चुनावी व्यवस्था पर सवालों के बीच लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता जरूरी : वसीम राईन

Credibility of democratic institutions essential amidst questions regarding the electoral system: Wasim Rain
 
kp[po

बाराबंकी। ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसीम राईन ने चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाने तथा अपनी शिकायतें रखने का अधिकार है, लेकिन गंभीर आरोपों के साथ तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत करना भी आवश्यक है।

वसीम राईन ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सार्वजनिक बहस तथ्यात्मक और जिम्मेदार तरीके से होनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि चुनावी प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता को लेकर शिकायत है तो उसे संबंधित संवैधानिक और कानूनी मंच पर प्रमाण एवं दस्तावेजों के साथ रखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार और जनादेश की अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाता है। आयोग लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का संचालन करता है।

पहले आम चुनाव से शुरू हुई लंबी लोकतांत्रिक यात्रा

राईन ने देश के पहले आम चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि आजादी के बाद भारत के सामने इतने बड़े स्तर पर लोकतांत्रिक चुनाव कराने की चुनौती थी। निर्वाचन आयोग के अनुसार, पहले आम चुनाव 1951-52 में हुए थे। जम्मू-कश्मीर को छोड़कर 17,32,12,343 मतदाता पंजीकृत थे और पहली लोकसभा में 489 सदस्य थे। पहली लोकसभा का गठन 2 अप्रैल 1952 को हुआ। निर्वाचन आयोग के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार चुनाव प्रक्रिया चार महीने और 68 मतदान दिवसों में पूरी हुई थी।

उन्होंने कहा कि उस दौर में मतदाता सूची तैयार करने, मतदान केंद्र स्थापित करने, मतपत्रों की व्यवस्था, मतदान कर्मियों की तैनाती और देश के दूरदराज इलाकों तक चुनाव सामग्री पहुंचाने जैसी अनेक चुनौतियां थीं। इसके बावजूद भारत ने व्यापक स्तर पर चुनाव आयोजित कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया।

निर्वाचन आयोग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 1951 के चुनाव में 17.32 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे और 1,96,084 मतदान केंद्र बनाए गए थे। इसके बाद चुनावी व्यवस्था में लगातार विस्तार हुआ और तकनीक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं के माध्यम से इसमें कई बदलाव आए।

समय के साथ बदली चुनाव प्रक्रिया

वसीम राईन ने कहा कि पिछले सात दशकों में भारतीय चुनाव व्यवस्था में व्यापक बदलाव हुए हैं। मतदाता सूचियों के नियमित अद्यतन, मतदाता पहचान पत्र, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, वीवीपैट, डिजिटल सेवाओं और मतदाता जागरूकता अभियानों के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया लगातार विकसित हुई है।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय पर राजनीतिक दलों और नेताओं की ओर से निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। उनके अनुसार, राजनीतिक दलों को अपनी आपत्तियां और शिकायतें लोकतांत्रिक तथा कानूनी माध्यमों से रखने का अधिकार है, लेकिन किसी आरोप की विश्वसनीयता का आकलन उपलब्ध प्रमाण और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि चुनाव परिणाम किसी भी दल या उम्मीदवार के पक्ष में हों, लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनादेश का सम्मान महत्वपूर्ण है। साथ ही चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और शिकायतों के उचित निस्तारण की व्यवस्था भी लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास के लिए आवश्यक है।

निर्वाचन आयोग की भूमिका और जिम्मेदारियां

राईन ने कहा कि वर्तमान समय में निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारियां पहले की तुलना में अधिक व्यापक हो गई हैं। निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला था।

उन्होंने कहा कि चुनावी प्रक्रिया से संबंधित शिकायतों के लिए संवैधानिक और कानूनी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इसलिए राजनीतिक दलों और नागरिकों को आरोपों के साथ-साथ उपलब्ध संस्थागत माध्यमों का भी इस्तेमाल करना चाहिए।

वसीम राईन ने राजनीतिक दलों से कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर जनता के बीच तथ्यात्मक और जिम्मेदार संवाद होना चाहिए। उनके अनुसार, राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली, चुनावी प्रक्रिया और जनादेश से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक चर्चा में तथ्यों और संवैधानिक प्रक्रिया को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक यात्रा के दौरान चुनाव व्यवस्था में लगातार बदलाव और सुधार हुए हैं। चुनावी पारदर्शिता और प्रक्रिया को लेकर चर्चा भी लोकतंत्र का हिस्सा है। उनके अनुसार, मतदाता का विश्वास, संस्थागत जवाबदेही और जनादेश का सम्मान लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

Tags