आस्था और परंपरा के केंद्र: बाबा वैद्यनाथ और बासुकिनाथ

Centers of faith and tradition: Baba Baidyanath and Basukinath
 
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(पवन वर्मा – विभूति फीचर्स)

माघ माह की ठंडी सुबह। मकर संक्रांति का पुण्यकाल। होटल से बाहर निकलते ही यह भ्रम टूट जाता है कि ठंड के कारण भीड़ कम होगी। बाबा वैद्यनाथ धाम की ओर बढ़ते हुए साफ दिखता है कि आस्था मौसम नहीं देखती। मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा हुआ है। चारों ओर “जय बाबा वैद्यनाथ” और “जय मां पार्वती” के जयकारे गूंज रहे हैं। हवा में ठंड है, सांसों से भाप निकल रही है, लेकिन श्रद्धा की गर्माहट हर चेहरे पर साफ झलकती है।

कतारें लंबी हैं। कोई मौन में लीन है, कोई जप करता हुआ आगे बढ़ रहा है। कोई परिवार संग आया है, तो कोई अकेला। मकर संक्रांति पर बाबा धाम आने का भाव ही अलग होता है। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि विशेष पुण्यकाल माना जाता है। मान्यता है कि माघ मास में, विशेषकर संक्रांति के दिन किए गए दर्शन और पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि सुबह होते-होते देवघर में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती चली जाती है।

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बाबा और मां पार्वती का दिव्य सहअस्तित्व

बाबा वैद्यनाथ धाम का परिसर जितना भव्य है, उतना ही रहस्यमय भी। यहां देवाधिदेव महादेव बाबा वैद्यनाथ और मां पार्वती के मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं। यह केवल स्थापत्य का नहीं, बल्कि आस्था का सहअस्तित्व है। दोनों मंदिरों के शिखरों को जोड़ने वाली लाल डोर पहली बार देखने वाले हर श्रद्धालु को ठिठका देती है। यह लाल डोर केवल धागा नहीं, बल्कि शिव-शक्ति के अविभाज्य संबंध का प्रतीक मानी जाती है।

मंदिर शिखर पर चढ़कर यह डोर बांधने का कार्य कुछ पारंपरिक लोग ही करते हैं। वे जिस सहजता और संतुलन के साथ ऊंचाई पर चढ़ते हैं, उसे देखकर नीचे खड़े श्रद्धालुओं की सांसें थम जाती हैं। आंखें ऊपर टिकी रहती हैं और मन केवल एक ही प्रार्थना करता रहता है।

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देवघर की गलियां और मकर संक्रांति का स्वाद

मकर संक्रांति के कारण भीड़ अधिक है। श्रद्धालु ऊनी वस्त्रों में लिपटे हुए हैं, लेकिन मंदिर के भीतर पहुंचते ही ठंड का अहसास जैसे कम हो जाता है। दर्शन के बाद बाहर निकलते ही देवघर की गलियों का जीवन सामने आता है—जहां परंपरा और रोजमर्रा की जरूरतें एक-दूसरे में घुली हुई दिखती हैं।

मंदिर के आसपास प्रसाद, फूल, बेलपत्र और पूजा सामग्री की दुकानों की कतारें हैं। कई दुकानदार छोटी-छोटी अंगीठियों पर तिलकुट बना रहे हैं। धीमी आंच पर कूटे जाते तिल और गुड़ की खुशबू ठंड के बीच अलग ही सुकून देती है। श्रद्धालु रुक-रुक कर तिलकुट खरीदते हैं। यह मकर संक्रांति का स्वाद है—सादा, सरल और परंपरा से जुड़ा हुआ।

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दही-चूड़ा: सादगी में छिपा पर्व

बाबा धाम के बाहर एक और दृश्य ध्यान खींचता है। कई दुकानों पर कच्चा पोहा रखा हुआ है, लेकिन कहीं भी बना हुआ पोहा नहीं दिखता। पास ही मिट्टी की हांडी में दही रखा है। पूछने पर पता चलता है कि यह दही-चूड़ा है। पोहे में दही डालकर खाने की यह परंपरा बिहार और झारखंड में मकर संक्रांति से गहराई से जुड़ी है। इस दिन कई लोग दही-चूड़ा का आयोजन कर श्रद्धालुओं और मेहमानों को परोसते हैं। सादा भोजन, लेकिन परंपरा से भरपूर—जैसे पूरी तीर्थयात्रा का स्वभाव।

पेड़ा: देवघर की पहचान

देवघर में पेड़ा हर मौसम में मौजूद रहता है। माघ की ठंड में भी इसकी मांग कम नहीं होती। दुकानदार बताते हैं कि दर्शन के बाद लोग पेड़ा इसलिए लेते हैं क्योंकि यह आसानी से घर तक सुरक्षित पहुंच जाता है और प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। सादा, कम मीठा और टिकाऊ—शायद यही वजह है कि पेड़ा देवघर यात्रा का स्थायी साथी बन गया है।

देवघर से बासुकिनाथ की ओर

बाबा वैद्यनाथ के दर्शन के बाद अगला पड़ाव तय होता है—बाबा बासुकिनाथ। मान्यता है कि बाबा वैद्यनाथ के दर्शन बाबा बासुकिनाथ के बिना अधूरे माने जाते हैं। देवघर से निकलते ही ऐसे श्रद्धालु दिखाई देने लगते हैं जिनकी मंज़िल दो धाम हैं। शहर पीछे छूटता है और झारखंड का ग्रामीण दृश्य सामने आता है—खेत, छोटे गांव, सड़क किनारे चाय की दुकानें—सब कुछ यात्रा का हिस्सा बन जाता है।

घोरमारा: स्वाद और विरासत का पड़ाव

बासुकिनाथ मार्ग पर घोरमारा आते ही सड़क की रौनक बदल जाती है। यह गांव अपने पेड़ों के लिए प्रसिद्ध है। दुकानदार बताते हैं कि यहां कई परिवार पीढ़ियों से इसी काम में लगे हैं। माघ माह में भी यहां चहल-पहल बनी रहती है, क्योंकि तीर्थयात्रा साल भर चलती है। यह बाजार केवल खरीद-फरोख्त का नहीं, बल्कि यात्रा का एक जरूरी ठहराव है।

आरती के साथ पूर्णता

शाम करीब सात बजे पुनः बाबा वैद्यनाथ धाम लौटने पर दीपों की रोशनी, धूप की सुगंध और मंत्रोच्चार वातावरण को और गाढ़ा कर देते हैं। मां पार्वती मंदिर के चबूतरे से होने वाली संध्या आरती में पांच पंडित परंपरागत क्रम से शामिल होते हैं। कपूर की लौ, आईना दर्शन, मोरपंख की हवा और पान का बीड़ा—हर क्रिया श्रद्धा और मर्यादा में बंधी होती है। आरती के बाद गूंजते जयकारे पूरे दिन की यात्रा को एक सूत्र में बांध देते हैं।मकर संक्रांति की यह यात्रा—मंदिर, बाजार, अंगीठी, तिलकुट, दही-चूड़ा और पेड़ा—सब साथ लेकर चलती है। देवघर से बासुकिनाथ और फिर बाबा के द्वार तक का यह मार्ग बताता है कि भारत में तीर्थयात्रा केवल पूजा नहीं, बल्कि एक जीवंत जीवन अनुभव है।

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