नव निर्मित राष्ट्रीय राजमार्गों में दरारें, आखिर गलती कहां है?

Cracks in newly constructed national highways—where exactly does the fault lie?
 
नव निर्मित राष्ट्रीय राजमार्गों में दरारें, आखिर गलती कहां है?

विवेक रंजन श्रीवास्तव — विनायक फीचर्स

देश में जिस तेजी से राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हो रहा है, वह निश्चित रूप से उत्साहजनक है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के नेतृत्व में सड़क अधोसंरचना के क्षेत्र में गति और महत्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ काम हुआ है। लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी लगातार सामने आता है—नए बने राष्ट्रीय राजमार्गों पर कहीं दरारें क्यों दिखाई देने लगती हैं, कहीं सड़क धंस जाती है और कहीं कुछ ही समय में गड्ढे बनने लगते हैं?

क्या सड़क निर्माण के मानक कमजोर हैं? क्या ठेकेदार गुणवत्ता से समझौता कर रहे हैं? क्या साइट पर निगरानी पर्याप्त नहीं है? या इसके पीछे कोई ऐसी तकनीकी वजह है, जिसे सड़क पर दिखाई देने वाले गड्ढे से समझना आसान नहीं?

लगभग चार दशक तक सिविल इंजीनियर के रूप में बड़े निर्माण कार्यों से जुड़े रहने के अनुभव के आधार पर मेरा मानना है कि इस सवाल का जवाब किसी एक व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता। निर्माण की गुणवत्ता एक पूरी श्रृंखला का परिणाम होती है। इस श्रृंखला की किसी एक कड़ी में कमजोरी आने पर उसका असर पूरे निर्माण की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

सड़क की मजबूती ऊपर नहीं, नींव से तय होती है

सड़क ऊपर से सीधी, सपाट और चिकनी दिखाई देती है, लेकिन उसकी वास्तविक मजबूती उसकी निचली परतों से शुरू होती है। सड़क के नीचे कई स्तर होते हैं। ऊपर बिटुमिनस परतें, उसके नीचे आधार परतें, फिर ग्रेन्युलर सब-बेस और अंत में सबग्रेड यानी वह मिट्टी, जिस पर पूरी सड़क की संरचना टिकी होती है।

इसलिए सड़क का ऊपरी हिस्सा देखने में कितना भी सुंदर क्यों न हो, इससे उसकी नींव की मजबूती का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

इसे भवन के उदाहरण से समझा जा सकता है। किसी भवन पर शानदार पेंट कर देने से उसकी नींव मजबूत नहीं हो जाती। ठीक यही बात सड़क पर भी लागू होती है। यदि सबग्रेड की मिट्टी सही ढंग से तैयार नहीं हुई, पर्याप्त संघनन नहीं हुआ, नमी नियंत्रित नहीं रही या पानी की निकासी की व्यवस्था ठीक नहीं है, तो ऊपर डाली गई महंगी बिटुमिनस परत भी लंबे समय तक टिक नहीं सकती।

यही वजह है कि सड़क निर्माण में ड्रेनेज यानी जल निकासी को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सड़क की परतों में पानी का प्रवेश और अपर्याप्त जल निकासी समय से पहले सड़क खराब होने के प्रमुख कारणों में शामिल हो सकते हैं।

हर दरार सड़क की खराब गुणवत्ता का प्रमाण नहीं

सड़क पर दरार दिखाई देना और सड़क का घटिया निर्माण होना हमेशा एक ही बात नहीं है। बिना तकनीकी जांच के केवल दरार देखकर यह घोषित कर देना कि सड़क खराब गुणवत्ता की बनी है, इंजीनियरिंग की दृष्टि से उचित नहीं होगा।

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सड़क पर अलग-अलग प्रकार की दरारें हो सकती हैं। अनुदैर्ध्य दरार, अनुप्रस्थ दरार, जालीनुमा दरार, परावर्तित दरार आदि अलग-अलग परिस्थितियों और तनाव के कारण उत्पन्न हो सकती हैं।

तापमान में बदलाव से भी कुछ प्रकार की दरारें पैदा हो सकती हैं। नीचे की परतों में होने वाली हलचल का प्रभाव ऊपर की सतह पर दिखाई दे सकता है। लेकिन यदि नई सड़क पर बहुत कम समय में जालीनुमा दरारें दिखाई देने लगें, पहियों के चलने वाले हिस्से में धंसाव हो, सतह उखड़ने लगे या दरारें बढ़ते-बढ़ते गड्ढों में बदलने लगें, तो यह निश्चित रूप से गंभीर संकेत है।

