बच्चों को अवसाद के दुष्चक्र में धकेलता सीबीएसई का कार्पोरेट मॉडल

CBSE's Corporate Model Pushes Children into a Vicious Cycle of Depression
 
बच्चों को अवसाद के दुष्चक्र में धकेलता सीबीएसई का कार्पोरेट मॉडल

(अंजनी सक्सेना-विभूति फीचर्स)              

भारत का परीक्षा तंत्र आज जिस दौर से गुजर रहा है, उसे यदि केवल लापरवाह या अक्षम कह दिया जाए, तो यह इस तंत्र के असली और क्रूर चरित्र को छुपाने जैसा होगा। सच तो यह है कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) और अब केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) का निष्ठुर,संवेदनहीन चेहरा इस वर्ष देश के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। देश का भविष्य कहे जाने वाले छात्र आज एक ऐसे अनवरत और सुनियोजित अवसाद के दुष्चक्र में फंसे हैं, जहाँ से निकलने का हर रास्ता बंद दिखाई देता है। यह अवसाद तीन स्तरों पर छात्रों और उनके अभिभावकों को लील रहा है।

पहले देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट  के पेपर लीक और उसमें हुई ऐतिहासिक धांधली ने  साल भर रात-दिन एक करने वाले बच्चों के भरोसे को सरेबाज़ार नीलाम कर दिया। बच्चे अभी इस सदमे से संभल भी नहीं पाए थे कि सीबीएसई की 12 वीं की बोर्ड परीक्षा के मूल्यांकन में अपनाई गई अप्रत्याशित और मशीनी कठोरता ने लाखों होनहार छात्रों को मानसिक रूप से तोड़कर रख दिया। इसके बाद, जब अपनी न्यायसंगत मांग और अंकों में सुधार की आखिरी उम्मीद लेकर छात्र सीबीएसई के पास पहुँचे, तो बोर्ड ने 'री-चेकिंग' (पुनर्मूल्यांकन) के नाम पर फीस का एक ऐसा सामंती और कॉर्पोरेट जाल बिछा दिया, जिसने शिक्षा के बुनियादी सिद्धांतों की ही हत्या कर दी। यह त्रि-स्तरीय मार पहले पेपर लीक फिर कठोर मूल्यांकन और अंत में री-चेकिंग के नाम पर मोटी रकम की वसूली,भारतीय शिक्षा तंत्र के ऐसे व्यावसायिक अंधेपन को दर्शाती है, जिसने आज गरीब और अमीर के बीच की खाई को और अधिक चौड़ा कर दिया है।



         इस वर्ष सीबीएसई ने बड़े जोर-शोर और ढोल-नगाड़ों के साथ अपनी मूल्यांकन प्रणाली में आधुनिकता का समावेश करते हुए डिजिटल चेकिंग यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम को अनिवार्य रूप से लागू किया। बोर्ड का दावा था कि इस तकनीक से मानवीय गलतियां न्यूनतम होंगी, पारदर्शिता आएगी और परिणाम अधिक सटीक व त्वरित होंगे लेकिन धरातल पर इस मशीनी और निष्ठुर चेकिंग प्रक्रिया का असर बेहद खौफनाक और आत्मघाती रहा। डिजिटल स्क्रीन पर लगातार कॉपियां देखते-देखते परीक्षकों की मानवीय संवेदना और छात्रों के प्रति सहानुभूति पूरी तरह समाप्त हो गई। इस प्रणाली के तहत परीक्षकों पर एक निश्चित समय सीमा में दर्जनों कॉपियां जांचने का प्रशासनिक दबाव था, जिसके कारण उन्होंने उत्तरों की गहराई, छात्र की मौलिक सोच और तार्किकता को समझने का प्रयास ही नहीं किया। बोर्ड द्वारा प्रदान की गई एक रूखी आंसर की को अंतिम सत्य मानकर कंप्यूटर स्क्रीन पर लाल पेन चलाए गए। यदि छात्र का उत्तर शब्दशः उस कुंजी से मेल नहीं खाता था, तो उसे शून्य या बेहद कम अंक दिए गए।

