15 साल बाद जनगणना: आँकड़ों से तय होगी अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज की नई दिशा
(सुभाष आनंद-विभूति फीचर्स)
आजादी के बाद हर 10 साल में होने वाली जनगणना इस बार 15 साल के लंबे अंतराल के बाद हो रही है। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। नियमों के मुताबिक अगली जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन कोरोना महामारी के चलते इसे टाल दिया गया। अब 2026 में देशभर में जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसे लेकर व्यापक स्तर पर तैयारियाँ चल रही हैं।
एक अनुमान के अनुसार भारत की आबादी अब लगभग 1.60 अरब के करीब पहुँच चुकी है। जनसंख्या के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर पहुँच गया है। लेकिन जिस गति से आबादी बढ़ी है, उसी अनुपात में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और आधारभूत ढाँचे का विस्तार नहीं हो सका।
विशेषज्ञों का मानना है कि माँग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ चुका है। बेरोजगारी की समस्या भी पिछले वर्षों में बढ़ी है। यदि समय रहते जनसंख्या नियंत्रण के लिए ठोस नीति नहीं बनाई गई, तो संसाधनों पर दबाव और अधिक बढ़ेगा तथा आम लोगों का जीवन प्रभावित होगा।

परिसीमन और राजनीति पर असर
इस जनगणना का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव परिसीमन पर पड़ने वाला है। 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटें बढ़ाने को लेकर चर्चा हुई थी, लेकिन विपक्ष ने माँग की थी कि नई जनगणना के आँकड़ों को आधार बनाया जाए।
अब 2026 की जनगणना के बाद संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन होगा। जिन राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी है, वहाँ सीटों की संख्या बढ़ सकती है। वहीं दक्षिण भारत के राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता का असर उनकी सीटों में कमी के रूप में सामने आ सकता है।
जातिगत जनगणना बनी सबसे बड़ा मुद्दा
इस बार की जनगणना की सबसे बड़ी विशेषता जातिगत आँकड़ों का संग्रह है। 1931 के बाद पहली बार देश में व्यापक स्तर पर जातिगत डेटा जुटाया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे ओबीसी, एससी, एसटी और अन्य वर्गों के लिए बेहतर योजनाएँ बनाने में मदद मिलेगी और सामाजिक न्याय मजबूत होगा।
हालाँकि आलोचकों का तर्क है कि इससे समाज में जातिगत विभाजन और बढ़ सकता है तथा आरक्षण की नई माँगें सामने आ सकती हैं। इसके बावजूद अधिकांश राजनीतिक दल मानते हैं कि नीति-निर्माण के लिए सही आँकड़े जरूरी हैं।
महिलाओं, शिक्षा और गरीबी की तस्वीर
2011 की जनगणना में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 907 से बढ़कर 921 हुई थी। अब नए आँकड़े बताएँगे कि “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों का कितना असर हुआ है। हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में लिंगानुपात अब भी चिंता का विषय बना हुआ है।
साक्षरता दर के नए आँकड़े भी महत्वपूर्ण होंगे। 2011 में केरल 94 प्रतिशत साक्षरता के साथ शीर्ष पर था, जबकि बिहार 61.8 प्रतिशत के साथ सबसे नीचे था। अब यह स्पष्ट होगा कि बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में शिक्षा के क्षेत्र में कितना सुधार हुआ है।
इसी तरह गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की वास्तविक स्थिति भी सामने आएगी। उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन और महिलाओं को आर्थिक सहायता जैसी योजनाओं का प्रभाव कितना पड़ा, इसका मूल्यांकन भी इन आँकड़ों से होगा।
जनगणना का इतिहास
भारत में जनगणना की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। पहला प्रयास 1865 से 1872 के बीच हुआ और 1881 में पहली बार पूरे अविभाजित भारत में एक साथ जनगणना कराई गई। आजादी के बाद 1951 में पहली जनगणना हुई और फिर हर 10 साल पर यह प्रक्रिया जारी रही।
1872 की जनगणना में केवल 17 सवाल पूछे गए थे। समय के साथ इसमें शिक्षा, रोजगार, पलायन, प्रजनन और दिव्यांगता जैसे विषय जुड़ते गए। जनगणना हमेशा देश और समाज की वास्तविक स्थिति का आईना रही है।
भविष्य की दिशा तय करेगी जनगणना
1997 में आई.के. गुजराल सरकार के समय संसद में जनसंख्या पर लंबी बहस हुई थी और सभी दलों ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा माना था। आज फिर वैसी ही गंभीर चर्चा की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर गंभीर प्रयास करें, तो अगले 10 से 15 वर्षों में जनसंख्या स्थिरता का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक असमानताओं जैसी समस्याओं के समाधान में भी मदद मिलेगी।
2026 की जनगणना केवल लोगों की गिनती नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का व्यापक आकलन है। यही आँकड़े आने वाले दशक की नीतियों की दिशा तय करेंगे। इसलिए इसका निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध होना बेहद आवश्यक है।
