नेपाल की आड़ में चीन की सेंध? भारत के खेत से थाली तक बढ़ती चुनौती
डॉ. दीपक गोस्वामी | विनायक फीचर्स
भारत और नेपाल के संबंध केवल दो देशों के बीच की सीमा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, सामाजिक, पारिवारिक और व्यापारिक रिश्ते हैं। दोनों देशों के नागरिकों का सीमापार आवागमन भी लंबे समय से सहज रहा है। यही खुलापन जहां दोनों देशों के बीच संबंधों की विशेषता है, वहीं इसका दुरुपयोग अवैध व्यापार या संदिग्ध मूल के सामान की आवाजाही के लिए किए जाने की आशंका भी चिंता का विषय बन सकती है।
चीन से नेपाल के रास्ते भारत पहुंचने वाले ऐसे सामान, जिनके वास्तविक मूल को लेकर सवाल हों, को लेकर समय-समय पर चिंताएं सामने आती रही हैं। यदि किसी तीसरे देश में केवल पैकेजिंग, लेबल या कागजी प्रक्रिया बदलकर किसी उत्पाद को नया मूल देने की कोशिश की जाती है, तो यह व्यापार व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए गंभीर चुनौती है। इसलिए समस्या को केवल तस्करी या अवैध आयात तक सीमित देखने के बजाय पूरी आपूर्ति श्रृंखला और मूल-प्रमाणन व्यवस्था की जांच जरूरी है।
किसान पर पड़ सकता है सीधा असर
इस चुनौती का सबसे संवेदनशील पक्ष कृषि उत्पादों से जुड़ा है। कश्मीर का अखरोट इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण हो सकता है। कश्मीरी अखरोट लंबे समय से अपनी गुणवत्ता और स्वाद के कारण देशभर में पहचान रखता है। ऐसे में यदि बाजार में कम कीमत वाला विदेशी अखरोट किसी दूसरे देश के उत्पाद के रूप में प्रवेश करता है, तो घरेलू उत्पादकों पर कीमत का दबाव बढ़ सकता है।
किसान के लिए उत्पादन लागत केवल फसल तैयार करने तक सीमित नहीं होती। बाग की देखभाल, श्रम, तुड़ाई, सुखाने, छंटाई, भंडारण और परिवहन पर भी खर्च होता है। यदि बाजार में कीमत लगातार लागत के आसपास या उससे नीचे बनी रहे तो किसानों के लिए उत्पादन को लाभकारी बनाए रखना कठिन हो जाता है।
यही चिंता लहसुन, सेब, बादाम, किशमिश, काली मिर्च, सुपारी, इलायची और अन्य कृषि उत्पादों के संदर्भ में भी समझी जा सकती है। किसी भी कृषि अर्थव्यवस्था के लिए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा आवश्यक है। यदि कोई विदेशी उत्पाद गलत या संदिग्ध मूल-प्रमाणपत्र के सहारे भारतीय बाजार में प्रवेश करता है, तो नियमों का पालन करने वाले भारतीय किसान और व्यापारी दोनों प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान में आ सकते हैं।
लहसुन के मामले में खाद्य सुरक्षा भी अहम
लहसुन को लेकर भारत में चीन से होने वाले आयात और गुणवत्ता संबंधी सवाल पहले भी चर्चा में रहे हैं। ऐसे में यदि किसी प्रतिबंधित या नियमन वाले उत्पाद को किसी तीसरे देश के माध्यम से भारतीय बाजार तक पहुंचाने का प्रयास होता है, तो मामला केवल सीमा शुल्क या व्यापार नियमों तक सीमित नहीं रह जाता।
खाद्य उत्पादों के मामले में उपभोक्ता स्वास्थ्य सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। किसी भी विदेशी खाद्य पदार्थ को भारतीय बाजार में प्रवेश से पहले लागू गुणवत्ता मानकों, रासायनिक अवशेषों, कीटनाशक स्तर, फफूंद और अन्य स्वास्थ्य संबंधी मानकों की जांच से गुजरना चाहिए। संदिग्ध खेप की त्वरित जांच और उसके स्रोत की पुष्टि इस व्यवस्था का अहम हिस्सा होनी चाहिए।
नेपाल के साथ व्यापार में पारदर्शिता जरूरी
भारत और नेपाल के बीच विशेष व्यापारिक संबंध हैं। इसलिए नेपाल से आने वाले प्रत्येक उत्पाद को संदेह की नजर से देखना न तो उचित होगा और न ही दोनों देशों के हित में। लेकिन यदि किसी वस्तु के नेपाल में उत्पादन की वास्तविक क्षमता और उसके व्यापारिक आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई दे, तो संबंधित एजेंसियों के लिए जांच का आधार बनना स्वाभाविक है।
यहीं मूल-प्रमाणपत्र की विश्वसनीयता का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी वस्तु को नेपाली उत्पाद के रूप में स्वीकार करने के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार पर्याप्त स्थानीय उत्पादन या मूल्यवर्धन होना चाहिए। केवल पैकेज बदलना, नया लेबल लगाना या मामूली पैकिंग प्रक्रिया किसी विदेशी उत्पाद को वास्तविक नेपाली उत्पाद नहीं बना सकती।
इसलिए दोनों देशों के बीच ऐसी पारदर्शी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जिसमें किसी महत्वपूर्ण उत्पाद के वास्तविक स्रोत, उत्पादन, प्रसंस्करण और आपूर्ति श्रृंखला का सत्यापन डिजिटल और दस्तावेजी माध्यम से किया जा सके।
खुली सीमा, बड़ी चुनौती
