काश! मैं बादल होता: जीवन के छोटे अनुभवों से उपजी कविताओं की दुनिया
(विवेक रंजन श्रीवास्तव — विभूति फीचर्स)
कविता के लिए हमेशा किसी असाधारण घटना की आवश्यकता नहीं होती। एक खाली मेज, आकाश में उड़ती पतंग, पहली बारिश की खुशबू, किसी मित्र की स्मृति या मन में उठी कोई छोटी-सी शिकायत भी कविता का आधार बन सकती है। आशुतोष झुड़ेले ‘ओ रे कबीरा’ का कविता-संग्रह ‘काश! मैं बादल होता’ ऐसी ही सहज अनुभूतियों से जन्मी 51 कविताओं का संसार है। कवि स्वयं भी मानते हैं कि उनकी कविताएं जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, त्योहारों, घटनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों से आकार लेती हैं।
इस संग्रह को पढ़ते हुए महसूस होता है कि कवि केवल कविता लिखने का प्रयास नहीं करता, बल्कि अपने आसपास के जीवन को पकड़ने और उसके अर्थ तलाशने की कोशिश करता है। ‘बगीचे की मेज’ इसका सुंदर उदाहरण है। सामान्य दिखाई देने वाली एक मेज कवि की दृष्टि में अनेक जीवन-कथाओं की साक्षी बन जाती है। उसके आसपास बुजुर्ग हैं, बच्चे हैं, प्रेमी युगल हैं, अकेलेपन की तलाश में आए लोग हैं और अपने हिस्से की जिंदगी के लिए संघर्ष करते चेहरे भी। अंत में जब वही मेज खाली होती है तो कवि को लगता है—“यहीं तो मेरी मुलाकात आज उम्मीद से होने वाली है।” किसी साधारण वस्तु को जीवन के रूपक में बदल देना इस कविता की उल्लेखनीय विशेषता है।
स्मृतियों और खोती संवेदनाओं का संसार
संग्रह में स्मृति एक महत्वपूर्ण संवेदनात्मक आधार के रूप में उपस्थित है। ‘चुरा ले गए’ में कवि उन चीजों को तलाशता है जो आधुनिक जीवन की आपाधापी में धीरे-धीरे हमसे दूर होती जा रही हैं—सुबह की ताजगी, शाम की सादगी, पहली बारिश की खुशबू, बगीचे के फूल और आंगन की मिट्टी। “कुछ लोग पहली बारिश की खुशबू चुरा ले गए” जैसा बिंब केवल सौंदर्यबोध नहीं जगाता, बल्कि तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच संवेदनाओं के क्षरण की ओर भी संकेत करता है।
‘पतझड़ के भी रंग होते हैं’ विपरीत परिस्थितियों में भी सौंदर्य तलाशने की दृष्टि प्रस्तुत करती है। यहां पतझड़ केवल समाप्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि चीजों को नए नजरिए से देखने का अवसर बन जाता है। सूखे पत्तों, गिरे फूलों और पुराने गीतों में भी रंग और स्मृतियां मौजूद हैं। यही भाव संग्रह के आशावादी स्वर को मजबूत करता है।
वहीं ‘पतंग सी जिंदगी’ में जीवन की उड़ान और उसकी डोर के बीच सुंदर साम्य दिखाई देता है। पतंग दूर तक जाती है, हवा से संघर्ष करती है, ऊपर उठती है और फिर भी अपनी डोर से जुड़ी रहती है। स्वतंत्रता और संबंधों के बीच मनुष्य की स्थिति को कवि ने एक परिचित लोक-प्रतीक के माध्यम से सहजता से व्यक्त किया है।
सामाजिक सरोकार और आत्ममंथन
आशुतोष की कविताएं केवल निजी अनुभवों तक सीमित नहीं रहतीं। ‘भीड़ की आड़ में’ सामाजिक विडंबनाओं पर सवाल उठाती है। धर्म, जाति और सामूहिक पहचान के पीछे छिपकर मनुष्य अपने व्यक्तिगत दोषों से बचने का प्रयास करता है। कविता पाठक को इस आत्ममंथन तक ले जाती है कि दोष केवल भीड़ या समूह का नहीं, अंततः व्यक्ति के अपने आचरण का भी हो सकता है।
‘हम सोचते हैं’ इसी तेवर को व्यंग्य में बदलती है और सामाजिक स्मृति तथा आत्ममुग्धता पर प्रश्न खड़े करती है। कवि अपने समय और समाज को बाहर खड़े होकर देखने के बजाय उसके भीतर मौजूद विरोधाभासों को पहचानने का प्रयास करता है।
