बिहार चुनाव 2025: डॉ. शकील अहमद के इस्तीफे से कांग्रेस में भूचाल – क्या महागठबंधन को लगेगा बड़ा झटका?
आज का टॉपिक है बिहार चुनाव 2025 का वो झटका जो महागठबंधन को रातों की नींद उड़ा सकता है। जी हां, बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे और आखिरी चरण का मतदान खत्म होते ही कांग्रेस को करारा तमाचा लगा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और पार्टी के कद्दावर नेता डॉ. शकील अहमद ने प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया! क्यों? टिकट बंटवारे में उपेक्षा, स्थानीय नेतृत्व से मतभेद, और संगठन में असंतोष। एग्जिट पोल्स में महागठबंधन को बढ़त मिलने की बात हो रही है, लेकिन ये इस्तीफा कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। क्या ये बिहार कांग्रेस का अंतिम सांस है? या फिर और बड़े नेता बाहर आने वाले हैं? चलिए, डिटेल में समझते हैं ये ड्रामा।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का दूसरा चरण आज ही खत्म हुआ। 14 नवंबर को रिजल्ट्स आने हैं, और एग्जिट पोल्स कह रहे हैं कि NDA को 150-160 सीटें मिल सकती हैं, जबकि महागठबंधन (RJD-Congress) को 120-130। लेकिन रिजल्ट्स से पहले ही कांग्रेस में भूचाल आ गया। पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री डॉ. शकील अहमद ने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को इस्तीफा भेज दिया। उन्होंने मीडिया को पत्र जारी करते हुए कहा, "बहुत दुखी मन से ये फैसला ले रहा हूं। मतदान खत्म होने का इंतजार किया ताकि पार्टी को कोई नुकसान न हो।" लेकिन असली वजह? बिहार यूनिट में टिकट बंटवारे में उनकी अनदेखी और स्थानीय नेताओं से मतभेद। याद कीजिए, महागठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर ही विवाद हुआ था – RJD को ज्यादा सीटें मिलीं, कांग्रेस को सिर्फ 40-50। शकील अहमद जैसे वरिष्ठ नेता को कोई सम्मानजनक रोल नहीं मिला। ये इस्तीफा सिर्फ पर्सनल नहीं, बल्कि कांग्रेस की आंतरिक कलह का सिंबल है। क्या राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा का 'पनौती' इफेक्ट फिर काम कर गया?
डॉ. शकील अहमद कौन हैं? एक नजर उनके पॉलिटिकल सफर पर शकील अहमद कोई साधारण नेता नहीं। 1965 में कटिहार (बिहार) के काबर कोठी गांव में जन्मे डॉ. शकील ने JNU से MA, MPhil और PhD किया। छात्र जीवन से ही पॉलिटिक्स में कूदे – 1992 में JNU स्टूडेंट्स यूनियन के प्रेसिडेंट बने। CPI(ML) से शुरूआत की, लेकिन जल्दी ही कांग्रेस में शामिल हो गए। उनका परिवार तीन पीढ़ियों से कांग्रेस से जुड़ा: दादा अहमद गफूर 1937 में विधायक बने, पिता शकूर अहमद 1952-77 तक 5 बार विधायक। खुद शकील 5 बार विधायक और सांसद रहे। 2006-09 तक नेहरू यूथ सेंटर के महानिदेशक, फिर यूपीए-2 में गृह राज्य मंत्री। 2010-13 तक बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। लेकिन हाल के सालों में बैकसीट पर। 2023 में उन्होंने घोषणा की थी कि भविष्य में चुनाव नहीं लड़ेंगे। अब ये इस्तीफा – उन्होंने साफ कहा, "कांग्रेस की विचारधारा से मेरा विश्वास आज भी अटल है। मेरा आखिरी वोट भी कांग्रेस को ही जाएगा। लेकिन कुछ नेताओं के कारण अब रहना संभव नहीं।" मुस्लिम कम्युनिटी में उनका बड़ा प्रभाव है, खासकर बिहार के सीमांचल में। उनका जाना कांग्रेस के वोट बैंक को हिला सकता है! इस्तीफे के पीछे की असली वजहें: टिकट विवाद से लेकर उपेक्षा तकशकील अहमद का इस्तीफा अचानक नहीं, बल्कि लंबे असंतोष का नतीजा है। आइए, पॉइंट्स में समझते हैं:टिकट बंटवारे में धोखा: महागठबंधन में कांग्रेस को कम सीटें मिलीं। शकील अहमद के समर्थक उम्मीद कर रहे थे कि कटिहार या आसपास की सीटें उन्हें या उनके करीबियों को मिलेंगी, लेकिन RJD ने कब्जा जमा लिया। इससे नाराजगी चरम पर।
उन्होंने पत्र में लिखा, "मैंने हमेशा पार्टी के हित में काम किया, लेकिन अब ये संभव नहीं लगता।"
पर्सनल फैक्टर: स्वास्थ्य कारणों से चुनाव न लड़ने का ऐलान पहले ही कर चुके थे। लेकिन अब पूर्ण रूप से राजनीति से संन्यास? या फिर कोई नया प्लान? सोर्सेज कह रही हैं कि वो किसी और पार्टी में नहीं जाएंगे, लेकिन मुस्लिम वोटर्स को गाइड कर सकते हैं।
टाइमिंग का राज: मतदान खत्म होते ही घोषणा – ताकि वोटिंग पर असर न पड़े। लेकिन एग्जिट पोल्स के बीच ये न्यूज NDA के लिए बूस्टर है!
ये इस्तीफा कांग्रेस के लिए सिर्फ एक झटका नहीं, बल्कि चेतावनी है। याद कीजिए, महाराष्ट्र और हरियाणा चुनावों के बाद भी ऐसे ही बगावतें हुईं। क्या बिहार में कांग्रेस का सफाया हो जाएगा?
ये बिहार चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि पॉलिटिकल सर्वाइवल का गेम है। शकील अहमद का जाना कांग्रेस के लिए सबक है – वेटरन्स को इग्नोर मत करो!तो कैसी लगी ये एक्सक्लूसिव एनालिसिस? शकील अहमद का इस्तीफा कांग्रेस के लिए कितना बड़ा झटका है – कमेंट्स में बताओ। क्या महागठबंधन रिजल्ट्स जीतेगा? अपनी प्रेडिक्शन शेयर करो!
