नैतिक मूल्यों के बिना लोकतंत्र अधूरा है: जातीय राजनीति पर पुनर्विचार का सम

Democracy is incomplete without moral values: A challenge to rethink caste politics
 
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( हरिश्चंद्र श्रीवास्तव सामाजिक एवम् राजनीतिक चिंतक  )  किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक व्यवस्था केवल शासन का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज के चरित्र, संस्कृति और भविष्य को भी दिशा देती है। स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण केवल भाषणों या नारों से नहीं होता, बल्कि उसके लिए दूरदृष्टि, नैतिकता, योग्यता और समाज के प्रति समर्पण रखने वाले नेतृत्व की आवश्यकता होती है।


स्वाभाविक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति या समुदाय के प्रति आत्मीयता रखता है, लेकिन जब सार्वजनिक जीवन में निर्णय योग्यता, प्रतिभा, क्षमता, ईमानदारी और प्रतिबद्धता के बजाय जातीय समीकरण, धनबल और बाहुबल के आधार पर होने लगते हैं, तब लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर होने लगती है। इतिहास गवाह है कि ऐसी व्यवस्थाएं अंततः अपने ही बोझ से कमजोर पड़ जाती हैं।

 

 

 

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष, रक्षा और वैश्विक कूटनीति जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। आज विश्व मंच पर भारत की पहचान पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है। लेकिन इसी के समानांतर सामाजिक और नैतिक मूल्यों में आई गिरावट भी चिंता का विषय है। प्रतिदिन सामने आने वाली घटनाएं यह सोचने पर विवश करती हैं कि क्या हमारी सांस्कृतिक और सनातन जीवन-मूल्य केवल पुस्तकों और भाषणों तक सीमित होकर रह गए हैं?
समाज का चरित्र उसके नेतृत्व से निर्मित होता है। नेताओं का आचरण, भाषा, व्यवहार, जीवनशैली और नैतिक दृढ़ता ही आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बनती है। यद्यपि अनेक सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन भारतीय जीवन-मूल्यों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, फिर भी नैतिक पतन की गति रुकती दिखाई नहीं देती। दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक दल भी कई बार इसे अपनी व्यावहारिक मजबूरी मानकर ऐसे लोगों को आगे बढ़ाने लगते हैं, जिनकी पहचान सेवा और चरित्र से अधिक जातीय प्रभाव या राजनीतिक उपयोगिता से होती है।


आज राजनीति का बड़ा आधार जातीय गणित बन चुका है। उम्मीदवारों का चयन, चुनावी रणनीति, प्रशासनिक नियुक्तियों से लेकर सहयोगियों के चयन तक अनेक स्थानों पर जातीय समीकरण प्रभावी दिखाई देते हैं। यह प्रवृत्ति कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। क्या हम उपचार के लिए डॉक्टर का चयन उसकी जाति देखकर करेंगे? क्या सेना में भर्ती जातीय आधार पर हो सकती है? क्या न्यायालय में हम योग्य अधिवक्ता के बजाय अपनी बिरादरी के वकील को प्राथमिकता देंगे? क्या भवन निर्माण, शिक्षा या विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी योग्यता से अधिक जाति को महत्व दिया जाना चाहिए? यदि उत्तर 'नहीं' है, तो राजनीति में यह सोच क्यों स्वीकार्य हो रही है?
भारतीय समाज में अनेक ऐसे समुदाय रहे हैं जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका, साहित्य, विज्ञान, अध्यात्म और राष्ट्र निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान दिया। इनमें कायस्थ समाज का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इसके बावजूद वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कई ऐसे समुदाय स्वयं को हाशिये पर महसूस करते हैं, क्योंकि वे संगठित जातीय राजनीति का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। यह स्थिति केवल किसी एक समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी वर्गों के लिए चिंता का विषय है जो योग्यता आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखते हैं।


लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है जब अवसर और सम्मान का आधार व्यक्ति की क्षमता, ईमानदारी और जनसेवा हो, न कि उसकी जातीय पहचान। यदि राजनीति केवल वोट बैंक के गणित तक सीमित रह जाएगी, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर लोगों का विश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विचार परंपरा रही है। इस देश ने सदियों से संवाद, चिंतन और सामाजिक सहमति के माध्यम से कठिन समस्याओं का समाधान खोजा है। आज आवश्यकता है कि राजनीति भी जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर नैतिक मूल्यों, सादगी, पारदर्शिता और जनहित को अपनी प्राथमिकता बनाए।


प्रश्न यह नहीं है कि परिवर्तन कब होगा, बल्कि यह है कि इसकी शुरुआत कौन करेगा। कौन सा राजनीतिक दल योग्यता, चरित्र और ईमानदारी को जातीय समीकरणों से ऊपर रखकर नई राजनीतिक संस्कृति का मार्ग प्रशस्त करेगा? यह विमर्श जितनी जल्दी शुरू होगा, भारतीय लोकतंत्र उतना ही मजबूत और समाज उतना ही समरस बन सकेगा।
परिवर्तन की हर यात्रा एक आवाज़ से शुरू होती है। इसलिए समय आ गया है कि समाज, बुद्धिजीवी वर्ग और राजनीतिक नेतृत्व मिलकर ऐसी व्यवस्था के निर्माण का संकल्प लें, जहां व्यक्ति का मूल्य उसकी जाति नहीं, बल्कि उसका चरित्र, कर्म और राष्ट्र के प्रति समर्पण तय करे।

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