कुछ जड़ें एक साझा प्राचीन विरासत में रही हैं। हालांकि समय के साथ दोनों क्षेत्रों की धार्मिक और सामाजिक अवधारणाओं ने अपनी अलग-अलग दिशाएं भी विकसित कीं।

अग्नि और प्रकाश की सांस्कृतिक स्मृति

वैदिक परंपरा में अग्नि का विशेष महत्व है, वहीं प्राचीन ईरानी धार्मिक परंपरा में ‘आतश’ यानी पवित्र अग्नि की अपनी विशिष्ट भूमिका रही है। दोनों परंपराओं में अग्नि को प्रकाश, पवित्रता और धार्मिक अनुष्ठान से जोड़कर देखा गया।

इसी तरह नवरोज जैसे ईरानी सांस्कृतिक पर्व और भारत में ऋतु परिवर्तन तथा नवजीवन से जुड़े वसंतोत्सवों में सांस्कृतिक समानताओं की चर्चा की जाती रही है। भारत में पारसी समुदाय ने ईरानी सांस्कृतिक विरासत की अनेक परंपराओं को पीढ़ियों तक जीवित रखा।

पारसी समुदाय ने भारतीय समाज में उद्योग, शिक्षा, विज्ञान, कानून, पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया। यह भारत की उस सामाजिक परंपरा का उदाहरण है जिसमें बाहर से आए समुदायों ने स्थानीय समाज के साथ संवाद करते हुए अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को भी बनाए रखा।

गांधार से जंदिशापुर तक संवाद

भारत-ईरान संपर्क का प्रभाव बौद्ध काल और उसके बाद भी दिखाई देता है। गांधार कला में भारतीय बौद्ध विषयों के साथ यूनानी और पश्चिमी एशियाई कलात्मक प्रभावों का मिश्रण दिखाई देता है। यह क्षेत्र प्राचीन भारत, मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण केंद्र था।

ईरान के जंदिशापुर जैसे ज्ञान केंद्रों में यूनानी, ईरानी और भारतीय चिकित्सा परंपराओं के बीच संपर्क की चर्चा भी इतिहास में मिलती है। इससे पता चलता है कि प्राचीन दुनिया में ज्ञान की सीमाएं आज की राष्ट्रीय सीमाओं जैसी कठोर नहीं थीं।

पंचतंत्र से शतरंज तक

भारत और ईरान के सांस्कृतिक संपर्क की एक प्रसिद्ध मिसाल पंचतंत्र की कथाएं हैं। भारतीय नीति-कथाओं का पहलवी और फिर अरबी भाषा में प्रसार हुआ और बाद में उनका प्रभाव यूरोप तक पहुंचा।

इसी प्रकार भारतीय चतुरंग से विकसित शतरंज की परंपरा ने ईरान में नया रूप लिया और आगे चलकर यह खेल पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि सभ्यताओं के बीच संवाद केवल राजाओं और सेनाओं के माध्यम से नहीं, बल्कि कहानियों, खेलों और ज्ञान की यात्रा के जरिए भी होता है।

फारसी और भारतीय भाषाओं का संवाद

मध्यकालीन भारत में फारसी प्रशासन, साहित्य और राजनय की महत्वपूर्ण भाषा बनी। लेकिन भारतीय भाषाओं का विकास इसके समानांतर जारी रहा। अवधी, ब्रज, पंजाबी, बंगाली, मराठी, तमिल, कन्नड़ और अन्य भाषाओं में इसी दौर में महत्वपूर्ण साहित्य रचा गया।

भारतीय भाषाओं में फारसी और अरबी मूल के अनेक शब्द भी आए। बाजार, दरवाजा, सड़क, कागज, सरकार, दफ्तर, दुनिया और खबर जैसे शब्द आज भारतीय भाषाओं के सामान्य शब्दकोश का हिस्सा हैं।

यह भाषाई आदान-प्रदान किसी एक संस्कृति की दूसरी पर विजय की कहानी नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक संपर्क और सह-अस्तित्व की प्रक्रिया को दर्शाता है।

अमीर खुसरो से सूफी-भक्ति संवाद तक

भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत की चर्चा अमीर खुसरो के बिना अधूरी रहती है। भारतीय परिवेश में जन्मे खुसरो ने फारसी और हिंदवी दोनों में रचनाएं कीं और संगीत की भारतीय परंपराओं के विकास में भी योगदान दिया।

सूफी परंपरा और भारतीय भक्ति आंदोलन के बीच संवाद ने भी उपमहाद्वीप की संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया। रूमी, सादी और हाफिज की कविताओं में मानवता, प्रेम और आध्यात्मिक एकता के विचार दिखाई देते हैं। भारतीय परंपरा में कबीर और अन्य संत कवियों ने भी बाहरी विभाजनों से ऊपर उठकर मनुष्य और सत्य को केंद्र में रखा।

