कनाडा को खालिस्तानी चरमपंथ पर सख्ती की चेतावनी: रिपोर्ट में पाकिस्तान जैसे हालात की आशंका
आज हम बात करने जा रहे हैं एक ऐसे मुद्दे की जो न सिर्फ भारत-कनाडा relation को influence कर रहा है, बल्कि कनाडा की आंतरिक सुरक्षा को भी खतरे में डाल सकता है। कनाडा को चेतावनी दी है कि अगर खालिस्तानी एक्सट्रीमिस्ट्स पर सख्ती न की गई, तो देश पाकिस्तान जैसे हालातों का सामना कर सकता है। यह रिपोर्ट किसकी है? क्या कह रही है? और इससे भारत को क्या फायदा या नुकसान?
सबसे पहले आइए समझते हैं कि यह रिपोर्ट आखिर है क्या। यह रिपोर्ट कनाडा की एक प्रमुख थिंक टैंक या इंटेलिजेंस एनालिसिस से जुड़ी हुई है, जो हाल ही में जारी हुई है। रिपोर्ट का main focus है कनाडा में खालिस्तान आंदोलन के चरमपंथी elements पर। खालिस्तान मूवमेंट, जैसा कि आप जानते हैं, 1980 के दशक से चला आ रहा है, जब पंजाब में सिख अलगाववादियों ने स्वतंत्र खालिस्तान राज्य की मांग की। भारत ने इसे दबा दिया, लेकिन ये आंदोलन विदेशों में, खासकर कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में, सिख डायस्पोरा के बीच जिंदा हो गया। कनाडा में सिख कम्युनिटी बहुत बड़ी है - लगभग 8 लाख सिख यहां रहते हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब कुछ चरमपंथी ग्रुप्स, जैसे बाबर खालसा या सिख फॉर जस्टिस, हिंसा को बढ़ावा देते हैं। रिपोर्ट कहती है कि कनाडा सरकार की नरमी - मतलब इन्हें राजनीतिक अभिव्यक्ति का नाम देकर बचा लेना - देश को खतरनाक रास्ते पर ले जा रही है। क्यों ? क्योंकि यह चरमपंथ पाकिस्तान मॉडल की तरह फैल सकता है।
पाकिस्तान का example क्यों लिया गया है? पाकिस्तान लंबे समय से भारत विरोधी तत्वों को शरण देता रहा है। 1980-90 के दशक में, पाकिस्तान की ISI ने खालिस्तानी चरमपंथियों को ट्रेनिंग, हथियार और फंडिंग दी। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद, जब जर्नल सिंह जैसे लीडर्स मारे गए, तब भी पाकिस्तान ने इन एक्सट्रीमिस्ट्स को सपोर्ट किया। नतीजा? पंजाब में हजारों मौतें, बम ब्लास्ट और instability । रिपोर्ट चेतावनी देती है कि कनाडा अगर इसी तरह नरमी बरतता रहा, तो उसके यहां भी चरमपंथी नेटवर्क मजबूत हो जाएंगे। कनाडा में पहले से ही कई घटनाएं हो चुकी हैं। याद कीजिए 2023 का कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो का आरोप - उन्होंने कहा था कि भारत ने कनाडा के सिख एक्टिविस्ट हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में हाथ है। निज्जर को खालिस्तानी चरमपंथी माना जाता था, जो कनाडा में बाबर खालसा का लीडर था। भारत ने इसे खारिज किया और कहा कि कनाडा खुद एक्सट्रीमिस्ट्स को शरण दे रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा की लिबरल सरकार वोट बैंक के चक्कर में सिख कम्युनिटी को नाराज नहीं करना चाहती। सिख वोटर्स कनाडा की राजनीति में महत्वपूर्ण हैं, खासकर ब्रिटिश कोलंबिया और ओंटारियो में। लेकिन यह नरमी भारी पड़ रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खालिस्तानी ग्रुप्स अब ड्रग्स, मनी लॉन्ड्रिंग और आर्म्स ट्रैफिकिंग में शामिल हो रहे हैं। कनाडा के शहरों में गैंग वॉर हो रहे हैं, जहां खालिस्तानी एक्सट्रीमिस्ट्स पंजाबी गैंग्स से भिड़ रहे हैं। अगर यह नहीं रोका गया, तो कनाडा का समाज पाकिस्तान की तरह polarized हो जाएगा - एक तरफ कट्टरपंथ, दूसरी तरफ कानून का राज कमजोर। अब बात करते हैं भारत के नजरिए से। भारत लंबे समय से कनाडा से कह रहा है कि खालिस्तानी चरमपंथियों पर कार्रवाई करो। 2023 के डिप्लोमैटिक रो के बाद, दोनों देशों के रिश्ते ठंडे पड़े हैं। भारत ने कनाडा हाई कमिश्नर को निकाल दिया, वीजा पर रोक लगाई। रिपोर्ट भारत के पक्ष में आती दिख रही है, क्योंकि यह कहती है कि कनाडा को भारत जैसे सख्त कानून अपनाने चाहिए। लेकिन सवाल यह है - क्या कनाडा सुनेगा?