‘दर दर गंगे’ में सांस्कृतिक आस्था और पर्यावरणीय चिंता एक साथ दिखाई देती हैं। गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा में कवि उस नदी की पीड़ा को दर्ज करता है, जिसे भारतीय समाज में मां का दर्जा दिया गया है और जिसकी आरती की जाती है, लेकिन जिसके संरक्षण की जिम्मेदारी को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। “बहाती जा रही बस आंसू” जैसे बिंब श्रद्धा को पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जोड़ते हैं। ऐसे कई रूपक कवि की अनुभवजन्य भाषा, भाव-संपदा और शब्द-सामर्थ्य को सामने लाते हैं।
यह आशुतोष की पहली कृति है, लेकिन रचनाओं में अनुभव की सहजता, भाषा की पकड़ और विषयों की विविधता दिखाई देती है। संग्रह का स्वर व्यापक होने के साथ-साथ सरल और आत्मीय भी है।
‘भोपाल’: कम शब्दों में त्रासदी की गूंज
‘भोपाल’ संग्रह की छोटी किंतु प्रभावशाली कविताओं में शामिल है। “हवा क्या होती है, पूछो भोपाल से...” जैसे लगातार उठते प्रश्न एक ऐतिहासिक त्रासदी को महज एक घटना के रूप में सीमित नहीं रहने देते, बल्कि उसे सामूहिक स्मृति का हिस्सा बना देते हैं। शब्द कम हैं, लेकिन उनके पीछे भय, पीड़ा, अन्याय और जीवन-मृत्यु का व्यापक अनुभव उपस्थित है। भोपाल गैस त्रासदी को केंद्र में रखकर लिखी गई यह कविता संवेदनात्मक अभिव्यक्ति के साथ दस्तावेजी महत्व भी अर्जित करती है।
रिश्तों की डोर और आत्मबोध
रिश्तों की नाजुकता भी कवि की प्रमुख चिंताओं में शामिल है। ‘डोर’ में समय और संबंधों को ऐसे धागे के रूप में देखा गया है, जो लंबा होते-होते अपना सिरा खो सकता है और मामूली झटके से टूट भी सकता है। ‘रिश्ते’ अपेक्षा और उपेक्षा के बजाय देने और कर्म को महत्व देने की बात करती है।
‘शिकायत थी मुझको’ में शिकायतों की लंबी सूची अंततः आत्मबोध में बदल जाती है। कबीरा का मुस्कुराकर ‘मूरख’ कहना कविता को महज उपदेश बनने से बचाता है और उसे आत्मव्यंग्य का रूप देता है। स्वयं पर व्यंग्य कर पाने की क्षमता रचनाकार की आत्मदृष्टि को भी सामने लाती है।
‘पहचानो तुम कौन हो?’ संग्रह की उल्लेखनीय रचनाओं में है। भेड़ों के बीच पला शेर का बच्चा स्वयं को भेड़ समझता रहता है। अपनी वास्तविक पहचान से अनजान वह शेर हमारे भीतर छिपी संभावनाओं का रूपक बन जाता है। कविता का सवाल केवल उस शेर से नहीं, पाठक से भी है—हम अपने बारे में जो मानते हैं, क्या वास्तव में वही हमारी पहचान है?
भाषा में लोकलय और विविधता
संग्रह की भाषा भी इसकी अपनी विशिष्ट पहचान बनाती है। हिंदी के साथ उर्दू और लोकभाषा के शब्द सहज रूप में आते हैं। पुनरावृत्ति, संवाद और लोकलय कई कविताओं में मंचीय प्रभाव पैदा करते हैं। ‘तू है गज’ में बार-बार दोहराया गया संबोधन हाथी को भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में शक्ति, करुणा और अस्तित्व के व्यापक प्रतीक के रूप में देखने का अवसर देता है।
‘काश! मैं बादल होता’ की कविताएं बड़े दार्शनिक निष्कर्षों का दावा नहीं करतीं। वे जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों से छोटी-छोटी रोशनियां चुनती हैं। यही इनकी खासियत है। कहीं स्मृति है, कहीं व्यंग्य, कहीं सामाजिक सरोकार, कहीं पर्यावरण की चिंता और कहीं आत्मसंवाद।
कवि कभी बादल बनकर उड़ना चाहता है, कभी पतंग बनकर अपनी डोर से जुड़ा रहता है, कभी खाली मेज पर उम्मीद तलाशता है और अंततः स्वयं से ही पूछता है—“पहचानो तुम कौन हो?”
इन कविताओं से यह भी स्पष्ट होता है कि आशुतोष साहित्य के गंभीर पाठक हैं और कला-संस्कृति में उनकी गहरी रुचि है। उनकी यह अभिरुचि रचनाओं में विभिन्न रूपों में मुखर होती दिखाई देती है।
कविता यहां जीवन से अलग सजाया हुआ कोई संसार नहीं, बल्कि जीवन को कुछ देर ठहरकर देखने की कला बन जाती है। ‘काश! मैं बादल होता’ इसी ठहरने, देखने और फिर भीतर कुछ बदल लेने का सहज आमंत्रण है। आशुतोष की आगामी रचना-यात्रा के अगले पड़ावों की प्रतीक्षा स्वाभाविक रूप से बनी रहती है।
