बच्चों को सजा नहीं, संवेदना चाहिए

Children need empathy, not punishment.
 
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मनोज कुमार अग्रवाल, विनायक फीचर्स
वह स्कूल में मेरा पहला दिन था। मेरे अध्यापक ने मुझे थप्पड़ मारा था और मेरा गाल लाल हो गया था। उस समय मेरी उम्र महज चार वर्ष रही होगी, लेकिन उस थप्पड़ की झनझनाहट 56 वर्ष बीत जाने के बाद भी मेरी स्मृति में ताजा है। यह घटना बताती है कि बचपन में मिला शारीरिक दंड केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि बच्चे के मन और स्मृति को भी गहरे तक प्रभावित कर सकता है।

स्कूलों में बच्चों की पिटाई और किसी भी तरह का शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न लंबे समय से गंभीर चिंता का विषय रहा है। इसके बावजूद समय-समय पर ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिनमें शिक्षकों द्वारा बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार के गंभीर परिणाम देखने को मिलते हैं।


हाल ही में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम स्थित एक निजी स्कूल में छह वर्षीय छात्र प्रणय तेजा की मौत का मामला सामने आया। आरोप है कि होमवर्क पूरा नहीं करने पर बच्चे को शिक्षक ने डांटा और थप्पड़ मारा, जिसके कुछ देर बाद वह कक्षा में गिर पड़ा। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया। घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद मामला चर्चा में आया और व्यापक विरोध भी हुआ। परिवार ने आरोप लगाया कि बच्चा स्वस्थ अवस्था में घर से स्कूल गया था। वहीं स्कूल प्रशासन की ओर से बच्चे की मौत के कारणों को लेकर अलग दावा किए जाने की बात सामने आई।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या होमवर्क पूरा न करना या किसी अन्य छोटी गलती के लिए बच्चे को शारीरिक दंड देना किसी भी स्थिति में उचित हो सकता है?


दुनिया भर में हुए विभिन्न अध्ययनों में यह सामने आया है कि बच्चों के साथ शारीरिक और मानसिक हिंसा उनके भावनात्मक तथा शैक्षिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। शिक्षक का दायित्व केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण तैयार करना भी है। गलती करने पर बच्चे को समझाना, उसकी समस्या जानना और सकारात्मक तरीके से सुधार का अवसर देना शिक्षा का अधिक मानवीय तरीका है।
देश के विभिन्न हिस्सों से भी बच्चों को दंड दिए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। दिल्ली में एक छात्रा को कक्षा में किताब नहीं लाने पर कथित तौर पर लंबे समय तक हाथ ऊपर करके खड़े रहने की सजा दिए जाने के बाद उसकी तबीयत बिगड़ने और बाद में मौत होने का मामला सामने आया। दिल्ली के ही मौजपुर-जाफराबाद इलाके में एक प्ले स्कूल में तीन वर्षीय बच्चे को कथित तौर पर कुर्सी से बांधकर पीटने की घटना सामने आई।


उत्तर प्रदेश के अमरोहा में यूनिफॉर्म नहीं पहनने और बेंच न उठाने को लेकर एक छात्र की कथित पिटाई का मामला सामने आया। जालौन में आठ वर्षीय बच्चे को कथित तौर पर पीटने के बाद बाथरूम में बंद किए जाने की घटना भी सामने आई। फरीदाबाद में एक छात्रा को कथित रूप से कई घंटे खड़े रहने की सजा दिए जाने के बाद उसके आत्महत्या करने का मामला भी सामने आया। मध्य प्रदेश में भी स्कूल परिसर में छात्र के साथ कथित मारपीट की घटना सामने आ चुकी है।
इन घटनाओं की परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन प्रत्येक घटना शिक्षा व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखती है—क्या अनुशासन कायम करने के लिए हिंसा या अपमान का सहारा लिया जाना चाहिए?


शिक्षकों को यह समझना होगा कि कक्षा में सबके सामने डांट या दंड बच्चे के मन पर गहरा असर डाल सकता है। बच्चों की उम्र, मानसिक स्थिति और पारिवारिक पृष्ठभूमि अलग-अलग होती है। किसी बच्चे के लिए शिक्षक की एक डांट सामान्य हो सकती है, जबकि दूसरे बच्चे के लिए वही व्यवहार बेहद अपमानजनक या भय पैदा करने वाला साबित हो सकता है।
भारत में बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17 बच्चों को शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न से संरक्षण प्रदान करती है। इसका उद्देश्य विद्यालयों में बच्चों के लिए सुरक्षित और गरिमापूर्ण वातावरण सुनिश्चित करना है।


बच्चे पर हिंसा या गंभीर दुर्व्यवहार की स्थिति में परिस्थितियों के अनुसार अन्य संबंधित कानूनों के तहत भी कार्रवाई हो सकती है। अभिभावकों को ऐसी घटना को दबाने के बजाय स्कूल प्रबंधन, संबंधित शिक्षा विभाग अथवा पुलिस के समक्ष शिकायत करनी चाहिए। बाल अधिकारों से संबंधित मामलों में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) तथा चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 जैसे माध्यमों से भी सहायता ली जा सकती है।


हालांकि कानूनी कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा ही न हों। शिक्षकों को बच्चों की गलतियों को सुधारने के लिए संवाद, परामर्श और सकारात्मक अनुशासन जैसे तरीकों को अपनाना चाहिए। विद्यालय प्रबंधन को भी शिक्षकों के लिए नियमित प्रशिक्षण, बाल-सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।


बच्चे देश का भविष्य हैं। उन्हें डराकर नहीं, समझाकर शिक्षित किया जा सकता है। अनुशासन का अर्थ भय पैदा करना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और आत्मनियंत्रण विकसित करना है। शिक्षक के हाथ में उठी हुई उंगली या थप्पड़ कुछ क्षणों के लिए बच्चे को चुप करा सकता है, लेकिन उसके मन में पैदा हुआ डर वर्षों तक रह सकता है।


इसलिए जरूरत बच्चों को सजा देने की नहीं, उन्हें समझने की है। स्कूल उनके लिए भय का नहीं, सीखने, बढ़ने और सुरक्षित महसूस करने का स्थान होना चाहिए। बच्चों को सजा नहीं, संवेदना चाहिए।
(विनायक फीचर्स)

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