लोकतंत्र सड़कों पर नहीं, संवाद की मेज़ पर लिखा जाए

Democracy should not be written on the streets, but on the table of dialogue
 
लोकतंत्र सड़कों पर नहीं, संवाद की मेज़ पर लिखा जाए

लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव (विभूति फीचर्स)

लोकतंत्र केवल चुनाव प्रक्रिया या मतपेटी तक सीमित रहने वाली व्यवस्था नहीं है; इसका वास्तविक अस्तित्व विचारों के मतभेद और असहमति की स्वतंत्रता में सांस लेता है। लोकतंत्र में असहमति को कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी संजीवनी माना गया है। यही कारण है कि धरना, प्रदर्शन, आंदोलन और हड़ताल को लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक अभिव्यक्ति माना जाता है। लेकिन सवाल तब उठने लगता है जब विरोध और प्रदर्शन संवाद का जरिया बनने के बजाय बातचीत के रास्ते में रुकावट बन जाएं। ऐसे मोड़ पर लोकतंत्र स्वयं अपने सिद्धांतों के कटघरे में खड़ा दिखाई देने लगता है।

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विरोध का ऐतिहासिक व नैतिक आधार

भारत का इतिहास जनचेतना और वैचारिक विरोध के नैतिक उदाहरणों से भरा पड़ा है:

  • करुणा और सुधार: भगवान बुद्ध का करुणा पथ हो या मध्यकालीन संतों की सामाजिक चेतना, सभी ने समाज में व्याप्त विसंगतियों का नैतिक विरोध किया।

  • गांधी का सत्याग्रह: महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के माध्यम से यह सिखाया कि आंदोलन का अंतिम उद्देश्य किसी विरोधी को पराजित करना नहीं, बल्कि उसके विवेक को जगाना है।

सच्चा आंदोलन समाज के लिए एक 'सेफ्टी वाल्व' (सुरक्षा वाल्व) की तरह कार्य करता है, जो असंतोष को एक सकारात्मक दिशा देता है।

जब 'नारे' 'तर्क' पर भारी पड़ने लगें

स्वतंत्रता के बाद के आंदोलनों ने निसंदेह भारतीय राजनीति और नीतियों को नई दिशा दी, परंतु समय के साथ विरोध का स्वरूप बदलता गया। आज के दौर में चिंताजनक स्थिति यह है कि:

  • तर्क और तथ्य सामने आने से पहले सड़कों पर मजमा जमने लगता है।

  • समस्या के शांतिपूर्ण समाधान से पहले समाज में वैचारिक विभाजन की रेखाएं खींच दी जाती हैं।

  • राजनीति, शिक्षा और सामाजिक असंतोष में अतिवाद (Extremism) का प्रवेश लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

याद रखना होगा: किसी एक वर्ग का विरोध करने का अधिकार जितना पवित्र और महत्वपूर्ण है, किसी सामान्य नागरिक के निर्बाध जीवन जीने का अधिकार भी उतना ही संवैधानिक और प्राथमिक है।

निर्धारित स्थान और जनजीवन में संतुलन

दुनिया भर के परिपक्व लोकतंत्रों में विरोध प्रदर्शनों के लिए निश्चित स्थान तय किए गए हैं:

  • भारत में नई दिल्ली का जंतर-मंतर राजनैतिक और सामाजिक विरोध के लिए एक व्यवस्था के तहत आरक्षित है।

  • इसी तर्ज पर लंदन (हाइपर पार्क), न्यूयॉर्क और वाशिंगटन जैसे वैश्विक शहरों में भी प्रदर्शन के लिए विशेष क्षेत्र निर्धारित हैं, जिन्हें देखने पर्यटक भी पहुँचते हैं।

इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि विरोध की आवाज़ भी दर्ज हो और आम जनता की दिनचर्या भी प्रभावित न हो।

वास्तविक संकट: 'आंदोलन' नहीं, 'संवादहीनता'

आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट सड़क पर उतरती भीड़ नहीं, बल्कि संस्थानों की संवादहीनता है। जब प्रशासनिक और राजनीतिक संस्थाएं जनता की आवाज़ को सुनना बंद कर देती हैं, तब सड़कें बोलने पर मजबूर हो जाती हैं।

भविष्य के लोकतंत्र को उग्र विरोध की नहीं, बल्कि संवाद की एक नई संस्कृति की आवश्यकता है:

  1. समयबद्ध जन-सुनवाई: जनता की समस्याओं के समाधान के लिए एक पारदर्शी और समयबद्ध व्यवस्था हो।

  2. नीति-निर्माण में विमर्श: सार्वजनिक विमर्श और नागरिकों के सुझावों को सरकारी नीतियों का हिस्सा बनाया जाए।

  3. अंतिम विकल्प के रूप में आंदोलन: आंदोलन को समस्याओं का समाधान निकालने का पहला हथियार नहीं, बल्कि अंतिम विकल्प (Last Resort) माना जाए।

 

किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता का पैमाना सड़कों पर जुटी भीड़ के शोर से नहीं, बल्कि वार्ता की मेज़ पर होने वाली चर्चा की गहराई से तय होता है। आने वाला समय उसी समाज का है जहाँ असहमति किसी टकराव की वजह न बनकर, सर्वसम्मति की खोज का माध्यम बने। यदि लोकतंत्र का अगला अध्याय सड़कों के बजाय संवाद के पन्नों पर लिखा जाए, तो यही एक सशक्त और आदर्श समाज की स्थापना करेगा।

 

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