विसंगतियों के आइने में समकालीन यथार्थ बनाम ‘चूं चूं की खोज’

Contemporary reality in the mirror of contradictions vs. 'Chun Chun Ki Khoj'
 
डॉ. विभा खरे (विभूति फीचर्स)
वरिष्ठ व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य लेखन आज के दौर की विसंगतियों, राजनीतिक पाखंड और सामाजिक दोहरेपन पर करारी चोट करता है। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल समस्याओं को उजागर नहीं करते, बल्कि मानवीय प्रवृत्तियों का गहन विश्लेषण भी प्रस्तुत करते हैं।

लेखक ने ‘आठवीं पीढ़ी की व्यवस्था’ जैसे व्यंग्यों के माध्यम से राजनीति में व्याप्त वंशवाद और संचय की मानसिकता पर तीखा प्रहार किया है। वे बताते हैं कि किस प्रकार एक नेता अपनी सात पीढ़ियों का इंतज़ाम करने के बाद आठवीं पीढ़ी के लिए अपने बेटे को राजनीति में स्थापित करने की जुगत में लगा रहता है।

‘जुगाड़ मतलब टैक्टफुलनेस’ और ‘सेवा का मेवा’ जैसे व्यंग्यों में लेखक ने समाज की जुगाड़ संस्कृति तथा परोपकार के नाम पर चल रहे स्वार्थपूर्ण व्यापार को अत्यंत चतुराई से उकेरा है। ‘सेवा का मेवा’ में वे दिखाते हैं कि कैसे पुराने कॉलेज मित्र अब ‘प्रभु’ बनकर सेवा के नाम पर मेवा खाने में व्यस्त हैं।
‘डीप फेक है यह दुनिया’ के माध्यम से लेखक ने आधुनिक तकनीक के खतरों और डिजिटल दुनिया की कृत्रिमता पर तीखा व्यंग्य किया है, जहाँ असल और नकल के बीच का अंतर लगातार धुंधला होता जा रहा है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव सहज, सरल और पठनीय शैली के धनी हैं। उनकी भाषा बोलचाल की होते हुए भी व्यंग्य की पैनी धार से भरपूर है। वे ‘जुगाड़’ जैसे देसी शब्दों को ‘टैक्टफुलनेस’ जैसे प्रबंधन संबंधी शब्दों के साथ जोड़कर पाठकों को एक साथ हँसने और सोचने पर विवश कर देते हैं।
विवेक रंजन के व्यंग्य वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखते हैं। उनका लेखन समाज की विकृतियों को पहचानने और समझने का एक प्रभावी आईना है। ‘चूं चूं की खोज’ 75 समकालीन व्यंग्य लेखों का रोचक संग्रह है, जो न केवल पाठकों का मनोरंजन करता है, बल्कि उन्हें अपने आसपास के सामाजिक यथार्थ के प्रति अधिक जागरूक और संवेदनशील भी बनाता है। यह पुस्तक निस्संदेह संग्रहणीय और ‘पैसा वसूल’ कही जा सकती है।
(विभूति फीचर्स)

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