ऐसी स्थिति में केवल सड़क की ऊपरी परत देखकर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। पूरी सड़क संरचना की तकनीकी जांच आवश्यक होगी।

मानकों की कमी नहीं, चुनौती उनके पालन की है

भारत में सड़क निर्माण के लिए मानकों और तकनीकी विनिर्देशों की कमी नहीं है। भारतीय सड़क कांग्रेस, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारतीय मानक ब्यूरो और विभिन्न तकनीकी संस्थानों के माध्यम से विस्तृत तकनीकी व्यवस्था उपलब्ध है। आईआईटी रुड़की जैसे संस्थान भी सड़क निर्माण से जुड़े अनुसंधान, विशेषज्ञता और तकनीकी परामर्श में योगदान देते हैं।

इसलिए वास्तविक समस्या यह कहना नहीं है कि हमारे पास अच्छे तकनीकी मानक नहीं हैं। बड़ी चुनौती वहां शुरू होती है, जहां कागज पर मौजूद स्पेसिफिकेशन वास्तविक निर्माण स्थल पर पूरी तरह लागू नहीं हो पाती।

मान लीजिए किसी सड़क की परत को निर्धारित मोटाई में बिछाना है। उसकी सामग्री का ग्रेडेशन तय मानकों के अनुरूप होना चाहिए। नमी एक निश्चित सीमा में होनी चाहिए और इसके बाद रोलर से निर्धारित तरीके से पर्याप्त संघनन किया जाना चाहिए।

कागज पर सब कुछ सही हो सकता है। लेकिन असली सवाल हैं—क्या सड़क की हर जगह निर्धारित मोटाई रही? क्या सामग्री में नमी सही थी? क्या पर्याप्त संघनन हुआ? बारिश के बाद कमजोर सामग्री को हटाकर दोबारा काम किया गया या नहीं? बिटुमिनस मिश्रण सही तापमान पर साइट तक पहुंचा या नहीं? बिछाने और रोलिंग के बीच निर्धारित समय का पालन हुआ या नहीं?

यही वे सवाल हैं, जो सड़क की वास्तविक उम्र निर्धारित करते हैं।

इसलिए गुणवत्ता केवल परीक्षण से पैदा नहीं होती। गुणवत्ता निर्माण की प्रक्रिया में पैदा होती है।

ठेकेदार महत्वपूर्ण कड़ी है, लेकिन अकेला जिम्मेदार नहीं

सड़क निर्माण में ठेकेदार की भूमिका निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। उसका तकनीकी अनुभव, संसाधन, मशीनरी, प्रशिक्षित कर्मचारी और गुणवत्ता के प्रति दृष्टिकोण निर्माण के परिणाम को प्रभावित करते हैं।

लेकिन राष्ट्रीय राजमार्ग जैसी बड़ी परियोजना में ठेकेदार अकेला पक्ष नहीं होता। परियोजना के साथ परामर्शदाता, प्राधिकरण के अभियंता, स्वतंत्र अभियंता, गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाएं और संबंधित सरकारी एजेंसियां भी जुड़ी होती हैं।

गुणवत्ता आश्वासन और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए निर्धारित व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं। कई परियोजनाओं में गुणवत्ता आश्वासन योजना और स्वतंत्र अभियंता के माध्यम से परीक्षण व्यवस्था का हिस्सा होती है।

ऐसे में यदि कोई सड़क निर्धारित समय से पहले खराब हो जाती है तो सवाल केवल ठेकेदार से नहीं पूछा जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि जिस समय निर्माण में कमी हो रही थी, उस समय निगरानी व्यवस्था ने उसे क्यों नहीं पकड़ा?

यदि सड़क बनने के दो वर्ष बाद कोई समस्या सामने आती है तो उसके कारणों की जांच अलग तरह से करनी होगी। लेकिन यदि निर्माण के तुरंत बाद गंभीर खराबी दिखाई देने लगे, तो निर्माण के दौरान हुई निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

साइट सुपरविजन सबसे अहम कड़ी

किसी भी बड़े निर्माण कार्य में कागज पर निर्धारित गुणवत्ता और जमीन पर वास्तविक गुणवत्ता के बीच सबसे बड़ा अंतर साइट सुपरविजन पैदा कर सकता है।