इस यांत्रिक और संवेदनहीन मूल्यांकन का परिणाम यह हुआ कि जिन बच्चों को अपने साल भर के बेहतरीन प्रदर्शन और प्री-बोर्ड परीक्षाओं के आधार पर 90 से 95% अंकों की उम्मीद थी, वे 70% से 75% के बीच सिमट कर रह गए और 75 से 90 प्रतिशत की उम्मीद वाले 60 से 65 प्रतिशत पर ही अटका दिए गए। अंकों में आई यह अप्रत्याशित गिरावट केवल एक संख्यात्मक विफलता नहीं है, इसने छात्रों के करियर के सामने एक अभेद्य दीवार खड़ी कर दी है। भारत के उच्च शिक्षा ढांचे में, विशेषकर विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रों में, 12 वीं कक्षा के अंक केवल एक सर्टिफिकेट नहीं, बल्कि पात्रता की पहली अनिवार्य शर्त हैं। देश के सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों जैसे आईआईटी, एनआईटी और ट्रिपल आई टी (IIIT) में प्रवेश के लिए जेईई एडवांस्ड की परीक्षा पास करने के साथ-साथ 12 वीं बोर्ड में न्यूनतम 75% अंक होना अनिवार्य है। साथ ही अनेक यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में  सीएलसी राउंड में प्रवेश भी 12वीं के अंको के आधार पर प्रवेश देते हैं। 


       अब सीबीएसई की इस कठोर और त्रुटिपूर्ण डिजिटल चेकिंग के कारण हजारों ऐसे होनहार छात्र, जो जेईई मेंस और एडवांस्ड की कट-ऑफ को आसानी से पार करने की क्षमता रखते हैं, बोर्ड में 75% के इस जादुई आंकड़े से चूक गए। इसके कारण वे देश के शीर्ष कॉलेजों में एडमिशन की रेस से पूरी तरह बाहर हो गए हैं। कहने को तो सीबीएसई ने एक विषय में सुधार परीक्षा देने के विकल्प रखा है लेकिन एक विषय की परीक्षा देकर5 से 10 प्रतिशत अंको का अंतर पूरा करना मुश्किल है। यह सीधे तौर पर उन मेधावी बच्चों के भविष्य पर हमेशा के लिए ताला लगाने जैसा है जिन्होंने दो-तीन साल तक कड़े परिश्रम के साथ देश के सबसे कठिन एग्जाम की तैयारी की थी,और अब व्यवस्था की इस तकनीकी चूक के कारण उनका पूरा साल और करियर बर्बाद होने की कगार पर है।


          जब परिणाम घोषित हुए और देश भर के लाखों छात्रों ने देखा कि उनके अंक उनकी वास्तविक मेहनत और अपेक्षा से बहुत कम हैं, तो उनके भीतर व्यवस्था से न्याय पाने की एक उम्मीद जागी। वे छात्र चाहे अमीर घर के हों, मध्यमवर्गीय परिवार के हों, या किसी गरीब दिहाड़ी मजदूर के होनहार बच्चे,सभी को लगा कि सीबीएसई का री-चेकिंग सिस्टम उनकी कॉपियों के साथ न्याय करेगा। लेकिन सीबीएसई ने पुनर्मूल्यांकन की जो प्रक्रिया तैयार की है, वह वास्तव में किसी लोककल्याणकारी बोर्ड की व्यवस्था नहीं, बल्कि एक शुद्ध मुनाफा कमाने वाली कॉर्पोरेट कंपनी का राजस्व मॉडल दिखाई देती है। छात्रों और अभिभावकों की लाचारी का फायदा उठाने के लिए इस पूरी प्रक्रिया को तीन अत्यंत जटिल और महंगे चरणों में बांट दिया गया है, जिसे पार करना किसी भी आम परिवार के लिए वित्तीय रूप से असंभव बना दिया गया है। इस व्यवस्था में कोई भी छात्र सीधे अपनी कॉपी का पुनर्मूल्यांकन नहीं करवा सकता। उसे इस पूरे चक्रव्यूह से चरणबद्ध तरीके से गुजरना ही पड़ता है।


