मुख्य सचिव अनुराग जैन के तीखे तेवर; क्या बेकाबू अफसरशाही पर केवल फटकार से लगेगा अंकुश या उठाने होंगे कड़े कदम?
गुजरे जमाने के तौर-तरीके अब नहीं चलेंगे
जब प्रशासनिक पदानुक्रम (Hierarchy) का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं जिलों के मुखियाओं को यह याद दिलाने लगे कि पुराने ढर्रे पर काम अब स्वीकार्य नहीं होगा, तो यह जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
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संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: जब आम नागरिक को अपनी जायज मांगों या जनसुनवाई में न्याय के लिए आत्मदाह या जहर खाने जैसे आत्मघाती कदम उठाने पड़ते हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है। मुख्य सचिव के कड़े तेवरों से यह स्पष्ट है कि शासन अब इस सुस्ती को और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
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नियमों की अनदेखी: मैहर और सिंगरौली जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में बढ़ते प्रदूषण पर मुख्य सचिव की गहरी नाराजगी यह साबित करती है कि स्थानीय स्तर पर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और शीर्ष अधिकारी अपने क्षेत्रों के प्रति गंभीर नहीं हैं।
सवाल जवाबदेही का: क्या मौखिक चेतावनी ही काफी है?
अक्सर यह देखा गया है कि उच्च स्तरीय समीक्षा बैठकें केवल फाइलों और बयानों तक सीमित रह जाती हैं; फटकार लगती है, नाराजगी जताई जाती है, लेकिन धरातल पर परिणाम शून्य ही नजर आते हैं। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने इस बार स्पष्ट किया है कि वे अब ऐसी स्थिति को कतई स्वीकार नहीं करेंगे। क्या केवल मौखिक निर्देश और डांट-डपट से इस निरंकुश हो चुकी अफसरशाही को सुधारा जा सकता है? प्रशासनिक सुधार का असली अर्थ तब सिद्ध होगा, जब निर्धारित समयसीमा (Deadline) के भीतर काम न करने वाले और कोताही बरतने वाले अधिकारियों पर ठोस दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। जब तक ब्यूरोक्रेसी के मन में यह डर नहीं होगा कि उनकी निष्क्रियता का परिणाम उन्हें निलंबन या खराब पोस्टिंग के रूप में भुगतना पड़ेगा, तब तक तंत्र में पूरी सतर्कता आना नामुमकिन है।
सुशासन का पैमाना: आखिरी व्यक्ति तक राहत
सुशासन का अर्थ केवल सचिवालय की फाइलों को तेज गति देना नहीं है, बल्कि उस अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना है।
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नीतिगत फैसलों में विफलता: जबलपुर और नरसिंहपुर में पराली जलाने और किसानों की अन्य समस्याओं पर जिस तरह कलेक्टरों को घेरा गया, वह यह दिखाता है कि राज्य सरकार के नीतिगत निर्णय जिला स्तर पर सही ढंग से लागू नहीं हो पा रहे हैं।
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पेयजल पर लचर रवैया: भीषण गर्मी के बीच सरकारी हैंडपंपों पर दबंगों के निजी कब्जे हों और स्थानीय प्रशासन मूकदर्शक बना रहे, यह एक गंभीर प्रशासनिक चूक है जो सरकार के सुशासन के दावों की हवा निकालती है।
क्या होगा आगे: प्रशासनिक फेरबदल या औपचारिकता?
अवैध परिवहन करने वाले वाहनों को कुर्क/नीलाम करना या प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों का औचक निरीक्षण करना, यह जिला प्रशासन के रोजमर्रा के सामान्य कार्य हैं। यदि इन बुनियादी कामों के लिए भी सूबे के मुख्य सचिव को बार-बार निर्देश देने पड़ रहे हैं, तो यह पूरे सिस्टम की रीढ़ की कमजोरी को दर्शाता है।
जब अनुशासनहीनता की जड़ें इतनी गहरी हो जाएं, तो उन्हें केवल शब्दों से नहीं उखाड़ा जा सकता। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अधिकारियों के भीतर 'कर्म संस्कृति' (Work Culture) को पुनर्जीवित करने की है। जो अधिकारी या पुलिस कप्तान परिणाम देने में पूरी तरह विफल साबित हो रहे हैं, उनके खिलाफ कठोर प्रशासनिक और अनुशासनात्मक फेरबदल अब अपरिहार्य हो चुका है।
मध्य प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी इस समय दोराहे पर खड़ी है—एक तरफ सरकार की सुशासन और विकासपरक अपेक्षाएं हैं, तो दूसरी तरफ पुरानी सुस्त कार्यप्रणाली। मुख्य सचिव अनुराग जैन का संदेश बिल्कुल साफ है: अब केवल 'परफॉर्मेंस' (प्रदर्शन आधारित कार्य) ही सेवा में बने रहने का एकमात्र पैमाना होगा। जनता को अब बैठकों की औपचारिकता या निर्देशों की नहीं, बल्कि धरातल पर दिखने वाले सुधारों की प्रतीक्षा है। आने वाले दिनों में होने वाले प्रशासनिक एक्शन ही यह तय करेंगे कि सरकार का इस तंत्र पर कितना नियंत्रण है।