निर्माण के बाद सामग्री का नमूना लेकर परीक्षण करना जरूरी है, लेकिन केवल सैंपल टेस्ट हर गलती को पकड़ नहीं सकता। यदि सड़क की किसी परत को निर्धारित मोटाई से कम बिछाकर उसके ऊपर अगली परत डाल दी गई, तो बाद में उस कमी को पकड़ना मुश्किल हो सकता है।

इसी तरह यदि किसी स्थान पर मिट्टी का पर्याप्त संघनन नहीं हुआ और उसके ऊपर कई परतें डाल दी गईं, तो अंतिम सड़क देखकर समस्या की जड़ तक पहुंचना आसान नहीं होगा।

यही कारण है कि अनुभवी और ईमानदार साइट इंजीनियर का महत्व बहुत अधिक है। सड़कें अक्सर दूर-दराज के क्षेत्रों में बनती हैं। ऐसे में केवल मातहतों के भरोसे निगरानी छोड़ देना पर्याप्त नहीं हो सकता। वरिष्ठ अधिकारियों की साइट विजिट भी वास्तविक निर्माण की गुणवत्ता पर केंद्रित होनी चाहिए।

किस मौसम में काम हो रहा है? किस तापमान पर सड़क की परत बिछाई जा रही है? मशीनें निर्धारित तरीके से काम कर रही हैं या नहीं? सामग्री की गुणवत्ता और संघनन मानकों के अनुरूप है या नहीं? यही वे बिंदु हैं जहां किसी परियोजना की वास्तविक गुणवत्ता तय होती है।

सड़क पर पड़ने वाला भार भी महत्वपूर्ण

सड़क के जल्दी खराब होने का एक कारण उस पर पड़ने वाला वास्तविक यातायात और भार भी हो सकता है। सड़क का डिजाइन केवल वर्तमान वाहनों को ध्यान में रखकर नहीं बनाया जाता, बल्कि भविष्य के यातायात और भारी वाहनों के अनुमान को भी शामिल किया जाता है।

यदि किसी मार्ग पर अनुमान से कहीं अधिक भारी वाहन चलने लगें या निर्धारित सीमा से अधिक भार लेकर वाहन लगातार चलते रहें, तो सड़क की उम्र प्रभावित हो सकती है।

इसलिए किसी सड़क के जल्दी खराब होने की जांच में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि सड़क कैसे बनाई गई थी। यह भी देखना जरूरी है कि सड़क बनने के बाद उस पर किस प्रकार का यातायात चला और वाहनों का वास्तविक भार कितना रहा।

सबसे कम कीमत हमेशा सबसे अच्छी सड़क नहीं देती

टेंडर व्यवस्था भी सड़क की गुणवत्ता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। सार्वजनिक धन से काम कराने में प्रतिस्पर्धी दर स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल सबसे कम कीमत को सफलता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता।

यदि कोई ठेकेदार बहुत कम दर पर काम लेता है तो उसके सामने लागत नियंत्रित रखने का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में तकनीकी योग्यता, गुणवत्ता नियंत्रण, दंडात्मक प्रावधान, रखरखाव और दोष सुधार की स्पष्ट व्यवस्था जरूरी हो जाती है।

हालांकि समस्या केवल यह नहीं है कि टेंडर किसे मिला। असली सवाल यह है कि अनुबंध मिलने के बाद उसकी शर्तों का पालन कितनी कठोरता से कराया गया।

समय सीमा का दबाव भी कई बार निर्माण की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। किसी देरी की भरपाई जल्दबाजी में काम पूरा करके करने की कोशिश लंबे समय में समस्या पैदा कर सकती है।

सड़क की गुणवत्ता उसकी पूरी उम्र से मापी जाए

भविष्य में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि सड़क कितनी जल्दी बनकर तैयार हुई। उसकी वास्तविक सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि वह पांच, दस या उससे अधिक वर्षों बाद किस स्थिति में है।

मैंने अमेरिका, दुबई और ब्रिटेन की सड़कों पर ड्राइव किया है और उनकी गुणवत्ता ने मुझे प्रभावित किया है। मेरे विचार में पूरी सड़क की लंबाई में एक समान गुणवत्ता बनाए रखना वह क्षेत्र है, जहां हमें और बेहतर मानक विकसित करने चाहिए।

किसी सड़क को केवल इसलिए अच्छा नहीं माना जाना चाहिए कि वह समय पर बन गई। यह भी देखा जाना चाहिए कि पांच वर्ष बाद उसमें कितनी दरारें हैं, कितने गड्ढे हैं, कितना धंसाव हुआ है, उसकी सतह कितनी सुरक्षित है और सब-बेस ड्रेनेज किस तरह काम कर रहा है।

