दिल्ली विश्वविद्यालय का पुस्तकालय विज्ञान विभाग 'शिक्षा का मुकुट': प्रो. के.पी. सिंह
उद्घाटन और डीयू विभाग का गौरवशाली इतिहास
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में गांधी भवन के लोकप्रिय निदेशक एवं पुस्तकालय विज्ञान के विद्वान प्रो. के.पी. सिंह ने पुस्तकालय विज्ञान विभाग को "शिक्षा का मुकुट" बताते हुए उसकी महत्ता पर ज़ोर दिया।
प्रो. सिंह ने कहा कि डीयू का पुस्तकालय विज्ञान विभाग भारत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षण प्रदान करने वाला विभाग है, जो स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विभाग के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि:
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यह अमेरिका के बाद पुस्तकालय एवं सूचना के क्षेत्र में स्नातकोत्तर शिक्षा शुरू करने वाला पहला विभाग है।
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यह विभाग कॉमनवेल्थ देशों में पहला है जहाँ पद्मश्री डॉ. एस.आर. रंगनाथन को मिला।
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यह विभाग भारत में 1972 में कंप्यूटर एप्लिकेशन पेपर, सेमेस्टर सिस्टम और ट्यूटोरियल को शिक्षा में शामिल करने वाला पहला है।
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उन्होंने यह भी जोड़ा कि पुस्तकालय ज्ञान अर्जित करने का सबसे महत्वपूर्ण मंच है, जहाँ लोग शिक्षा के माध्यम से अपने व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।
विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. आर.के. भट्ट ने DULSA पदाधिकारियों का स्वागत एवं सम्मान किया और इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. बेदी को शुभाशीष प्रदान करने के लिए धन्यवाद दिया।
विकसित भारत और पांडुलिपियों की भूमिका
कार्यक्रम के दूसरे चरण में, विभागाध्यक्ष प्रो. आर.के. भट्ट ने "विकसित भारत" के निर्माण में पुस्तकालयों और पांडुलिपियों की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने पांडुलिपियों को "हमारी राजदूत" और पुस्तकालयों को "ज्ञान के दूतावास" के रूप में वर्णित किया।
प्रो. भट्ट ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए बताया कि नालंदा और तक्षशिला के पुस्तकालयों और पांडुलिपियों ने विश्व में बौद्ध धर्म के विस्तार में सबसे बड़ा योगदान दिया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की प्राचीन पुस्तकालयों का विवरण संयुक्त राष्ट्र तक केवल संरक्षित पांडुलिपियों की वजह से ही संभव हुआ है।
पांडुलिपियाँ: देश की संस्कृति के फेफड़े
मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. हरमोहिंदर सिंह बेदी ने अपने प्रभावशाली संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांडुलिपि संरक्षण के प्रति व्यक्तिगत समर्पण का उल्लेख किया।
डॉ. बेदी ने कहा, "पांडुलिपियां देश के फेफड़े हैं, इन्हीं से देश की संस्कृति सांस लेती है।" उन्होंने जोर दिया कि यदि भारत को पुनः 'विश्व गुरु' बनना है, तो पांडुलिपियों और पुस्तकालयों का संरक्षण सर्वोपरि होना चाहिए।
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श्रुति एवं स्मृति परंपरा: डॉ. बेदी ने बताया कि 'उवाच' या 'श्रुति एवं स्मृति' की परंपरा केवल भारत में ही थी, और इस ज्ञान को लेखन तक पहुँचाने की कला भी भारत में विकसित हुई।
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दर्शन का आधार: उन्होंने कहा कि हमारा सारा अध्यात्म और दर्शन पांडुलिपियों के माध्यम से ही प्राप्त हुआ है, जिसे पुस्तकालयों ने सहेज कर रखा है।
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वैश्विक संदर्भ: उन्होंने बताया कि एशिया के इतिहासकारों, समाजविज्ञानियों और वैज्ञानिकों ने भारत को समझने के लिए ऋग्वेद की ओर ही देखा।
डॉ. बेदी ने लाहौर दंगों के दौरान बाटा कंपनी के मालिक भल्ला द्वारा पुस्तकालयों की पुस्तकों को ट्रकों में भरकर होशियारपुर पहुँचाने की मार्मिक घटना का भी उल्लेख किया, जो ज्ञान के संरक्षण के प्रति भारतीय समर्पण को दर्शाता है। अंत में, उन्होंने प्रो. के.पी. सिंह के प्रयासों की सराहना की, जिनके कारण दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय विज्ञान विभाग का कायाकल्प हुआ है। कार्यक्रम का समापन छात्र संघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री देवांश सिंह के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
