बदलते सामाजिक सरोकार: क्यों आज समय की मांग बन चुका है 'पुरुष विमर्श'?

Shifting Social Concerns: Why Has 'Male Discourse' Become the Need of the Hour?
 
बदलते सामाजिक सरोकार: क्यों आज समय की मांग बन चुका है 'पुरुष विमर्श'?

Men's Rights and Mental Health Debate: हिंदी साहित्य और सामाजिक बहसों में 'स्त्री विमर्श' ने लंबे समय तक आधी आबादी के अधिकारों, उनके संघर्षों और अस्मिता को समाज के सामने प्रखरता से रखा है। इस वैचारिक आंदोलन के सकारात्मक परिणाम भी दिखे हैं। आधुनिक महिला आज कॉर्पोरेट परिधानों से लेकर पारंपरिक छः गजी साड़ियों तक, हर क्षेत्र और जिम्मेदारी को बखूबी संभाल रही है।

परंतु, समकालीन दौर में एक नया वैचारिक स्वर तेजी से उभर रहा है, जिसे 'पुरुष विमर्श' कहा जा रहा है। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह सवाल कि "क्या स्त्री विमर्श को पुरुष की भूमिका से अलग करके देखा जा सकता है?" समाज के गहरे मनोवैज्ञानिक, कानूनी और सामाजिक ढाँचे की ओर इशारा करता है। जब समाज दोनों ही इकाइयों से मिलकर बना है, तो आज पुरुषों के अधिकारों और उनकी मानसिक स्थिति को अलग से रेखांकित करने की आवश्यकता क्यों महसूस हो रही है?

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सोशल मीडिया का आक्रोश और मानसिक संकट की आहट

हाल ही में बेंगलुरु के एआई इंजीनियर अतुल सुभाष और दिल्ली के कैफे संचालक पुनीत खुराना की दर्दनाक आत्महत्याओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। दोनों ही मामलों में पीड़ितों ने आत्मघाती कदम उठाने से पहले अपनी पत्नियों और ससुराल पक्ष द्वारा दी जा रही भयानक मानसिक प्रताड़ना को उजागर किया था। अतुल सुभाष का 90 मिनट का वीडियो और सुसाइड नोट पुरुषों के मूक दर्द का जीवंत दस्तावेज बन गया।

इस घटना के बाद डिजिटल स्पेस और सोशल मीडिया पर:

  • #MenToo, #JusticeForAtulSubhash और #LegalGenocideOfMen जैसे हैशटैग्स ट्रेंड करने लगे।

  • पुरुषों ने वैवाहिक जीवन में प्रताड़ना, बच्चों की कस्टडी (संरक्षण) न मिलना और अत्यधिक भरण-पोषण (Alimony/Maintenance) के नाम पर होने वाली जबरन वसूली के अपने कड़वे अनुभवों को साझा करना शुरू किया।

  • आंकड़ों के अनुसार, भारत में पुरुषों की आत्महत्या की दर महिलाओं की तुलना में काफी चिंताजनक है। इसके बावजूद, पुरुषों के लिए मानसिक परामर्श (Counseling) और सहायता प्रणालियां बेहद सीमित हैं, क्योंकि समाज हमेशा उनसे 'मजबूत' बने रहने की रूढ़िवादी अपेक्षा करता है।

 कानूनी विसंगतियां: रक्षक जब बनने लगे हथियार

घरेलू मोर्चे पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों के बढ़ते दुरुपयोग ने न्याय व्यवस्था के संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं:

धारा 498A (अब BNS की धारा 85-86) का बदलता स्वरूप

दहेज उत्पीड़न को रोकने के लिए साल 1983 में भारतीय दंड संहिता में धारा 498A को जोड़ा गया था। लेकिन समय के साथ इसके दुरुपयोग के मामले बढ़ते गए।

  • सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां: जुलाई 2014 में देश की सर्वोच्च अदालत ने इस धारा के तहत बिना जांच सीधे गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए 9 सूत्रीय गाइडलाइन जारी की थी। अदालत ने माना था कि यह कानून "संतुष्ट न रहने वाली पत्नियों द्वारा ढाल के बजाय एक हथियार के रूप में" इस्तेमाल किया जा रहा है। दिसंबर 2024 में भी सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि वैवाहिक विवादों में निजी दुश्मनी निकालने के लिए इस कानून का गलत इस्तेमाल बढ़ा है।

