दीपोत्सव: वैदिक चेतना, मानवीय संवेदना और अन्त्योदय से विश्वकल्याण तक का शाश्वत संदेश
दीपावली केवल घरों को रोशन करने का पर्व नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुख, सम्मान, शिक्षा और समृद्धि का प्रकाश पहुंचाने का संकल्प है। सेवा, सद्भाव और आत्मबोध के पांच दीप जलाकर ही सार्थक होगा दीपोत्सव।
डॉ. दीपक गोस्वामी – विभूति फीचर्स)
कुछ पंक्तियां महज शब्द नहीं होतीं, बल्कि युगों की चेतना और जीवन दर्शन बन जाती हैं। 'जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना, धरा पर अंधेरा कहीं रह न जाये' ऐसी ही एक प्रेरणादायी पंक्ति है। इसमें दीपावली का उल्लास, वेदों का ज्ञान, उपनिषदों का आत्मबोध और संपूर्ण मानवता के कल्याण का संकल्प समाहित है। यह पंक्ति हमें बताती है कि दीप जलाना एक परंपरा है, लेकिन किसी दूसरे के जीवन से अंधकार मिटाना हमारी संस्कृति का वास्तविक उद्देश्य है।
दीपक की छोटी-सी लौ में जीवन का व्यापक दर्शन छिपा हुआ है। मिट्टी का पात्र धरती से जुड़ाव का प्रतीक है, तेल या घी पोषण का संदेश देता है, बाती निरंतर प्रयास का संकेत करती है और अग्नि प्रकाश तथा ऊर्जा की अभिव्यक्ति है। इन सभी के संतुलित समन्वय से प्रकाश उत्पन्न होता है। मनुष्य का जीवन भी इसी सिद्धांत पर आधारित है। ज्ञान के साथ विवेक न हो तो दिशा भटक सकती है। सामर्थ्य के साथ संवेदना न हो तो शक्ति अहंकार में बदल सकती है और धन के साथ धर्मसम्मत आचरण न हो तो समृद्धि भी अशांति का कारण बन सकती है।
वैदिक चेतना में समाहित है प्रकाश का दर्शन
भारतीय ज्ञान परंपरा में अग्नि को केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि यज्ञ, समर्पण और कल्याणकारी कर्म का प्रतीक माना गया है। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र अग्नि की स्तुति से प्रारंभ होता है—
'अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।'
वहीं उपनिषदों की शाश्वत प्रार्थना है—
'तमसो मा ज्योतिर्गमय।'
अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। यहां अंधकार का अर्थ केवल रात का अंधेरा नहीं, बल्कि अज्ञान, अविवेक, अन्याय और नकारात्मक विचारों से भी है। इसी प्रकार प्रकाश का अर्थ केवल आंखों से दिखाई देने वाला उजाला नहीं, बल्कि सत्य को पहचानने और सही मार्ग पर चलने वाली चेतना भी है।
इस दृष्टि से दीपोत्सव का वास्तविक उद्देश्य अपने भीतर ज्ञान का प्रकाश जगाना और अपने आचरण तथा कर्मों से समाज को प्रकाशित करना है।
क्या अपने घर को रोशन करना ही पर्याप्त है?
दीपावली पर हम अपने घरों, आंगनों और प्रतिष्ठानों को सैकड़ों दीपों से सजाते हैं। मिठाइयां बांटते हैं और खुशियां मनाते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या हमारे घर का प्रकाश ही पर्याप्त है? क्या अपने आंगन में दीप जलाने के बाद हमारा सामाजिक दायित्व समाप्त हो जाता है?
