'राम नाम जपना, पराया माल अपना'; आस्था के सैलाब के बीच तिजोरियों की सेंधमारी और कयासों का बाजार
लेखक: सुधाकर आशावादी (विनायक फीचर्स)
संपादकीय डेस्क (18 जून 2026):
एक दौर था जब समाज में बेरोकटोक बढ़ती महंगाई, रिश्वतखोरी और मुनाफाखोरी को रोजमर्रा की बात मानकर 'राम नाम की लूट' की संज्ञा दे दी जाती थी। तब व्यवस्था की लूट-खसोट पर लगाम लगाने के बजाय "राम नाम जपना, पराया माल अपना" और "राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट, अंतकाल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट" जैसी कहावतों को महिमामंडित किया जाता था। लूट चाहे कोई भी करे, जाने-अनजाने उस अनैतिक कृत्य को राम जी के नाम से ही जोड़ दिया जाता था।
तिरपाल से भव्य मंदिर तक का सफर और राजनीति का ब्रांड एम्बेसडर
समय का चक्र बदला और राम जी के नाम पर आखिरकार एक भव्य मंदिर का निर्माण संपन्न हुआ। राम जी चुनावी एजेंडे और घोषणा पत्रों के दायरे से बाहर निकलकर अपने भव्य गर्भगृह में विराजमान हो गए। तिरपाल से लेकर इस भव्य मंदिर तक का यह सफर आसान नहीं था; इसके पीछे एक लंबा संघर्ष और इतिहास रहा।
देश के कोने-कोने से राम शिलाओं का पूजन हुआ और वे यात्राएं करके मंदिर स्थल तक पहुँचीं। जब मंदिर का भव्य उद्घाटन हुआ, तो उसमें वे लोग पूरे मन से सम्मिलित हुए जिनकी राम जी के प्रति गहन और अगाध आस्था थी। वहीं, दूसरी तरफ कुछ ऐसे लोग भी थे जो जान-बूझकर इस समारोह से दूर रहे, जिन्हें राम जी केवल एक राजनीतिक 'ब्रांड एम्बेसडर' के रूप में प्रतीत हो रहे थे।
आस्था का सैलाब: जब भक्तों ने खोल दिए अपनी जेबों के द्वार
बहरहाल, मंदिर बना और अयोध्या नगरी जन-जन के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन गई। धार्मिक भावनाएं अपने आप में इतनी प्रबल होती हैं कि उनके आगे व्यक्ति किसी अन्य सांसारिक वस्तु को कुछ नहीं समझता। "राम जी की निकली सवारी, राम जी की लीला है न्यारी" जैसे उद्घोष हर हृदय से गूंजने लगे।
भक्तों की खुशी का ठिकाना नहीं था और उनमें इस बात की होड़ मच गई कि राम जी का खजाना हमेशा भरा-पूरा रहे। मंदिर की व्यवस्था में कभी धन की कमी न आए, इसी भाव के साथ समर्पित भक्तों ने दान-पेटियों को भरने में अपनी जेबें खाली कर दीं।दान-पेटियों में श्रद्धा का यह सैलाब इस कदर उमड़ा कि सोने-चांदी के आभूषणों और भारी-भरकम नकदी की गिनती करने के लिए बैंक कर्मचारियों से लेकर 'विश्वासपात्रों' की एक विशेष टीम का गठन करना पड़ा। अब व्यवस्थापकों ने इस टीम के चयन का क्या मापदंड रखा—उनकी ईमानदारी की परीक्षा ली गई या फिर भाई-भतीजावाद और सिफारिश के आधार पर उन्हें यह काम सौंपा गया—यह तो वही जानें। लेकिन जो भी हुआ, उसने जल्द ही विश्वास के बादलों पर संदेह की छाया डाल दी।
जब तिजोरी का रास्ता बदला: "राम जी का नाम बदनाम न करो"
जल्द ही हवा में एक परेशान करने वाली खबर तैरने लगी कि राम जी के नाम पर एक बार फिर 'लूट' शुरू हो गई है। कयास लगाए जाने लगे कि भक्तों द्वारा चढ़ाए गए सोने, चांदी और नोटों की गड्डियां राम जी की आधिकारिक तिजोरी में जगह बनाने के बजाय किसी और की निजी तिजोरी का रास्ता नाप रही हैं।
मामला जब आगे बढ़ा, तो इसका असर उन लोगों पर भी दिखने लगा जिन्होंने खुद मंदिर में कभी एक रुपए का सिक्का भी नहीं चढ़ाया था। सच्चे राम भक्तों ने इस गड़बड़ी में शामिल लोगों को सलाह भी दी कि—"सुन लो ऐ दीवानों तुम ये काम न करो, राम जी का नाम बदनाम न करो"—मगर सत्ता और धन के नशे में चूर भला किसकी सुनता है?
निष्कर्ष: हिसाब मांगने की हिम्मत किसी में नहीं
मामले की गंभीरता को देखते हुए एक जांच समिति तो बना दी गई, लेकिन दोषी कौन है, कितनी चोरी हुई और कितना माल इधर से उधर हुआ, इसका कोई पुख्ता खुलासा आज तक नहीं हो सका है। कुछ कयास लग रहे हैं, कुछ पर गंभीर आरोप मढ़े गए हैं और कुछ ने बड़ी सफाई से इन आरोपों को नकार दिया है। फिलहाल यह पूरा मामला अधर में लटका हुआ है।
हैरानी की बात यह है कि इन खबरों के बाद भी सच्चे भक्तों का विश्वास कम नहीं हुआ है; वे आज भी पूरी निष्ठा से दान दे रहे हैं। उन्हें पूरा यकीन है कि 'राम जी सब देख रहे हैं।' और शायद भगवान वाकई ऊपर से यह सब देख भी रहे हों, पर धरती पर इस विसंगति का हिसाब मांगने वाला कोई नजर नहीं आता। क्योंकि यहाँ "राम नाम जपना" का ठेका तो हर किसी ने ले लिया है, लेकिन "पराया माल अपना" करने वालों से कड़े सवाल पूछने की हिम्मत किसी में नहीं है।

