काश... तुम साथ होते: पुरानी स्मृतियों के झरोखे से गूंजता एक अनकहा अहसास

If only... you were here: An unspoken feeling echoing from the window of old memories.
 
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Kash Tum Sath Hote Short Story: एक लंबे अरसे के बाद जब अपने पुराने शहर की गलियों में कदम रखा, तो मंज़र पूरी तरह बदल चुका था। चौराहों पर वही पुरानी चहल-पहल तो थी, लेकिन दुकानों के चेहरे अब अजनबी से लग रहे थे। गली के मोड़ पर जहाँ कभी पंडित नानक चंद की कलाकंद और तड़के वाले रायते की खुशबू खींचा करती थी, वहाँ अब आधुनिकता की छाप थी।

आगे बढ़कर जब अपने पुराने मुहल्ले में कदम रखा, तो बचपन और किशोरावस्था का वह परिचित मकान पहचान में ही नहीं आया। जिस घर में कभी खुली गैलरी, बड़ा दालान और कमरे हुआ करते थे, उसकी दीवारों पर अब चमचमाती टाइल्स लग चुकी थीं। लेकिन बाहरी हुलिया भले बदल गया हो, उस मकान से जुड़ी पुरानी यादें आज भी दिल में उतनी ही तरोताज़ा थीं।

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संकोच, शर्मीलापन और किशोरावस्था का पहला आकर्षण

वह दौर संचार क्रांति और मोबाइल फोन से बहुत दूर था। किशोरावस्था में किसी चेहरे को दूर से देखकर दिल की धड़कनें तेज़ हो जाना स्वाभाविक था, लेकिन सम्मुख जाकर मन की बात कहने की हिम्मत जुटा पाना उस ज़माने में आसान न था।

दो भाइयों की लाड़ली 'सुरभि' को जब भी सड़क से गुजरते देखता, तो संकोचवश रास्ते बदलकर किनारे हो जाया करता था। कागज़ की पुड़िया बनाकर दिल का हाल भेजने का तरीका उस दौर के कई युवा अपनाते थे, लेकिन शर्मीले स्वभाव के कारण कभी ऐसी हिम्मत नहीं हुई। फिर भी, एक ऐसा निश्छल आकर्षण था जो सुरभि के अलावा किसी और की तरफ ध्यान ही नहीं जाने देता था।

 सामाजिक परंपराएँ और राहों का अलग होना

उस दौर की सामाजिक व्यवस्था में कम उम्र में ही बेटियों के विवाह की चिंता प्राथमिकता बन जाती थी। सत्रह से बीस वर्ष की आयु में गृहस्थी का बोझ संभालना उस समय की सामाजिक संरचना का हिस्सा था। ना तो दोनों के बीच कभी सीधे बातचीत का मौका मिला और ना ही उस दौर की सामाजिक सीमाओं को लांघने का साहस दोनों में से कोई जुटा सका। नतीजतन, पुरातन मान्यताओं के आधार पर राहें अलग हो गईं। इसके बाद समय पंख लगाकर उड़ता रहा—अपनी-अपनी गृहस्थियों में उलझकर जीवन आगे बढ़ता गया और खत लिखने का दौर कब व्हाट्सएप के दौर में बदल गया, पता ही नहीं चला।

सालों बाद सूरत से आया वह एक फोन कॉल

एक दिन जब मैं लाइब्रेरी में किताबों के बीच खोया हुआ था, अचानक मोबाइल पर एक अनजान नंबर से फोन आया।

  • "क्या मैं मिस्टर सुमित से बात कर रही हूँ?" दूसरी तरफ से एक शांत आवाज़ आई।

  • "जी हाँ, कहिए।"

  • "सूरत (गुजरात) से बोल रही हूँ। अखबारों में आपके लेख पढ़ती रहती हूँ, तो आज बात करने का मन हुआ।"

बातचीत के चंद लम्हों में ही समझ आ गया कि फोन पर कोई और नहीं, बल्कि सुरभि ही थी। सालों बाद हुई इस बातचीत में पुरानी यादों के पन्ने खुद-ब-खुद खुलते चले गए। काली बूटेदार साड़ी पहनकर सहेली की शादी में जाने की वह पुरानी छवि, रामपुर और झाँसी में उसके बिताए दिन—सब कुछ एक पल में जीवंत हो उठा। सुरभि ने मुस्कुराते हुए शिकवा भी किया, "जब इतना प्यार करते थे, तो कभी बताया क्यों नहीं?"

 अधूरापन भी ज़िंदगी का एक हिस्सा है

बातचीत के दौरान दोनों के बच्चों और उनके अपने-अपने खुशहाल परिवारों का ज़िक्र हुआ। संवाद के अंतिम पड़ाव पर सुरभि ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा—अब तो यही बेहतर है कि जो जहाँ है, वहीं खुश रहे। लेकिन क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि अगर हम साथ होते, तो ज़िंदगी कुछ और होती?"

जवाब में यही निकल पाया कि ज़िंदगी में सब कुछ इंसान के हाथ में नहीं होता और यह अधूरापन ही शायद जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है। सुरभि के मुँह से निकले "काश... ऐसा होता" के साथ फोन कट गया, लेकिन वे शब्द हवा में एक उदास और खूबसूरत अहसास बनकर तैरते रहे।

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