       इस शुरुआती चरण में छात्र को केवल इस बात के लिए प्रति विषय 500 रुपए की राशि का भुगतान करना होता है कि कंप्यूटर या परीक्षक ने अंकों को जोड़ने में कोई गलती तो नहीं की। इस प्रक्रिया में उत्तरों को दोबारा नहीं जांचा जाता, सिर्फ टोटलिंग री-चेक की जाती है। सोचिए, जिस टोटलिंग को करने में आज के युग में सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल हो रहा है, उस महज एक क्लिक की प्रक्रिया के लिए छात्रों से करोड़ों रुपए वसूल लिए जाते हैं। यदि छात्र पहले चरण की फीस की औपचारिकता पूरी कर लेता है, तभी वह अपनी जांची गई कॉपी को देखने के लिए पात्र होता है। इसके लिए उसे प्रति विषय फिर से 700 रुपए की अतिरिक्त फीस देनी पड़ती है। यानी, जो परीक्षा छात्र ने खुद दी है, जो उत्तर उसने साल भर अपने खून-पसीने से लिखे हैं, अपनी ही उस कृति को केवल एक पीडीएफ या डिजिटल फोटोकॉपी के रूप में देखने के लिए उसे बोर्ड की तिजोरी भरनी पड़ती है, जबकि इस बार के चैकिंग पैटर्न में पीडीएफ पहले से ही उपलब्ध है।


        अपनी कॉपी की फोटोकॉपी मिलने के बाद, यदि छात्र को किसी शिक्षक या विशेषज्ञ की मदद से यह पता चलता है कि परीक्षक ने किसी प्रश्न को पूरी तरह गलत जांचा है या सही उत्तर पर भी कम नंबर दिए हैं, तब वह असली पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर सकता है। लेकिन यहाँ खेल और भी अधिक क्रूर हो जाता है। यहाँ पूरी कॉपी दोबारा नहीं जांची जाती,यहां छात्र को प्रति प्रश्न (पर क्वेश्चन) 100 रुपए का अलग से भुगतान करना होता है। यदि किसी छात्र को गणित, भौतिकी या अर्थशास्त्र जैसे विषयों में 10 प्रश्नों पर आपत्ति है, तो उसे सिर्फ एक विषय के लिए 1000 रुपए अलग से देने होंगे। इस त्रि-स्तरीय लूट तंत्र को अगर गणितीय रूप से समझा जाए, तो एक छात्र को अगर अपने केवल तीन मुख्य विषयों (जैसे फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स) की कॉपियों को पूरी तरह चुनौती देनी हो, तो उसका कुल खर्च पांच हजार से लेकर आठ हजार के बीच बैठता है। क्या एक आम भारतीय परिवार के लिए,यह रकम मामूली है?
         यहाँ आकर यह व्यवस्था अमीर और गरीब के बीच एक स्पष्ट और खतरनाक विभाजन पैदा कर देती है।

एक संपन्न परिवार का बच्चा, अगर उसके नंबर कम आते हैं, तो उसके माता-पिता बिना सोचे-समझे हजारों रुपए ऑनलाइन ट्रांसफर करते हैं और री-चेकिंग के तीनों चरणों को पार कर लेते हैं। कई मामलों में देखा गया है कि री-चेकिंग के बाद बच्चों के 10 से 15 नंबर तक बढ़ जाते हैं, जो उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी या अन्य शीर्ष कॉलेजों की कट-ऑफ लिस्ट में शामिल करवा देते हैं। दूसरी तरफ, उस गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चे की कल्पना कीजिए, जिसके पिता दिहाड़ी मजदूर हैं या किसी छोटे से दफ्तर में क्लर्क हैं। उस बच्चे ने रात-रात पढ़ाई की, अपनी आंखों की रोशनी धुंधली की और किताबें मांग कर पढ़ीं,उसके माता पिता ने स्कूल की फीस भरने के लिए ओवर टाइम किया, अपने दैनिक खर्चों में कटौती की। जब उसका रिजल्ट आता है और वह देखता है कि वह 75 परसेंट के जादुई आंकड़े से महज 2 या 3 नंबर से चूक गया है, तो उसके पास रोने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। जब वह अपने लाचार पिता से कहता है कि "पापा, मेरी कॉपी दोबारा चेक करवा दो, मुझे भरोसा है मेरे नंबर बढ़ेंगे," तो पिता अपनी खाली जेब देखकर सिहर जाता है। वह सोचता है कि महीने भर का राशन खरीदे, घर का किराया दे या बोर्ड के इस महंगे व्यापार का हिस्सा बने। परिणाम यह होता है कि वह गरीब बच्चा सिर्फ पांच हजार रुपए न होने के कारण रेस से बाहर हो जाता है। यह मेधा का मर्डर है, जिसे यह भ्रष्ट और संवेदनहीन सिस्टम बेहद कानूनी और तकनीकी तरीके से अंजाम देता है।