भारतीय संस्कृति की उदार दृष्टि व्यक्तिगत सुख को पूरे समाज के सुख से जोड़ती है। इसी भावना को यह वैदिक प्रार्थना अभिव्यक्त करती है—
'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।'
अर्थात सभी सुखी हों और सभी रोगमुक्त रहें।
यह केवल मंत्रोच्चार नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के प्रति हमारी जिम्मेदारी का संदेश है। जिस गांव में किसी कुम्हार के घर का चूल्हा न जले, जहां आर्थिक अभाव के कारण किसी बच्चे की पढ़ाई छूट जाए, जहां कोई वृद्ध भोजन के लिए परेशान हो या कोई बीमार उपचार के अभाव में पीड़ित हो, वहां दीपोत्सव की सार्थकता पर विचार करना आवश्यक है।
हमारे घर का दीपक तभी वास्तविक अर्थों में प्रकाशमान होगा, जब उसकी रोशनी किसी दूसरे के जीवन तक भी पहुंचे। मिट्टी का दीपक खरीदना कुम्हार की आजीविका को सहयोग देना है। किसी जरूरतमंद बच्चे को पुस्तक देना उसके भविष्य में उजाला भरना है। भूखे को भोजन कराना उसकी जिंदगी में संतोष का दीप जलाना है और निराश व्यक्ति को सम्मान देना उसके आत्मविश्वास को फिर से जगाना है।
अन्त्योदय ही दीपोत्सव की वास्तविक सार्थकता
समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सम्मान, अवसर और समृद्धि पहुंचाना ही अन्त्योदय की मूल भावना है। दीपावली का पर्व हमें इसी विचार को व्यवहार में उतारने की प्रेरणा देता है।
यदि समाज का एक वर्ग उत्सव की भव्यता पर लाखों रुपये खर्च कर रहा है और दूसरा वर्ग बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है, तो हमें अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
अन्त्योदय का अर्थ केवल आर्थिक सहायता देना नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर उपलब्ध कराना भी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के अवसर अंतिम व्यक्ति तक पहुंचें, तभी समावेशी विकास का सपना साकार हो सकता है।
आस्था और विज्ञान के संतुलन का पर्व है दीपावली
दीपक का वैज्ञानिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। दहन की प्रक्रिया से प्रकाश और ऊष्मा उत्पन्न होती है। प्रकाश हमारे परिवेश को देखने और दैनिक गतिविधियों को सुचारु रूप से करने में सहायक होता है। शांत वातावरण में दीपशिखा को एकाग्रता के साथ देखना ध्यान और मानसिक स्थिरता के अभ्यास का माध्यम भी बन सकता है।
हालांकि दीपक के धुएं या घी की सुगंध से मस्तिष्क की विशेष कोशिकाएं सक्रिय होने अथवा भय समाप्त होने जैसे दावों को प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। आस्था और विज्ञान के अपने-अपने क्षेत्र हैं। वास्तविक चेतना वही है, जो आस्था का सम्मान करने के साथ वैज्ञानिक तथ्यों के प्रति भी ईमानदार रहे।
पांच दीपों के साथ लें पांच जीवनोपयोगी संकल्प
आज समाज में अंधकार के अनेक रूप दिखाई देते हैं। कहीं अशिक्षा है, कहीं बेरोजगारी, कहीं आर्थिक असमानता, कहीं हिंसा और नफरत तो कहीं अकेलापन और निराशा। किसान को उसकी मेहनत का उचित मूल्य न मिलना भी अंधकार है। महिला का असुरक्षित होना, प्रतिभाशाली बच्चे का अवसरों के अभाव में पीछे रह जाना और दूसरों का दुख देखकर भी संवेदनहीन बने रहना भी सामाजिक अंधकार के ही रूप हैं।