भारत-नेपाल की लगभग 1,750 किलोमीटर लंबी खुली सीमा इस चुनौती को और जटिल बनाती है। दोनों देशों के बीच बड़ी संख्या में लोग रोजाना आवागमन करते हैं और सीमा पार व्यापार भी अनेक स्थानों पर स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे में छोटे पैमाने पर होने वाली संदिग्ध आवाजाही की पहचान बड़े मालवाहक कंटेनरों की जांच की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
आधुनिक सीमा प्रबंधन का अर्थ केवल सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ाना नहीं है। इसके लिए तकनीक, जोखिम-आधारित जांच, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और दोनों देशों की संबंधित एजेंसियों के बीच समयबद्ध सूचना साझा करने की व्यवस्था भी जरूरी है।
नुकसान सिर्फ किसान का नहीं
ऐसे व्यापार का पहला संभावित असर किसान पर पड़ता है। किसान पहले से ही मौसम, उत्पादन लागत, मजदूरी, भंडारण और बाजार मूल्य जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। यदि बाजार में अनुचित तरीके से सस्ता विदेशी माल पहुंचता है तो घरेलू उत्पाद की कीमत पर दबाव बढ़ सकता है। लंबे समय में इसका असर कृषि निवेश, उत्पादन और ग्रामीण रोजगार पर भी पड़ सकता है।
दूसरा नुकसान ईमानदार व्यापारी को होता है। जो व्यापारी सीमा शुल्क, जीएसटी, आयकर, परिवहन और अन्य नियामकीय प्रावधानों का पालन करता है, उसके लिए ऐसे कारोबार से प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है जिसमें कर या व्यापार नियमों से बचने की कोशिश की जा रही हो।
तीसरा सवाल सरकारी राजस्व का है। यदि कोई माल अवैध तरीके से या गलत घोषणा के आधार पर देश में प्रवेश करता है तो इससे सीमा शुल्क और अन्य करों के राजस्व पर असर पड़ सकता है। इसलिए संदिग्ध पुनःनिर्यात को केवल सीमा सुरक्षा नहीं, बल्कि आर्थिक अनुशासन के दृष्टिकोण से भी देखना जरूरी है।
चीन-नेपाल-भारत आपूर्ति श्रृंखला पर नजर
भारत घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात पर निर्भरता घटाने और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है। ऐसे में यदि किसी देश से आने वाला उत्पाद तीसरे देश के माध्यम से भारतीय बाजार तक पहुंचता है और उसके वास्तविक मूल की पहचान कठिन हो जाती है, तो व्यापार नीति के उद्देश्यों पर असर पड़ सकता है।
इसलिए भारत को चीन, नेपाल और भारत के बीच बनने वाली संभावित आपूर्ति श्रृंखलाओं को समग्र दृष्टि से समझने की जरूरत है। खासकर उन उत्पादों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए जिनमें भारत की घरेलू कृषि और विनिर्माण क्षमता सीधे प्रभावित हो सकती है।
समाधान जांच और तकनीक में
सोनौली, रक्सौल, जोगबनी, पानीटंकी और रूपईडीहा जैसे प्रमुख सीमा मार्गों पर आधुनिक जांच सुविधाओं को मजबूत किया जा सकता है। कृषि उत्पादों के लिए डिजिटल ट्रेसिंग, बैच नंबर, उत्पादक देश, प्रसंस्करण स्थल और आपूर्ति श्रृंखला का रिकॉर्ड अनिवार्य करने जैसे उपाय पारदर्शिता बढ़ा सकते हैं।
संदिग्ध माल की त्वरित प्रयोगशाला जांच, जोखिम वाले उत्पादों के लिए विशेष निगरानी और भारत-नेपाल की संबंधित एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा करने की व्यवस्था भी प्रभावी हो सकती है।
नेपाल के लिए भी यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत उसके सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी और व्यापारिक साझेदारों में से एक है। यदि उसकी भूमि का उपयोग किसी तीसरे देश के माल को गलत पहचान के साथ आगे भेजने के लिए किया जाता है, तो इससे लंबे समय में नेपाल की व्यापारिक विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है।
इसलिए भारत को नेपाल के साथ टकराव के बजाय ‘कठोर पारदर्शिता’ की नीति अपनानी चाहिए। दोनों देशों के बीच मित्रता और सहज व्यापार कायम रहे, सीमा पर सामान्य आवागमन सुगम रहे, लेकिन गलत मूल-प्रमाणपत्र, अवैध पुनःनिर्यात और खाद्य सुरक्षा के मामले में कोई ढिलाई न हो।
आज सवाल केवल अखरोट, लहसुन या किसी एक कृषि उत्पाद का नहीं है। असली सवाल यह है कि भारतीय किसान को उसकी मेहनत का उचित मूल्य कैसे मिले, बाजार में प्रतिस्पर्धा निष्पक्ष कैसे रहे और उपभोक्ता तक पहुंचने वाले खाद्य उत्पाद सुरक्षित एवं मानक के अनुरूप कैसे हों।
सस्ता माल हमेशा वास्तव में सस्ता नहीं होता। उसकी छिपी कीमत कभी किसान की आय, कभी ईमानदार व्यापारी की प्रतिस्पर्धा, कभी सरकारी राजस्व और कभी उपभोक्ता की सुरक्षा के रूप में सामने आ सकती है।
इसलिए सीमा की निगरानी केवल सीमा की सुरक्षा का विषय नहीं है। यह किसान के खेत, व्यापारी के बाजार और अंततः भारतीय उपभोक्ता की थाली की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ सवाल है।