     सीबीएसई की इस प्रशासनिक मार से पहले, देश का युवा एक और बड़े सदमे से गुजर रहा था, जिसने भारत के परीक्षा तंत्र की साख को पूरी दुनिया में मटियामेट कर दिया। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) द्वारा आयोजित की जाने वाली देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट  में इस वर्ष जो कुछ भी हुआ, उसने परीक्षा तंत्र के दोगले और भ्रष्ट चरित्र को उजागर कर दिया। परीक्षा से पहले ही देश के विभिन्न राज्यों से पेपर लीक होने की खबरें आईं, लेकिन एनटीए हफ्तों तक इस सच को नकारता रहा और अपनी कमियों पर पर्दा डालता रहा। 


     एनटीए की इस घोर प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार ने देश के 24 लाख से अधिक छात्रों के भविष्य को दांव पर लगा दिया। जो छात्र दिन-रात एक करके, अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष कमरों में बंद होकर डॉक्टर बनने का सपना देख रहे थे, वे एनटीए के कारण दोबारा परीक्षा देने के लिए विवश हैं। नीट की परीक्षा में जिस तरह बार बार प्रश्नपत्र लीक हो रहे हैं उसने देश की संपूर्ण चिकित्सा शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एनटीए ने जिस तरह से बच्चों के सपनों और अभिभावकों की गाढ़ी कमाई को कॉर्पोरेट दलालों के हाथों नीलाम होने दिया, उसने देश के युवाओं को गहरे मानसिक अवसाद और निराशा के उस अंधकार में धकेल दिया, जहाँ से उबर पाना उनके लिए नामुमकिन साबित हो रहा है।


          जब हम नीट का पेपर लीक होना, सीबीएसई का अत्यधिक कठोर व मशीनी मूल्यांकन, पात्रता के कड़े नियम और फिर री-चेकिंग के नाम पर मोटी रकम वसूलने का धंधा,इन सभी कड़ियों को एक साथ जोड़कर देखते हैं तो यह केवल एक संयोग या सामान्य प्रशासनिक विफलता नहीं लगती। यह भारत के नए और उभरते हुए भविष्य को जानबूझकर अवसाद  के दलदल में धकेलने का एक बड़ा सामाजिक और मानसिक षड्यंत्र प्रतीत होता है। शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य होता है छात्रों के भीतर छिपी प्रतिभा को निखारना, उन्हें समाज के लिए एक संवेदनशील, तार्किक और सशक्त नागरिक बनाना। लेकिन आज हमारा परीक्षा सिस्टम एक 'फिल्टर मशीन' बन चुका है, जिसका काम बच्चों का मूल्यांकन करना नहीं, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और किसी न किसी तकनीकी बहाने से रेस से बाहर धकेलना रह गया है।


