कमजोर रुपये और विदेशी निवेश की निकासी पर कांग्रेस के सवाल, सरकार से पूछा- क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

कांग्रेस ने रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली को लेकर केंद्र पर उठाए सवाल, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का भी बाजार पर असर
 
कमजोर रुपये और विदेशी निवेश की निकासी पर कांग्रेस के सवाल, सरकार से पूछा- क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
नई दिल्ली। रुपये की कमजोरी और भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी को लेकर कांग्रेस ने केंद्र सरकार से सवाल पूछे हैं। पार्टी ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए रुपये के डॉलर के मुकाबले कमजोर होने और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की बिकवाली को लेकर सरकार से स्थिति स्पष्ट करने तथा इससे निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी मांगी है।

कांग्रेस ने अपने पोस्ट में सवाल उठाया कि अगर रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 100 रुपये के स्तर के करीब पहुंच रहा है, तो सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए क्या कदम उठा रही है। पार्टी ने विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजार से हो रही निकासी का मुद्दा भी उठाया और दावा किया कि 2026 में कई महीनों तक विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रही।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बाजार पर दबाव

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की बिकवाली का दबाव 2026 में भारतीय शेयर बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में FPIs की शुद्ध निकासी एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई थी। रिपोर्ट में ऊंची अमेरिकी यील्ड, मजबूत डॉलर, महंगे कच्चे तेल और भारतीय बाजार के अपेक्षाकृत ऊंचे वैल्यूएशन को विदेशी निवेशकों की सतर्कता के प्रमुख कारणों में गिना गया।अक्टूबर की शुरुआत में भी विदेशी निवेशकों की बाजार स्थिति पर दबाव बना रहा। बाजार विश्लेषण में ऊंची क्रूड कीमतों, बढ़ती बॉन्ड यील्ड और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच विदेशी फंडों की कमजोर बाजार धारणा का उल्लेख किया गया है।

रुपये पर कई वैश्विक कारकों का असर

रुपये की कमजोरी को केवल विदेशी निवेशकों की बिकवाली से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं देता। हालिया बाजार रिपोर्टों में अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक अनिश्चितता को रुपये पर दबाव बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल किया गया है।

1 अक्टूबर को रुपया 0.5 फीसदी कमजोर होकर 96.31 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया था। इसी दौरान अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड में भी तेज बढ़ोतरी और ब्रेंट क्रूड के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने का असर बाजार पर देखा गया।

रॉयटर्स की 5 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, रुपये पर विदेशी इक्विटी निकासी, ऊंची तेल कीमतों और वैश्विक बॉन्ड बाजार में उतार-चढ़ाव का दबाव बना हुआ है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि RBI की ओर से बाजार में हस्तक्षेप के बावजूद रुपये की कमजोरी को लेकर चिंता बनी हुई है।

कांग्रेस ने सरकार से मांगा जवाब

कांग्रेस ने इन आर्थिक परिस्थितियों को लेकर केंद्र सरकार से सवाल किया है कि रुपये की कमजोरी और विदेशी पूंजी की निकासी को रोकने तथा आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए क्या रणनीति अपनाई जा रही है। हालांकि, कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवालों को राजनीतिक प्रतिक्रिया और सरकार से की गई मांग के रूप में देखना जरूरी है। रुपये की विनिमय दर और विदेशी निवेश के प्रवाह पर कई घरेलू और वैश्विक आर्थिक कारकों का असर पड़ता है। इसलिए मौजूदा स्थिति का आकलन केवल एक कारण के आधार पर करना उचित नहीं होगा।

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