संसदीय मर्यादा पर गहराता संकट: असहमति के शोर में कहाँ खो गया लोकतंत्र का मूल मंत्र?
ओ.पी. पाल — विनायक फीचर्स
भारतीय लोकतंत्र में संसद को जनता की समस्याओं, राष्ट्रीय नीतियों और भविष्य के कानूनों पर सार्थक एवं तर्कपूर्ण बहस का सर्वोच्च मंच माना जाता है। संसद केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं, बल्कि देश की सामूहिक चेतना, आकांक्षाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिबिंब भी है। ऐसे में संसद के वर्तमान मानसून सत्र में लगातार दिखाई दे रहा हंगामा संसदीय कार्यप्रणाली और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सत्र की शुरुआत से ही विपक्षी दल विभिन्न राष्ट्रीय एवं राजनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों सदनों में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। सदन के भीतर नारेबाजी, वेल में पहुंचकर तख्तियां दिखाना और संसद परिसर में प्रदर्शन लगातार देखने को मिल रहे हैं। असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब विरोध के कारण सदन की कार्यवाही ही बाधित होने लगे तो इसका सीधा असर जनता से जुड़े विधायी कार्यों पर पड़ता है।
मानसून सत्र के तीसरे सप्ताह में भी हंगामे के बीच विधेयकों के पारित होने का सिलसिला जारी रहा। शुरुआती सप्ताहों में लगातार व्यवधान और स्थगन के कारण दोनों सदनों में अपेक्षित कामकाज नहीं हो सका। सत्तापक्ष जहां नियमों के तहत विपक्ष के मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार होने की बात कह रहा है, वहीं विपक्ष अपनी प्राथमिक मांगों पर तत्काल चर्चा की मांग पर अड़ा हुआ है। इस गतिरोध के बीच सबसे अधिक नुकसान उस विधायी प्रक्रिया का हो रहा है, जिसे प्रभावी बनाने की जिम्मेदारी संसद सदस्यों पर है।
हंगामे के बीच विधेयक पारित होना चिंता का विषय
विपक्ष के विरोध के बीच केंद्र सरकार ने भी अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। पीठासीन अधिकारियों द्वारा सदस्यों से अपनी सीटों पर लौटकर चर्चा में भाग लेने की अपील के बावजूद कई बार विपक्षी सदस्य नारेबाजी या वाकआउट का रास्ता अपनाते हैं। ऐसे में सरकार ध्वनिमत के जरिए विधेयकों को पारित कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाती है।
यह स्थिति संसदीय दृष्टि से इसलिए चिंताजनक है क्योंकि किसी विधेयक पर विस्तृत चर्चा होने से उसके प्रावधानों की कमियों, संभावित प्रभावों और व्यावहारिक चुनौतियों पर विचार का अवसर मिलता है। बहस के बिना कानून बनने की प्रक्रिया पूरी होने पर इन पहलुओं पर व्यापक विमर्श की गुंजाइश सीमित हो जाती है।
प्रश्नकाल और शून्यकाल पर भी असर
संसदीय लोकतंत्र में प्रश्नकाल और शून्यकाल सरकार की जवाबदेही तय करने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। प्रश्नकाल के जरिए सांसद अपने क्षेत्रों तथा राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों से जुड़े सवाल सरकार के सामने रखते हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, अर्थव्यवस्था, रक्षा और बुनियादी ढांचे जैसे विषयों पर सरकार से सीधे जवाब मांगा जाता है।
इसी तरह शून्यकाल सांसदों को तत्काल जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने का अवसर देता है। लेकिन लगातार व्यवधान के कारण इन दोनों महत्वपूर्ण संसदीय माध्यमों का प्रभाव प्रभावित होता है। इसका अर्थ है कि देश के दूरदराज इलाकों और आम नागरिकों से जुड़े अनेक मुद्दों को संसद के पटल पर पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता।
विपक्ष की भूमिका केवल विरोध तक सीमित नहीं
संसदीय व्यवस्था में विपक्ष का दायित्व केवल सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि एक सकारात्मक और प्रभावी आलोचक के रूप में काम करना भी है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे उनकी समस्याओं को सदन में उठाएं और प्रस्तावित कानूनों पर गंभीरता से विचार करें।
यदि विपक्ष चर्चा का बहिष्कार करता है, तो वह स्वयं ही उस मंच को कमजोर करता है जहां वह सरकार की नीतियों की सबसे प्रभावी आलोचना कर सकता है। वाकआउट से तत्काल राजनीतिक संदेश भले ही जाए, लेकिन इससे विधेयकों पर संशोधन और वैकल्पिक सुझाव रखने का अवसर भी हाथ से निकल जाता है।
दूसरी ओर, सरकार के लिए भी यह पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि वह केवल विधायी एजेंडा पूरा करने को अपनी सफलता माने। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता व्यापक चर्चा, पारदर्शिता और विभिन्न पक्षों की भागीदारी में है। विपक्ष के बहिष्कार के बीच महत्वपूर्ण कानून पारित हो जाने से भले ही सरकार का विधायी लक्ष्य पूरा हो जाए, लेकिन व्यापक संसदीय विमर्श के अभाव पर सवाल बने रहेंगे।
जनता के पैसे और समय की भी जिम्मेदारी
संसद की कार्यवाही पर सार्वजनिक धन खर्च होता है। ऐसे में सदन का लगातार बाधित होना न केवल विधायी समय की बर्बादी है, बल्कि करदाताओं के पैसे के प्रति भी जवाबदेही का विषय है। तख्तियां दिखाना, वेल में पहुंचकर नारेबाजी करना अथवा पीठासीन अधिकारी के सामने विरोध करना संसदीय गरिमा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
विपक्ष को यह समझना होगा कि सरकार को घेरने का सबसे प्रभावी तरीका सदन को ठप करना नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों, तर्कों और प्रभावी बहस के जरिए उसकी नीतियों को चुनौती देना है। इसी तरह सत्ता पक्ष को भी विपक्ष की आवाज को पर्याप्त अवसर देने और जायज सुझावों पर विचार करने की लोकतांत्रिक परंपरा मजबूत करनी चाहिए।
संवाद से ही निकलेगा रास्ता
मानसून सत्र अब अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के सामने गतिरोध समाप्त करने का अवसर है। सरकार विपक्ष की प्रमुख मांगों पर उचित नियमों के तहत चर्चा का स्पष्ट आश्वासन दे सकती है। वहीं विपक्ष को भी सदन को अनिश्चितकाल तक बाधित करने की रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए।
आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण विधेयकों पर कम से कम सार्थक बहस सुनिश्चित की जानी चाहिए। विपक्ष को वाकआउट के बजाय सदन में रहकर अपने संशोधन और तर्क रखने चाहिए तथा सरकार को भी उचित सुझावों को स्वीकार करने में राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठना चाहिए।
लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन असहमति का सबसे मजबूत हथियार संवाद और तर्क है, गतिरोध नहीं। संसद की गरिमा तभी कायम रह सकती है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर विधायी जिम्मेदारियों और जनता के विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।