नंबर 1: खालिस्तानी ग्रुप्स को 'फॉरेन एजेंट्स' घोषित करो, जैसे अमेरिका ने कुछ को किया। नंबर 2: फंडिंग ट्रैक करो - रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान अभी भी इन ग्रुप्स को फंड करता है, कनाडा के जरिए। नंबर 3: सिख कम्युनिटी को एकजुट करो, लेकिन चरमपंथ को अलग करो। अगर नरमी जारी रही, तो कनाडा में आतंकी हमले बढ़ सकते हैं, जैसे 1985 का एयर इंडिया बॉम्बिंग, जिसमें 329 लोग मारे गए थे - वह भी खालिस्तानी चरमपंथ का नतीजा था। पाकिस्तान जैसे हालात का मतलब क्या है? पाकिस्तान में तालिबान, लश्कर-ए-तैयबा जैसे ग्रुप्स को शुरू में राजनीतिक स्पेस दिया गया, लेकिन बाद में वे कंट्रोल से बाहर हो गए। कनाडा में भी, रेफरेंडम जैसे इवेंट्स को अनुमति देकर, सरकार चरमपंथ को वैधता दे रही है। रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा की इंटेलिजेंस एजेंसी CSIS ने कई बार चेतावनी दी है, लेकिन राजनीतिक दबाव में कार्रवाई नहीं हो रही।
भारत की तरफ से, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल ही में कहा था कि कनाडा को 'टेररिस्ट्स को पॉलिटिशियंस' बनाने से बचना चाहिए। यह रिपोर्ट उसी दिशा में एक सपोर्ट है। लेकिन क्या होगा अगर कनाडा ने इसे इग्नोर किया? तो भारत-कनाडा ट्रेड डील रुकेगी, डिप्लोमेसी खराब होगी, और कनाडा की इमेज एक 'सेफ हेवन फॉर टेररिस्ट्स' बन जाएगी। सोशल मीडिया पर इस रिपोर्ट पर बहस छिड़ गई है। ट्विटर पर #KhalistanInCanada ट्रेंड कर रहा है। कुछ सिख एक्टिविस्ट्स कह रहे हैं कि यह रिपोर्ट भारत का प्रोपगैंडा है, जबकि कनाडियन जर्नलिस्ट्स मानते हैं कि समस्या रियल है। एक सर्वे के मुताबिक, 60% कनाडियन अब खालिस्तानी मुद्दे से चिंतित हैं। भारत में, यह न्यूज चैनलों पर हेडलाइन बनी हुई है। 1984 का ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद के दंगे सिख कम्युनिटी के लिए दर्दनाक हैं। लेकिन चरमपंथ ने पंजाब को बर्बाद कर दिया। कनाडा को सीख लेनी चाहिए - नरमी से समस्या बढ़ती है, सख्ती से शांति आती है। रिपोर्ट सुझाव देती है कि कनाडा को भारत के साथ इंटेलिजेंस शेयरिंग बढ़ानी चाहिए। खालिस्तानी चरमपंथियों पर नरमी भारी पड़ेगी" - यह चेतावनी कनाडा के लिए है, लेकिन भारत के लिए भी एक संदेश। क्या लगता है आपको? कमेंट्स में बताएं।
