संस्कृतिविहीन स्वतंत्रता: परिणाम और चुनौतियाँ

Culture-less Independence: Consequences and Challenges
 
संस्कृतिविहीन स्वतंत्रता: परिणाम और चुनौतियाँ

(अभिमन्यु जैन – विभूति फीचर्स)

स्वतंत्रता के बाद से भारतीय समाज में जीवनशैली, आचार-विचार, पहनावा और शिक्षा के क्षेत्र में जिस प्रकार का बदलाव आया है, वह अक्सर हमारी संस्कृति से दूरी बनाता दिख रहा है। माता-पिता अब "मॉम-डैड" बन गए हैं, पारंपरिक त्योहार और परंपराएँ टीवी, मोबाइल, वेब सीरीज़ और फैशन की चकाचौंध में खोती जा रही हैं। दिन-रात चलने वाले ग्लैमरस प्रसारण और दिखावे की होड़ ने हमारी सोच और मूल्यों को गहराई से प्रभावित किया है।

आज स्थिति यह है कि बच्चे विद्यालय से अधिक विलासिता की ओर आकर्षित हो रहे हैं। अवकाश के दिनों में पिकनिक, मेल-जोल और पारिवारिक संवाद की जगह अब मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर हमारी संवेदनशील, सभ्य और गहरी जड़ों वाली भारतीय संस्कृति को हो क्या गया है?

संस्कृति के बिना स्वतंत्रता अधूरी

इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने भारत की सांस्कृतिक आत्मा को कमजोर करने का प्रयास किया, जिसके विरोध में पूरा देश खड़ा हो गया। राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी सांस्कृतिक स्वतंत्रता का अभाव आज भी महसूस होता है। पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण हमें अपनी जड़ों से काट रहा है। दुखद यह है कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए, लेकिन हम "उधार की संस्कृति" को अपनाकर अपनी पहचान खोते जा रहे हैं।

सांस्कृतिक गिरावट के लक्षण

आज समाज में नैतिक, चारित्रिक और आध्यात्मिक मूल्यों का ह्रास स्पष्ट दिखाई देता है। हमारे अभिजात्य वर्ग के लोग अपने घरों में हिंदी बोलने में झिझकते हैं और अंग्रेजी को आधुनिकता का प्रतीक मानते हैं। ऐसे घरों में भारतीय ग्रंथ कम और विदेशी साहित्य व पॉप म्यूजिक अधिक मिलता है।

विदेशियों की नज़र में भी भारत के बारे में कई भ्रांतियाँ कायम हैं—वे अब भी भारत को गरीबी, बीमारी और अंधविश्वास से घिरा देश मानते हैं। भारतीय दूतावास और मैत्री संघ जैसी संस्थाओं की गतिविधियाँ सीमित हैं, और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के नाम पर केवल औपचारिक आयोजन ही होते हैं।

हमारी संस्कृति का महत्व

कुछ विदेशियों ने भारत में रहकर हमारी संस्कृति के महत्व को समझा है। डेनमार्क की पूर्व मॉडल एन स्काउस (अब सत्यरूपा देवी दासी) और जर्मनी के प्रो. वान्सलोग जैसे लोग मानते हैं कि भारतीय संस्कृति, योग और दर्शन अद्वितीय हैं, लेकिन अफसोस की बात है कि भारतीय स्वयं इनकी उपेक्षा कर रहे हैं।

कारण और परिणाम

भारतीय संस्कृति के पतन के पीछे विदेशी निवेश, भौतिकतावादी सोच, पश्चिमी फैशन, शिक्षा नीति और पारिवारिक मूल्यों का क्षरण जिम्मेदार है। यदि हम अपनी संस्कृति से विमुख होते रहे, तो स्वतंत्रता का यह स्वरूप दिशाहीन हो जाएगा और इसके दुष्परिणाम हमें अवश्य भुगतने पड़ेंगे।

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