इन परंपराओं के बीच सीधे प्रभाव या समानता का दावा करने से पहले ऐतिहासिक संदर्भों को समझना जरूरी है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि प्रेम, करुणा, मानव एकता और आध्यात्मिक संवाद जैसे विषय दोनों सभ्यताओं की साहित्यिक स्मृतियों में महत्वपूर्ण रहे हैं।

टैगोर और ईरान

भारत-ईरान सांस्कृतिक संवाद आधुनिक काल में भी जारी रहा। रवींद्रनाथ ठाकुर की 1932 की ईरान यात्रा इस संपर्क की महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है। फारसी साहित्य की महान परंपरा से उनका परिचय और ईरान के सांस्कृतिक वातावरण का अनुभव भारत और ईरान के साहित्यिक संबंधों को नई दृष्टि देता है।

जवाहरलाल नेहरू ने भी भारत और ईरान के ऐतिहासिक संबंधों की निकटता को रेखांकित किया था। यह निकटता किसी राजनीतिक गठजोड़ से अधिक व्यापक सांस्कृतिक स्मृति पर आधारित थी।

संस्कृति का सम्मान, नीतियों से अलग सवाल

भारत और ईरान के संबंधों को केवल पश्चिम के विरुद्ध किसी कथित पूर्वी एकता के रूप में देखना इतिहास को सरल बनाना होगा। दोनों देशों के बीच संबंधों में सहयोग के साथ-साथ अलग-अलग समय में मतभेद और बदलती राजनीतिक परिस्थितियां भी रही हैं।

किसी देश की संस्कृति, कला और साहित्य का सम्मान करना उसकी सरकार की हर नीति का समर्थन करना नहीं होता। इसी तरह किसी सरकार की किसी नीति की आलोचना को उस देश की जनता या संस्कृति के प्रति विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

भारत और ईरान के बीच वर्तमान संबंधों में रणनीतिक और आर्थिक हित भी महत्वपूर्ण हैं। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक संपर्क का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। भारत सरकार भी चाबहार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को द्विपक्षीय संबंधों के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गिनाती रही है।

BRICS ने दिया नई पीढ़ी को संवाद का अवसर

2026 का BRICS सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक बाधाओं, आपूर्ति श्रृंखला और क्षेत्रीय संघर्ष जैसी चुनौतियों से गुजर रही है। सम्मेलन में भारत ने संवाद और बहुपक्षीय सहयोग पर जोर दिया, जबकि भारत और ईरान के बीच उच्चस्तरीय वार्ता ने दोनों देशों के रिश्तों को समकालीन संदर्भ भी दिया।

ऐसे में सांस्कृतिक प्रदर्शनियां केवल सजावटी आयोजन नहीं हैं। वे यह समझाने का माध्यम बन सकती हैं कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल रणनीतिक हितों से नहीं बनते। साहित्य, कला, भोजन, संगीत, हस्तशिल्प और शिक्षा भी देशों के बीच भरोसे की जमीन तैयार करते हैं।

भारत और ईरान के रिश्तों को भविष्य में और मजबूत करना है तो सांस्कृतिक संवाद को संस्थागत रूप देना उपयोगी होगा। दोनों देशों के विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग, फारसी और भारतीय भाषाओं के अध्ययन को बढ़ावा, साझा पुरातात्विक अनुसंधान, साहित्यिक कृतियों के अनुवाद तथा ऐतिहासिक व्यापार मार्गों पर संयुक्त अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

सभ्यताओं की असली ताकत संवाद में है

BRICS के मंच पर दिखाई देने वाली ईरानी कला और संस्कृति हमें अतीत की ओर देखने का अवसर देती है, लेकिन उसका महत्व केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारत और ईरान का इतिहास बताता है कि सभ्यताएं जब एक-दूसरे से संवाद करती हैं तो वे अपनी पहचान खोती नहीं, बल्कि कई बार और समृद्ध होती हैं।

सभ्यताओं की महानता उनकी कथित शुद्धता में नहीं, बल्कि संवाद की क्षमता में होती है। भारत और ईरान के बीच सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक आवाजाही इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

आज जरूरत इस बात की है कि इन साझा स्मृतियों को केवल संग्रहालयों, पुस्तकों और समारोहों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि शिक्षा, शोध, पर्यटन, कला और युवा संवाद के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। यही अतीत की विरासत को भविष्य की साझेदारी में बदलने का रास्ता हो सकता है।

(ओंकारेश्वर पाण्डेय-विनायक फीचर्स)

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