EC विवाद पर बृज भूषण शरण सिंह का बड़ा बयान, चुनावी व्यवस्था की तुलना हिटलर के दौर से की
नई दिल्ली। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने देश की चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर टिप्पणी करते हुए मौजूदा परिस्थितियों की तुलना हिटलर के दौर से की।
बृज भूषण शरण सिंह ने कहा, “देश में हिटलर जैसी तानाशाही थी, लेकिन तब भी...” उनके इस बयान को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर चल रही राजनीतिक बहस से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, हिटलर के दौर से की गई यह तुलना बृज भूषण शरण सिंह की राजनीतिक टिप्पणी है और इसे किसी ऐतिहासिक या कानूनी निष्कर्ष के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
चुनाव आयोग को लेकर जारी है विवाद
दरअसल, चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दलों तथा अन्य पक्षों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। हाल के दिनों में इस मुद्दे को लेकर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंची हैं। 5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है। SIR को लेकर आयोग की ओर से प्रक्रिया में कुछ बदलाव और अतिरिक्त सुविधाओं की जानकारी भी दी गई है।
2023 के घटनाक्रम का भी किया जिक्र
बृज भूषण शरण सिंह ने अपने बयान में चुनाव आयोग से जुड़े 2023 के घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा था। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर एक अंतरिम व्यवस्था निर्धारित की थी। इसके बाद संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 बनाया। इस कानून की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित रही हैं।
बयान को राजनीतिक संदर्भ में देखना जरूरी
बृज भूषण शरण सिंह की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सार्वजनिक एवं राजनीतिक बहस तेज है। इस पूरे विवाद में अलग-अलग राजनीतिक दलों और पक्षों के अलग-अलग मत हैं। ऐसे में उनके बयान को राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देखना उचित होगा। हिटलर के दौर से की गई तुलना को तथ्यात्मक या कानूनी निष्कर्ष मानने के बजाय पूरे बयान और उसके राजनीतिक संदर्भ को साथ में देखना जरूरी है।
