Chita Andolan: बुंदेलखंड के गांवों में फिर सुलग उठीं 'चिताएं केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ किसानों का नारा– "न्याय दो या मार दो
Ken-Betwa Link Project Protest in Bundelkhand:मध्य भारत के बुंदेलखंड क्षेत्र में जल संकट को दूर करने के नाम पर शुरू की गई महत्वाकांक्षी 'केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना' अब एक बड़े मानवीय और पर्यावरणीय संकट में बदलती नजर आ रही है। परियोजना के क्रियान्वयन में वैधानिक नियमों और मानवाधिकारों की कथित अनदेखी के विरोध में स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासियों ने एक बार फिर 'चिता आंदोलन' का बिगुल फूंक दिया है।
प्रशासनिक वादाखिलाफी से नाराज बुंदेलखंड की आदिवासी महिलाओं और किसानों का यह असाधारण और संवेदनशील आंदोलन 3 जुलाई 2026 से मध्य प्रदेश के कुपी गांव के पास, केन की सहायक बरना नदी के किनारे दोबारा शुरू हो गया है। 'जय किसान संगठन' के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन में किसानों ने इस बार आर-पार की लड़ाई का एलान करते हुए नारा दिया है— "न्याय दो या मार दो"।

क्यों दोबारा शुरू हुआ 'चिता आंदोलन'?
इससे पहले अप्रैल 2026 में प्रभावित ग्रामीणों ने एक अनोखा 'पंचतत्व विरोध' शुरू किया था, जिसमें लोग जलती चिताओं की तर्ज पर लकड़ियों पर लेट गए थे, उपवास रखा था और अपने शरीर पर मातृभूमि की मिट्टी मली थी। उस समय स्थानीय प्रशासन ने ग्रामीणों की शिकायतों के त्वरित निवारण का भरोसा देकर आंदोलन स्थगित करा दिया था।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन अपने वादों से पूरी तरह मुकर गया है। समाधान करने के बजाय आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर, मंगल यादव और कमल आदिवासी समेत कई नेताओं व 250 से अधिक ग्रामीणों पर कथित तौर पर झूठे मुकदमे लादकर उन्हें जेल भेज दिया गया। जमानत पर बाहर आने के बाद इन नेताओं ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए दोबारा जमीन पर उतरने का फैसला किया है।
46 लाख पेड़ों की बलि और 50 हजार लोग बेघर: अमित भटनागर
छतरपुर जिले के जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने परियोजना की भयावहता को रेखांकित करते हुए कहा यह परियोजना विकास के नाम पर विनाश का खेल है। इसके कारण क्षेत्र के लगभग 46 लाख पेड़ नष्ट किए जा रहे हैं। पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र का 5,803 हेक्टेयर हिस्सा जलमग्न हो जाएगा। प्रशासन के तानाशाही और भ्रष्ट रवैये ने रातों-रात 50,000 से अधिक लोगों को बेघर कर दिया है। उन्हें उनकी पुश्तैनी जमीन, सदियों पुरानी नदियों, जंगलों और उनकी सांस्कृतिक पहचान से जबरन काट दिया गया है।"
आंदोलनकारियों का यह भी गंभीर आरोप है कि स्थानीय प्रशासन राज्य सरकार के इशारे पर प्रभावितों के बीच डर का माहौल बनाने के लिए गैरकानूनी तरीके से बेदखली कर रहा है, घरों की बिजली काटी जा रही है और यहां तक कि स्कूलों व पूजा स्थलों को भी ढहाया जा रहा है।
पुराने आंकड़ों पर टिकी है परियोजना; केन नदी के अस्तित्व पर खतरा
जल नीति शोधकर्ता और 'साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल' (SANDRP) के समन्वयक हिंमाशु ठक्कर ने इस परियोजना के तकनीकी और वैज्ञानिक आधार पर गंभीर सवाल उठाए हैं:
