जातिवाद की राजनीति से कराहता लोकतंत्र: क्या संविधान की मूल भावना कमजोर पड़ रही है?

Democracy Groaning Under the Politics of Casteism: Is the Basic Spirit of the Constitution Weakening?
 
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( हरिश्चंद्र श्रीवास्तव सामाजिक एवम् राजनीतिक चिंतक  ) भारतीय संविधान की मूल आत्मा समानता, न्याय और अवसर की समता पर आधारित है। संविधान निर्माताओं ने ऐसे लोकतांत्रिक भारत की परिकल्पना की थी, जहाँ नागरिक की पहचान उसकी जाति, धर्म या वर्ग से नहीं, बल्कि उसकी योग्यता, अधिकारों और कर्तव्यों से हो। किंतु समय के साथ राजनीति का एक बड़ा हिस्सा जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द सिमटता दिखाई देता है, जो लोकतंत्र की मूल भावना पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

 

 

 

 

हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट हुई है कि अनेक राजनीतिक दल कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक कार्रवाई और चुनावी रणनीति जैसे विषयों को भी जातीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने लगे हैं। जब किसी आपराधिक मामले में की गई सरकारी कार्रवाई का मूल्यांकन अपराध की प्रकृति के बजाय आरोपी की जातीय पहचान के आधार पर होने लगे, तब यह लोकतांत्रिक विमर्श के लिए चिंता का विषय बन जाता है।


लोकतंत्र में किसी भी सरकार की जिम्मेदारी कानून का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना है। यदि अपराधी की पहचान उसके अपराध से अधिक उसकी जाति के आधार पर निर्धारित की जाने लगे, तो न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है। कानून की दृष्टि में प्रत्येक नागरिक समान है और अपराध का मूल्यांकन भी केवल साक्ष्य एवं विधिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।



संविधान निर्माताओं ने शायद यह कल्पना नहीं की होगी कि भविष्य में जातीय पहचान राजनीतिक विमर्श का इतना प्रभावी आधार बन जाएगी कि अनेक सार्वजनिक मुद्दों का मूल्यांकन भी उसी दृष्टि से होने लगे। यदि राजनीति का केंद्र बिंदु केवल जातीय ध्रुवीकरण बन जाए, तो समतामूलक समाज की संवैधानिक अवधारणा को व्यवहार में लागू करना और कठिन हो सकता है।


एक और गंभीर चुनौती तब सामने आती है जब राजनीतिक दल चुनावी लाभ के लिए आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को भी टिकट देने या सार्वजनिक सम्मान प्रदान करने से नहीं हिचकते। यदि राजनीति में धनबल, बाहुबल और जातीय प्रभाव योग्यता, नैतिकता और जनसेवा से अधिक प्रभावशाली हो जाएँ, तो संविधान, न्यायपालिका और प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव पड़ना स्वाभाविक है।


यह चिंता केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं है। भारतीय राजनीति में कमोबेश सभी दल समय-समय पर जातीय समीकरणों, प्रभावशाली समूहों और चुनावी गणित से प्रभावित दिखाई देते हैं। अंतर केवल इतना होता है कि विभिन्न दलों के सामाजिक आधार और राजनीतिक प्राथमिकताएँ अलग-अलग होती हैं। परिणामस्वरूप लोकतंत्र का मूल उद्देश्य—योग्य, ईमानदार और जनहित के प्रति समर्पित नेतृत्व का चयन—कई बार पीछे छूट जाता है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जातीय पहचान के बजाय सुशासन, पारदर्शिता, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सुरक्षा और विकास जैसे मुद्दों पर केंद्रित हो। यदि लोकतंत्र को वास्तव में मजबूत बनाना है तो राजनीतिक दलों, समाज और मतदाताओं—सभी को संविधान की मूल भावना के अनुरूप समानता, न्याय और नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।



भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्मसुधार की क्षमता है। समय आ गया है कि राजनीति जातीय ध्रुवीकरण से ऊपर उठकर संविधान की उस मूल भावना को पुनः स्थापित करे, जिसमें प्रत्येक नागरिक केवल नागरिक है—न कि किसी जातीय या सामाजिक खांचे का प्रतिनिधि।

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