इसलिए इस दीपोत्सव पर केवल दीप न जलाएं, बल्कि पांच ऐसे संकल्प भी लें, जो समाज और जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकें।
1. ज्ञान का दीप: कम से कम एक जरूरतमंद बच्चे की शिक्षा में सहयोग करें। उसे पुस्तकें, पाठ्य सामग्री या पढ़ाई के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास करें।
2. करुणा का दीप: किसी भूखे को भोजन कराएं और जरूरतमंद व्यक्ति की सामर्थ्य के अनुसार सहायता करें। दूसरों के दुख को समझना और उसमें सहभागी बनना मानवीय संवेदना का परिचय है।
3. स्वावलंबन का दीप: स्थानीय कुम्हारों, कारीगरों, छोटे व्यापारियों और श्रमिकों के उत्पादों को प्राथमिकता दें। उनके श्रम का सम्मान करके उनकी आजीविका को मजबूती प्रदान करें।
4. सद्भाव का दीप: जाति, भाषा, क्षेत्र और विचारों के भेदभाव से ऊपर उठकर मानवीय संबंधों को मजबूत करें। समाज में प्रेम, भाईचारे और आपसी विश्वास का वातावरण बनाएं।
5. आत्मबोध का दीप: अपने भीतर मौजूद अहंकार, ईर्ष्या, छल और अन्याय जैसी प्रवृत्तियों को पहचानें तथा उन्हें दूर करने का प्रयास करें। आत्मसुधार ही सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन की पहली सीढ़ी है।
महानता पद और प्रतिष्ठा से नहीं, दूसरों के जीवन में बदलाव से तय होती है
याद रखिए, दीपक की सार्थकता उसकी ऊंचाई से नहीं, बल्कि उसके प्रकाश से निर्धारित होती है। इसी तरह मनुष्य की महानता उसके पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से नहीं, बल्कि इस बात से पहचानी जाती है कि उसके होने से कितने लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया।
आज दुनिया को बारूद की चकाचौंध से अधिक मानवीय संवेदना के प्रकाश की आवश्यकता है। ऐसी समृद्धि चाहिए, जिसमें किसी की भूख पर किसी दूसरे का वैभव खड़ा न हो। ऐसा विकास चाहिए, जिसमें प्रकृति, समाज और मनुष्य तीनों का सम्मान सुरक्षित रहे।
दीपावली हमें यही अवसर देती है कि हम अपने व्यक्तिगत उत्सव को सामाजिक उत्सव में बदलें। हमारी वाणी किसी टूटे हुए मन को सहारा दे, हमारे कर्म किसी वंचित को आगे बढ़ने का अवसर दें, हमारी कमाई किसी जरूरतमंद के काम आए और हमारी उपलब्धियां समाज के लिए उपयोगी बनें।
विश्वकल्याण की भावना से प्रकाशित हो मानवता
आइए, इस दीपोत्सव पर केवल घरों की चौखटें ही नहीं, बल्कि अपने हृदय के द्वार भी प्रकाशित करें। हमारी खुशियों में उन लोगों को भी शामिल करें, जो किसी कारणवश जीवन की मुख्यधारा से दूर हैं।
दीपावली का सर्वोच्च उत्सव वह नहीं है, जब केवल हमारा घर जगमगाए, बल्कि वह है, जब हमारे प्रयासों से किसी दूसरे के जीवन में भी आशा का सूर्योदय हो। हमारे जाने के बाद भी हमारे विचारों का प्रकाश जीवित रहे, हमारे बच्चों के संस्कारों में दिखाई दे, समाज में सद्भाव बनकर विकसित हो और पूरी धरती पर मानवता का संदेश फैलाए।
आइए, ऐसा दीप जलाएं जिसकी लौ में स्वार्थ नहीं, सेवा हो; जिसकी रोशनी में अहंकार नहीं, करुणा हो और जिसके प्रकाश में केवल अपना परिवार नहीं, बल्कि संपूर्ण संसार समाहित हो।
क्योंकि दीपोत्सव की वास्तविक सफलता तभी है, जब हम स्वयं प्रकाशित होने के साथ दूसरों के जीवन को भी प्रकाशमान बनाने का संकल्प निभाएं।
'जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना, धरा पर अंधेरा कहीं रह न जाये...'