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23 साल पुराने आंकड़े: पूरी परियोजना का जल-विज्ञान (Hydrology) संबंधी आधार साल 2003-04 के पुराने अनुमानों पर टिका है। वर्तमान में केन नदी में वास्तव में कितना पानी उपलब्ध है, इसका कोई भी ताजा वैज्ञानिक आकलन नहीं किया गया है।
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अधिकारियों को ही संदेह: सरकारी आंतरिक पत्राचार से स्पष्ट होता है कि खुद अधिकारियों को 'दौधन बांध' की वार्षिक जल-क्षमता को लेकर गंभीर संदेह हैं, जो निर्धारित सिंचाई और पेयजल के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नाकाफी लग रही है।
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नियमों का खुला उल्लंघन: मई 2017 की चरण-1 वन मंजूरी के तहत पेड़ों की ताजा गणना अनिवार्य थी, जो पन्ना टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक के अनुसार आज तक नहीं हुई। वहीं अक्टूबर 2023 की चरण-2 वन मंजूरी के अनुसार, शर्तें एक वर्ष में पूरी न होने पर मंजूरी स्वतः निरस्त हो जानी चाहिए थी। इसके बावजूद कोर टाइगर क्षेत्र में 78 मेगावाट का पावर प्लांट स्थापित करने का अवैध निर्माण कार्य जारी है।
अनमोल पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के विनाश की चेतावनी
'अरावली विरासत जन अभियान' की सह-संस्थापक नीलम आहलूवालिया का कहना है कि यह परियोजना मध्य भारत के सबसे अनमोल पारिस्थितिक गलियारे (Ecological Corridor) को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर देगी।
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सीईसी (CEC) की चेतावनी: सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने भी केन नदी में 'अतिरिक्त पानी' होने की मूल धारणा पर सवाल उठाया था और इसे आर्थिक व पर्यावरणीय रूप से अव्यावहारिक बताया था।
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वन्यजीवों का संकट: दौधन बांध के कारण 9,000 हेक्टेयर से अधिक घना जंगल डूबेगा। यह क्षेत्र बाघ, घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन, लुप्तप्राय गिद्ध, चिंकारा, भेड़िए और दुर्लभ महाशीर मछलियों का जीवंत आशियाना है।
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वैकल्पिक उपायों की अनदेखी: उन्होंने सवाल उठाया कि बुंदेलखंड में पहले से मौजूद 11 बड़ी और 171 छोटी पारंपरिक सिंचाई परियोजनाओं को मजबूत करने जैसे कम खर्चीले और विकेंद्रीकृत विकल्पों पर सरकार ने विचार क्यों नहीं किया?
'बुलडोजर से नहीं, कानून के शासन से तय हो भविष्य'
आदिवासी समन्वय मंच भारत की युवा नेता कुसुम रावत ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद कहा कि यह आंदोलन 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के खुले उल्लंघन को उजागर करता है।
अधिनियम की धारा 38(1) स्पष्ट करती है कि जब तक मुआवजा और पुनर्वास के सभी अधिकार सुनिश्चित नहीं हो जाते, राज्य जमीन पर कब्जा नहीं कर सकता। साथ ही धारा 21 के तहत प्रभावितों को आपत्तियां दर्ज कराने के लिए 30 दिन से 6 महीने का समय देना अनिवार्य है, जिसे दरकिनार कर दिया गया। उन्होंने कहा, "केन और बेतवा घाटियों का भविष्य देश के कानून से तय होना चाहिए, प्रशासनिक बुलडोजर से नहीं।"
बुंदेलखंड का यह 'चिता आंदोलन' अब महज मुआवजे की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यह देश के संविधान, पर्यावरणीय कानूनों, वन व वन्यजीव संरक्षण अधिनियमों और ग्राम सभा की संवैधानिक स्वायत्तता को बचाने की एक बड़ी वैधानिक और लोकतांत्रिक लड़ाई बन चुका है।
