वर्तमान वैश्विक संघर्ष के युग में बुद्ध की प्रासंगिकता

The relevance of Buddha in the current era of global conflict
 
वर्तमान वैश्विक संघर्ष के युग में बुद्ध की प्रासंगिकता

(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विभूति फीचर्स)

मानव सभ्यता का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि वह इतिहास से सीखने के बजाय बार-बार वही भूलें दोहराती रहती है। आज दुनिया भर में फैलती बारूदी गंध, ढहते शहर और युद्ध की भयावह सुर्खियाँ अब असाधारण नहीं रह गईं—वे वैश्विक दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी हैं। समाचारों में अब युद्ध “घटनाएँ” नहीं, बल्कि “अपडेट” बन गए हैं।

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महाभारत मात्र 18 दिनों में समाप्त हो गया था। कलिंग का युद्ध भी एक वर्ष में इतिहास बन गया। परंतु 21वीं सदी में युद्ध शुरू तो होते हैं, पर समाप्त नहीं होते। शांति की जमीन पर चलने वाले राष्ट्र भी युद्ध की सीमा रेखाओं पर खड़े दिखाई दे रहे हैं—चीन और ताइवान इसका उदाहरण हैं, जबकि दोनों ही बौद्ध संस्कृति से जुड़े समाज हैं। ऐसे अशांत दौर में बुद्ध का दर्शन धुंध को चीरती हुई रोशनी की तरह उभरता है—पुराना होते हुए भी पूरी तरह वर्तमान, प्राचीन होते हुए भी पूर्णतः प्रासंगिक।

बुद्ध की शिक्षा आज क्यों आवश्यक है?

बुद्ध ने मनुष्य को युद्ध के मैदान से बाहर निकलने का नहीं, बल्कि “भीतर के युद्ध” को समाप्त करने का मार्ग बताया। आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि हथियार शांति ला सकते हैं। Buddha कहते हैं—
“हिंसा हिंसा को जन्म देती है, यह एक अंतहीन चक्र है।”​​​​​​​ आज के वैश्विक संघर्षों का विश्लेषण बताता है कि हर बदले के पीछे एक नया बदला छिपा होता है। हर बंदूक के पीछे कोई घायल मन खड़ा होता है जिसे विश्वास दिलाया जाता है कि दूसरे का विनाश ही उसकी सुरक्षा है।

अहंकार—हर युद्ध की जड़

बुद्ध ने अहंकार को हिंसा का मूल कारण बताया।यह न सीमाएँ पहचानता है, न धर्म-वंश, न झंडे।अहंकार हर मन में पलता है और अवसर मिलते ही पूरे समाज को जला देता है। आज तकनीक अविश्वसनीय गति से बढ़ गई है, पर मनुष्य का विवेक पीछे छूट गया है। हथियार बिजली की गति से चलने लगे हैं, जबकि समझ अभी भी पैदल चल रही है।

दुःख को समझने की कला

बुद्ध की शिक्षाओं में दुःख को स्वीकार करने और समझने का विज्ञान छिपा है। आधुनिक दुनिया दुःख से बचना चाहती है, उसे छिपाती है।परंतु मन के भीतर छिपा दुःख ही बाहरी हिंसा का कारण बन जाता है। यदि मनुष्य अपने दुख को पहचान ले, तो वह दूसरे के दुख को भी समझने लगता है—यही समझ युद्धों को रोकने की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है।

वर्तमान संघर्षों में बुद्ध का संदेश क्यों जरूरी है?

बुद्ध का दर्शन आज किसी आस्था का उपदेश नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की व्यावहारिक आवश्यकता बन गया है।हिंसा का बीज मनुष्य के भीतर उगता है, और दया की पहली कोंपल भी वहीं जन्म लेती है।जब तक मन का शुद्धिकरण नहीं होगा—युद्ध कभी समाप्त नहीं होंगे। आज के शासक शांति की बात तो करते हैं, लेकिन हथियारों के परीक्षण भी जारी रखते हैं। यह वही विरोधाभास है जिस पर बुद्ध मुस्करा देते।

युद्ध की “आवश्यकता” पर बुद्ध का प्रश्न

आज हर आक्रमण को “राष्ट्रीय आवश्यकता” बताकर जायज़ ठहराया जाता है। बुद्ध पूछते—यदि हिंसा आवश्यक है, तो शांति कब अनावश्यक घोषित हो जाएगी?” युद्ध को असाधारण घटना समझा जाता है, जबकि मनुष्य अपने भीतर रोज़ युद्ध रचता है। वही भीतर का युद्ध बाहरी संघर्षों को जन्म देता है।

आज बुद्ध की रोशनी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक

बुद्ध की प्रासंगिकता एक इतिहास का संदर्भ नहीं—यह वर्तमान की पुकार है, विवेक का आग्रह है और मानवता का अंतिम सहारा है।​​​​​​​हथियारों के ढेर से राष्ट्र मजबूत दिख सकते हैं, पर मनुष्य छोटा होता जाता है। और जब मनुष्य छोटा होने लगे—बुद्ध का मार्ग ही उसे पुनः बड़ा और मानवीय बना सकता है।

बुद्ध को केवल पढ़ने से नहीं—जीने से शांति आएगी

सिर्फ मंदिर जाने से बुद्ध नहीं समझे जा सकते।उनके विचारों को राजनीति, नेतृत्व चयन, निर्णय-प्रक्रिया और जनमानस की सोच में उतरना होगा।वर्तमान वैश्विक संकट में बुद्ध की शिक्षाएँ केवल समाधान नहीं— विश्व शांति का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता हैं।

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