बच्चों की तस्करी का बढ़ता कारोबार, पंजाब भी अछूता नहीं
सुभाष आनंद—विनायक फीचर्स)
बच्चों की तस्करी और उनके अवैध खरीद-फरोख्त का कारोबार वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। भारत में भी बच्चों की तस्करी से जुड़े मामले लगातार सामने आते रहे हैं। पंजाब में सामने आए सरकारी आंकड़े और विभिन्न मामलों ने इस समस्या को लेकर चिंता बढ़ाई है।
पंजाब सरकार के आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में राज्य से 1,082 बच्चे लापता हुए, जिनमें से पुलिस 402 बच्चों को तलाशने में सफल रही, जबकि 680 बच्चों का अभी तक पता नहीं चल सका है। इन बच्चों के लापता होने के कारणों की अलग-अलग परिस्थितियों में जांच की जा रही है। लेख में आशंका जताई गई है कि कुछ बच्चे संगठित अपराध या तस्करी के नेटवर्क का शिकार हो सकते हैं।
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, इसी अवधि में 120 महिलाओं और 31 बच्चों को कथित तस्करी के जाल से मुक्त कराया गया। ये आंकड़े मानव तस्करी की चुनौती की गंभीरता को रेखांकित करते हैं।
बच्चे को बेचने का मामला सामने आने से चिंता
हाल ही में पंजाब में एक दंपति पर अपने दो साल के बच्चे को कथित तौर पर पांच लाख रुपये में बेचने का मामला सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, बच्चे को बेचने की वजह दंपति की नशे की लत से जुड़ी बताई गई। इस तरह की घटनाएं बच्चों की सुरक्षा और उनके अवैध लेनदेन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
लेख में कुछ निजी अस्पतालों में नवजात बच्चों की कथित अवैध खरीद-फरोख्त का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कुछ दाइयों और स्टाफ नर्सों की भूमिका पर संदेह जताए जाने की बात कही गई है। हालांकि, ऐसे आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही की जा सकती है।
नौकरी के बहाने बच्ची के गायब होने का मामला
लेख में 35 वर्षीय विधवा अनु सिन्हा के मामले का भी उल्लेख किया गया है। उनके अनुसार, वह कनॉट प्लेस स्थित एक ज्वेलरी शॉप में काम करती थीं। वहां एक महिला ने नौकरी के लिए आवेदन किया और करीब एक महीने बाद अचानक गायब हो गई। इसी दौरान अनु की दो वर्षीय बेटी भी लापता हो गई।
बाद में जांच के दौरान कथित तौर पर पता चला कि नौकरी के लिए महिला द्वारा जमा कराया गया विवरण फर्जी था। करीब एक महीने बाद बच्ची को गुरुग्राम से बरामद किए जाने की बात सामने आई, जहां कथित रूप से बच्चों से जुड़े एक अवैध नेटवर्क का पता चला।
अवैध गोद लेने से लेकर शोषण तक का खतरा
लेख के अनुसार, बच्चों की तस्करी का एक प्रमुख कारण निसंतान दंपतियों को अवैध तरीके से बच्चा उपलब्ध कराना बताया जाता है। कुछ मामलों में यह अवैध गोद लेने का रूप ले सकता है, जबकि गंभीर मामलों में बच्चों को बंधुआ मजदूरी, यौन शोषण और अन्य आपराधिक गतिविधियों में धकेले जाने का खतरा रहता है।
लेख में बच्चों की कथित अवैध खरीद-फरोख्त की कीमतों का भी उल्लेख किया गया है, लेकिन ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। गरीब परिवारों से बच्चों को लेने के लिए कथित तौर पर लिखित समझौते कराए जाने की बात भी कही गई है।
इसी तरह, पुलिस द्वारा बचाई गई कुछ महिलाओं के तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से रोजगार का लालच देकर लाए जाने का उल्लेख किया गया है। मानव तस्करी के मामलों में रोजगार का झांसा देकर लोगों को दूसरे स्थानों पर ले जाना एक गंभीर चिंता का विषय रहा है।
कानूनी गोद लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी
बच्चों के गायब होने और तस्करी के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं। निसंतान दंपतियों पर सामाजिक दबाव और कानूनी रूप से बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया को लेकर जानकारी की कमी या जटिलता कुछ लोगों को अवैध रास्तों की ओर ले जा सकती है।
ऐसे में बच्चों को गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया के बारे में जागरूकता, पारदर्शिता और निगरानी बढ़ाना महत्वपूर्ण है। साथ ही, लापता बच्चों की तलाश, मानव तस्करी के नेटवर्क की जांच और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को मजबूत किए जाने की जरूरत है।
लापता बच्चों की तलाश सबसे बड़ी चुनौती
पंजाब सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। परिवारों की जागरूकता, स्कूलों और अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था, बाल संरक्षण तंत्र और पुलिस की त्वरित कार्रवाई भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
बच्चों की तस्करी के खिलाफ सामाजिक संगठनों और अन्य संस्थाओं द्वारा जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। हालांकि, ऐसे अभियानों के साथ प्रभावी कानूनी कार्रवाई और लापता बच्चों की लगातार तलाश भी जरूरी है। पंजाब में लापता बताए गए 680 बच्चों का पता लगाने की चुनौती इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। इन बच्चों के संबंध में प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच और उनकी सुरक्षित बरामदगी परिवारों के साथ-साथ बाल संरक्षण व्यवस्था की भी बड़ी जिम्मेदारी है।