       16 से 18 वर्ष की कोमल उम्र के बच्चे, जिनके भीतर देश को बदलने की ऊर्जा, नवीन विचार और बड़े सपने होने चाहिए, वे आज  न्याय की भीख मांग रहे हैं, सोशल मीडिया पर अपने हक के लिए रो रहे हैं और परीक्षा परिणामों के खौफ से आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं। कोटा से लेकर देश के अलग-अलग कोनों से हर साल आने वाली छात्रों की खुदकुशी की खबरें इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि हमारा परीक्षा तंत्र पूरी तरह से सड़ चुका है। यह तंत्र बच्चों को यह सिखाने में पूरी तरह नाकाम रहा है कि जीवन किसी परीक्षा या चंद नंबरों की मार्कशीट से बहुत बड़ा है। इसके विपरीत, सिस्टम ने परीक्षाओं को ही जीवन और मरण का सवाल बना दिया है। जब कोई बच्चा पूरी ईमानदारी से मेहनत करने के बाद भी व्यवस्था की कमियों, त्रुटियों और निष्ठुरता के कारण असफल या अपात्र घोषित कर दिया जाता है, तो उसके भीतर का हौसला हमेशा के लिए टूट जाता है। एक डरा हुआ, सहमा हुआ, खुद को दोषी मानने वाला और अवसाद से घिरा हुआ युवा कभी भी एक सशक्त, आत्मनिर्भर और नवप्रवर्तक भारत का निर्माण नहीं कर सकता। 
      अब प्रश्न यह भी है कि क्या यह नीतियां और व्यवस्थाएं जानबूझकर युवाओं की तार्किक, प्रगतिशील और विद्रोही सोच को कुचलकर उन्हें एक मूक उपभोक्ता बनाने के लिए तैयार की जा रही हैं? इस गंभीर प्रश्न पर आज पूरे देश को सोचने की आवश्यकता है।


              यह समय अब चुप रहने, तटस्थ बने रहने या यह सोचने का बिल्कुल नहीं है कि "मेरा बच्चा तो इस साल परीक्षा में नहीं बैठा, तो मुझे क्या फर्क पड़ता है।" आज अगर किसी और का होनहार बच्चा व्यवस्था की इस क्रूरता और कॉर्पोरेट लूट के कारण अवसाद में है, तो कल आपका बच्चा भी इसी क्रूर लाइन में खड़ा होने को मजबूर होगा। यह इस देश के हर नागरिक, हर शिक्षक, हर अभिभावक और हर जागरूक नीति नियंता के आत्ममंथन का समय है। बच्चों के आंसुओं और उनकी टूटती सांसों पर खड़ी की गई प्रशासनिक व्यवस्थाएं कभी लंबी नहीं चला करतीं। यदि हमें भारत के भविष्य को बचाना है, तो इस संपूर्ण परीक्षा और शिक्षा तंत्र के खिलाफ एक सामूहिक आवाज उठानी होगी और  व्यापक व क्रांतिकारी सुधारों को तुरंत लागू करने के लिए सरकार को विवश करना होगा।


  निशुल्क और सुलभ पुनर्मूल्यांकन किसी भी छात्र को अपनी कॉपी दोबारा जांचवाने का अधिकार पूरी तरह से निशुल्क और मौलिक अधिकार होना चाहिए। चूंकि वह पहले ही परीक्षा फीस भर चुका होता है इसलिए बोर्ड को  अपनी गलतियों को छुपाने और उसे अपनी कमाई का जरिया बनाने का यह कॉर्पोरेट धंधा तुरंत बंद करना होगा। परिणाम घोषित होते ही हर छात्र की उत्तर पुस्तिका ऑनलाइन पोर्टल पर मुफ्त में उपलब्ध कराई जानी चाहिए। यदि री-चेकिंग में अंकों में सुधार होता है, तो संबंधित लापरवाह परीक्षक पर भारी अनुशासनात्मक और आर्थिक जुर्माना लगाया जाना चाहिए।


  पात्रता नियमों में लचीलापन आईआईटी, एनआईटी और अन्य केंद्रीय संस्थानों में प्रवेश के लिए 12वीं बोर्ड में 75% की इस कठोर और यांत्रिक शर्त को तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए, या इस वर्ष के त्रुटिपूर्ण और कठिन डिजिटल मूल्यांकन को देखते हुए इसमें व्यापक ढील दी जानी चाहिए, ताकि जेईई पास करने वाले किसी भी मेधावी छात्र का साल व्यवस्था की गलती के कारण बर्बाद न हो।
  *परीक्षा सुरक्षा के कड़े कानून पेपर लीक और परीक्षा में होने वाली धांधली को एक गैर-जमानती और देशद्रोह जैसा गंभीर अपराध घोषित किया जाना चाहिए। इसमें शामिल अधिकारियों, दलालों और संस्थाओं को फास्ट-ट्रैक कोर्ट के माध्यम से तत्काल कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए । (विभूति फीचर्स)

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