  • विशेषज्ञों की राय: कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एकतरफा झुके हुए कानूनों के कारण न्याय का संतुलन बिगड़ता है, जिससे पतियों और उनके परिवारों को गंभीर अवसाद (Depression) का सामना करना पड़ता है।

यौन अपराधों की लिंग-विशिष्ट (Gender-Specific) परिभाषा

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 (जो पहले IPC की धारा 375 थी) के अंतर्गत बलात्कार को केवल "एक पुरुष द्वारा महिला के विरुद्ध" किए गए कृत्य के रूप में परिभाषित किया गया है। इसका तकनीकी अर्थ यह है कि यदि कोई पुरुष किसी महिला द्वारा किए गए गैर-सहमति वाले यौन कृत्य का शिकार होता है, तो उसे कानूनी रूप से इस श्रेणी में जगह नहीं मिलती। राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के एक पुराने अध्ययन के अनुसार, पुरुषों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के मामले भी सामने आते रहे हैं, जिन्हें कानूनी संरक्षण की दरकार है।

 राष्ट्रीय पुरुष आयोग की उठती मांग

पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विचारकों द्वारा लंबे समय से 'राष्ट्रीय पुरुष आयोग' (National Commission for Men) के गठन की मांग की जा रही है, ताकि झूठे मुकदमों और कानूनी ब्लैकमेलिंग से निर्दोष पुरुषों की रक्षा की जा सके।  भले ही राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं के खिलाफ दर्ज मामलों में पूरी तरह झूठे पाए जाने वाले केसों का प्रतिशत कम (लगभग 8.3%) हो, लेकिन कार्यकर्ताओं का तर्क है कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति के करियर, मान-सम्मान और सामाजिक जीवन को तबाह करने के लिए एक झूठा केस ही काफी होता है। इसके अतिरिक्त, 'द लैंसेट' (2025) की रिपोर्ट के अनुसार, बचपन में यौन हिंसा का शिकार होने वाले लड़कों/पुरुषों की संख्या भी एक मूक सामाजिक त्रासदी की ओर इशारा करती है।

 समाधान की दिशा: सच्ची समानता के चार स्तंभ

एक न्यायप्रिय और संतुलित समाज के निर्माण के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने अत्यंत आवश्यक हैं:

  1. लिंग-तटस्थ कानून (Gender-Neutral Laws): घरेलू हिंसा, उत्पीड़न और यौन अपराधों से जुड़े कानूनों के दायरे में सभी लिंगों को समान रूप से लाया जाना चाहिए।

  2. झूठे मामलों पर कड़ा दंड: दुर्भावना या जबरन वसूली के उद्देश्य से की गई फर्जी शिकायतों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान हो।

  3. स्वायत्त संस्था का गठन: पुरुषों की समस्याओं और उनकी कानूनी शिकायतों की सुनवाई के लिए एक समर्पित 'पुरुष आयोग' बने।

  4. मानसिक स्वास्थ्य तंत्र का सुदृढ़ीकरण: पुरुषों के लिए संकोच-मुक्त माहौल में काउंसलिंग और समर्पित हेल्पलाइन सेवाओं का विस्तार किया जाए।

विरोधी नहीं, पूरक है यह विमर्श

अंततः, यह समझना बेहद जरूरी है कि 'पुरुष विमर्श' का उद्देश्य किसी भी तरह से 'स्त्री विमर्श' को कमतर आंकना या उसका विरोध करना नहीं है। यह दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक (Complementary) हैं। जिस प्रकार महान लेखिका महादेवी वर्मा ने हर प्रकार की बंधन-मुक्ति को एक वृहद मानवीय पहल के रूप में देखा था, उसी प्रकार पुरुष विमर्श भी एक मानवीय दृष्टिकोण है। यह एक ऐसे समतावादी समाज की वकालत करता है, जहां न्याय का तराजू किसी लिंग विशेष के आधार पर नहीं, बल्कि केवल सत्य के आधार पर काम करे। जो आवाजें अब तक लोक-लाज और सामाजिक दबाव में दबी थीं, उन्हें मुखर होने का पूरा अधिकार है।

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