CII कॉन्क्लेव 2026: 'हर आखिरी लड़की' पुस्तक का विमोचन; सफीना हुसैन और पार्थ सारथी सेन शर्मा ने बालिकाओं की शिक्षा पर साझा किए विचार

लखनऊ में आयोजित सीआईआई (CII) के इस कार्यक्रम ने शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में एक नई चर्चा को जन्म दिया है। एजुकेट गर्ल्स की संस्थापक और रामोन मैग्सेसे पुरस्कार 2025 की विजेता सफीना हुसैन और उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा (IAS) के बीच हुआ यह संवाद आंकड़ों और धरातलीय हकीकत के बीच के सेतु के रूप में उभरा

 
मुख्य अतिथि और वक्ता सफीना हुसैन: संस्थापक, एजुकेट गर्ल्स (भारत की पहली संस्था जिसे रामोन मैग्सेसे पुरस्कार मिला)।  पार्थ सारथी सेन शर्मा (IAS): अतिरिक्त मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार।  डॉ. नूर खान: शिक्षा विशेषज्ञ और ट्रस्टी, लखनऊ बायोस्कोप सनतकदा ट्रस्ट (संवाद की संचालक)।  सफलता का सफर: राजस्थान के गाँवों से रामोन मैग्सेसे तक एजुकेट गर्ल्स की यात्रा 2007 में राजस्थान के कुछ छोटे गाँवों से शुरू हुई थी। आज यह मुहिम 55,000 से अधिक स्वयंसेवकों (टीम बालिका) के माध्यम से 30,000 गाँवों तक फैल चुकी है।  सफीना हुसैन ने कहा, "2025 में रामोन मैग्सेसे पुरस्कार मिलना हमारे लिए एक जिम्मेदारी है कि हम उन कहानियों को सामने लाएं जिन्हें अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। हमारा लक्ष्य 2035 तक 1 करोड़ शिक्षार्थियों तक पहुँचना है। यदि लड़कियाँ दसवीं कक्षा पूरी नहीं करतीं, तो वे देश की अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पातीं।"  आंकड़े बनाम धरातल की हकीकत आईएएस अधिकारी पार्थ सारथी सेन शर्मा ने शिक्षा के राष्ट्रीय परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पिछले 50 वर्षों में लिंग समानता सूचकांक में अभूतपूर्व सुधार हुआ है।  बदलाव: लिंग समानता सूचकांक 60 से बढ़कर अब 100% तक पहुँच गया है।  चुनौती: उन्होंने आगाह किया कि बड़े आंकड़े अक्सर व्यक्तिगत कहानियों और संघर्षों को छिपा देते हैं। हमें उन कहानियों को सुनना होगा जो अभी भी हाशिए पर हैं।  वहीं, डॉ. नूर खान ने इस बात पर जोर दिया कि नामांकन बढ़ने के बावजूद 'स्कूल-बाहर' (Out of school) लड़कियों की मौजूदगी एक गंभीर चिंता है, जिसे दूर करने में एजुकेट गर्ल्स जैसी संस्थाएं सेतु का कार्य कर रही हैं।  एजुकेट गर्ल्स: एक विजनरी संस्था यह संस्था राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सक्रिय है। जहाँ औपचारिक शिक्षा कठिन है, वहाँ इनका 'द्वितीय अवसर' कार्यक्रम किशोरियों को कक्षा 10वीं और 12वीं पूरी करने में मदद कर रहा है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।  निष्कर्ष: भविष्य की पुकार आयोजन का स्पष्ट संदेश था कि हर आखिरी लड़की को शिक्षित करना केवल एक नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और राष्ट्रीय मजबूती के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।
लखनऊ, फरवरी 2026: उत्तर प्रदेश की राजधानी में सीआईआई द्वारा आयोजित एक गरिमामय समारोह में पुस्तक 'हर आखिरी लड़की: भारत की भूली-बिसरी बेटियों को शिक्षित करने की यात्रा' का अनावरण किया गया। यह पुस्तक केवल पन्नों का संग्रह नहीं, बल्कि उन 20 लाख लड़कियों की उम्मीदों का दस्तावेज है, जिन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का भागीरथी प्रयास किया गया है।

मुख्य अतिथि और वक्ता

  • सफीना हुसैन: संस्थापक, एजुकेट गर्ल्स (भारत की पहली संस्था जिसे रामोन मैग्सेसे पुरस्कार मिला)।

  • पार्थ सारथी सेन शर्मा (IAS): अतिरिक्त मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार।

  • डॉ. नूर खान: शिक्षा विशेषज्ञ और ट्रस्टी, लखनऊ बायोस्कोप सनतकदा ट्रस्ट (संवाद की संचालक)।

सफलता का सफर: राजस्थान के गाँवों से रामोन मैग्सेसे तक

एजुकेट गर्ल्स की यात्रा 2007 में राजस्थान के कुछ छोटे गाँवों से शुरू हुई थी। आज यह मुहिम 55,000 से अधिक स्वयंसेवकों (टीम बालिका) के माध्यम से 30,000 गाँवों तक फैल चुकी है।सफीना हुसैन ने कहा, "2025 में रामोन मैग्सेसे पुरस्कार मिलना हमारे लिए एक जिम्मेदारी है कि हम उन कहानियों को सामने लाएं जिन्हें अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। हमारा लक्ष्य 2035 तक 1 करोड़ शिक्षार्थियों तक पहुँचना है। यदि लड़कियाँ दसवीं कक्षा पूरी नहीं करतीं, तो वे देश की अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पातीं।"

आंकड़े बनाम धरातल की हकीकत

आईएएस अधिकारी पार्थ सारथी सेन शर्मा ने शिक्षा के राष्ट्रीय परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पिछले 50 वर्षों में लिंग समानता सूचकांक में अभूतपूर्व सुधार हुआ है।

  • बदलाव: लिंग समानता सूचकांक 60 से बढ़कर अब 100% तक पहुँच गया है।

  • चुनौती: उन्होंने आगाह किया कि बड़े आंकड़े अक्सर व्यक्तिगत कहानियों और संघर्षों को छिपा देते हैं। हमें उन कहानियों को सुनना होगा जो अभी भी हाशिए पर हैं।

वहीं, डॉ. नूर खान ने इस बात पर जोर दिया कि नामांकन बढ़ने के बावजूद 'स्कूल-बाहर' (Out of school) लड़कियों की मौजूदगी एक गंभीर चिंता है, जिसे दूर करने में एजुकेट गर्ल्स जैसी संस्थाएं सेतु का कार्य कर रही हैं।

एजुकेट गर्ल्स: एक विजनरी संस्था

यह संस्था राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सक्रिय है। जहाँ औपचारिक शिक्षा कठिन है, वहाँ इनका 'द्वितीय अवसर' कार्यक्रम किशोरियों को कक्षा 10वीं और 12वीं पूरी करने में मदद कर रहा है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।

 भविष्य की पुकार

आयोजन का स्पष्ट संदेश था कि हर आखिरी लड़की को शिक्षित करना केवल एक नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और राष्ट्रीय मजबूती के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।

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