सड़क को केवल एक निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक परिसंपत्ति मानकर उसकी पूरी जीवन अवधि की जवाबदेही तय करनी होगी।

तकनीक से निगरानी में आ सकता है बदलाव

सड़क की गुणवत्ता और स्थिति की निगरानी के लिए तकनीक का इस्तेमाल बढ़ना सकारात्मक संकेत है। नेटवर्क सर्वे व्हीकल जैसी तकनीकों से सड़कों की दरारों, गड्ढों, धंसाव और अन्य दोषों का व्यवस्थित सर्वेक्षण किया जा सकता है।

फॉलिंग वेट डिफ्लेक्टोमीटर जैसी तकनीक सड़क की संरचनात्मक क्षमता का आकलन करने में मदद करती है। इसके अलावा ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी भी आने वाले समय में सड़क प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।

भविष्य का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हमने कितने किलोमीटर सड़क बना दी। सवाल यह होना चाहिए कि बनाए गए कुल किलोमीटर में से कितनी सड़कें अपनी निर्धारित गुणवत्ता और आयु के अनुरूप प्रदर्शन कर रही हैं।

गड्ढे की मरम्मत भी इंजीनियरिंग का विषय

हमारे यहां अक्सर सड़क में गड्ढा होने पर उसके ऊपर थोड़ा-सा डामर डालकर काम पूरा मान लिया जाता है। लेकिन तकनीकी दृष्टि से हर स्थिति में यह सही तरीका नहीं है।

यदि गड्ढे का कारण केवल सतही क्षति है तो सतही उपचार पर्याप्त हो सकता है। लेकिन यदि नीचे की परतें कमजोर हो चुकी हैं, पानी प्रवेश कर गया है या सड़क की संरचनात्मक क्षमता प्रभावित हुई है, तो केवल ऊपर से सामग्री डालने से समस्या स्थायी रूप से खत्म नहीं होगी।

कुछ समय बाद वही गड्ढा फिर उभर सकता है।

अर्थात गड्ढा भरना और गड्ढे का मूल कारण समाप्त करना दो अलग-अलग बातें हैं।

आखिर दोषी कौन है?

यदि मुझसे एक वाक्य में उत्तर मांगा जाए तो मैं कहूंगा—समस्या उस पूरी व्यवस्था की है, जो डिजाइन को निर्माण में और निर्माण को दीर्घकालीन गुणवत्ता में बदलती है।

नितिन गडकरी के नेतृत्व में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण ने भारत में सड़क अधोसंरचना को लेकर नया आत्मविश्वास पैदा किया है। तेज गति से सड़क निर्माण अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। लेकिन किसी भी बड़े अभियान के एक चरण के बाद अगला चरण आता है।

अब हमारी चुनौती केवल अधिक किलोमीटर सड़क बनाना नहीं है। चुनौती है हर किलोमीटर को अधिक टिकाऊ बनाना।

इसके लिए ठेकेदार की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है सक्षम साइट सुपरविजन। प्रयोगशाला परीक्षण आवश्यक हैं, लेकिन निर्माण प्रक्रिया की निगरानी उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। अच्छी स्पेसिफिकेशन जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है उनका वास्तविक अनुपालन। सड़क बनाना जरूरी है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण है उसकी पूरी जीवन अवधि तक देखभाल।

हमारे देश में सड़क केवल डामर, गिट्टी और मिट्टी की परतों का नाम नहीं है। यह इंजीनियरिंग, प्रबंधन, निगरानी, अनुशासन और जवाबदेही का संयुक्त परिणाम है।

इसलिए अगली बार किसी नए राष्ट्रीय राजमार्ग पर दरार दिखाई दे तो केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं होगा कि “सड़क किसने बनाई?” हमें यह भी पूछना होगा—डिजाइन किस आधार पर तैयार हुआ था? निर्माण कैसे हुआ? निगरानी किसने की? सड़क पर कितना भार आया? जल निकासी की व्यवस्था कैसी रही? और खराबी सामने आने के बाद जिम्मेदारी किसने निभाई?

क्योंकि अच्छी सड़क वह नहीं है जो उद्घाटन के दिन चमकती हुई दिखाई दे। अच्छी सड़क वह है जो वर्षों बाद भी बिना खबर बने अपना काम करती रहे।

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