राजनीति में महिलाओं पर विवादित बयान, अस्मिता पर फिर सवाल
(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
देश में एक ओर महिलाओं की राजनीति में 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में पहल की जा रही है, वहीं दूसरी ओर उनके राजनीतिक अस्तित्व और सम्मान को लेकर विवादित बयान बहस को जन्म दे रहे हैं। हाल ही में बिहार के सांसद पप्पू यादव द्वारा दिया गया एक बयान इसी कड़ी में चर्चा का विषय बन गया है, जिसमें उन्होंने राजनीति में सक्रिय महिलाओं को लेकर गंभीर और आपत्तिजनक टिप्पणी की।
इस बयान के बाद विभिन्न दलों की महिला नेताओं में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। इसे केवल एक व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं, बल्कि राजनीति में सक्रिय सभी महिलाओं की गरिमा और अस्मिता पर सवाल के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि यह सच है कि राजनीति सहित समाज के कई क्षेत्रों में यौन शोषण और सत्ता के दुरुपयोग के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं, लेकिन इन अपवादों के आधार पर पूरी महिला समुदाय पर सवाल उठाना न तो न्यायसंगत है और न ही तार्किक। किसी भी क्षेत्र में कुछ घटनाओं के आधार पर व्यापक निष्कर्ष निकालना समाज में गलत धारणाओं को जन्म देता है।

आज देश की राजनीति में महिलाएं अपनी योग्यता, नेतृत्व क्षमता और संघर्ष के बल पर शीर्ष स्थानों तक पहुंची हैं। पंचायत से लेकर संसद तक उनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही है और उन्होंने नीतिगत निर्णयों में अपनी प्रभावी भूमिका साबित की है। ऐसे में उनके योगदान को नकारना या उसे संदिग्ध बनाना, उनके वर्षों के परिश्रम और उपलब्धियों का अपमान है।
यह भी चिंताजनक है कि इस प्रकार की बयानबाज़ी समाज में महिलाओं के प्रति अविश्वास और पूर्वाग्रह को बढ़ावा देती है। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के बजाय, इस तरह के बयान उनके मनोबल को कमजोर कर सकते हैं।
निश्चित रूप से समाज में हर तरह की प्रवृत्तियां मौजूद होती हैं, लेकिन यह आवश्यक है कि हम तथ्यों और संतुलित दृष्टिकोण के आधार पर ही अपनी राय बनाएं। महिलाओं के प्रति सम्मानजनक और संवेदनशील व्यवहार ही एक स्वस्थ और सशक्त लोकतंत्र की पहचान है।
अंततः, यह कहना उचित होगा कि राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को लेकर सकारात्मक माहौल बनाना समय की मांग है। अनर्गल और अप्रमाणिक बयानबाज़ी से सुर्खियां तो मिल सकती हैं, लेकिन इससे समाज और लोकतंत्र दोनों को नुकसान ही पहुंचता है।
