जाति से ऊपर भक्ति: माता शबरी और सनातन समरसता का संदेश
डॉ. राघवेंद्र शर्मा (विनायक फीचर्स) आज के दौर में, जब वैश्विक मंच पर भारत अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है, उसी समय आंतरिक स्तर पर समाज को जातियों के संकीर्ण खांचों में बाँटकर खंडित करने की साजिशें चिंताजनक रूप से तेज़ होती जा रही हैं। यह एक विडंबना ही है कि जिस सनातन संस्कृति ने “वसुधैव कुटुंबकम्” का उद्घोष किया, आज उसी के अनुयायी परस्पर वैमनस्य की अग्नि में झुलसते दिखाई दे रहे हैं।
वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में एक स्पष्ट दरार उभर कर सामने आ रही है। आरक्षित वर्ग के भीतर सवर्णों के प्रति असंतोष और आक्रोश की भावना पनप रही है, वहीं सवर्ण समाज का एक हिस्सा अपनी समस्त समस्याओं का मूल आरक्षित वर्ग को मानकर अपनी ऊर्जा आरोप-प्रत्यारोप में नष्ट कर रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि यह वैचारिक प्रदूषण समूचे हिंदू समाज की प्रकृति नहीं, बल्कि मुट्ठी भर अवसरवादी तत्वों का षड्यंत्र है, जो अपने स्वार्थ साधने के लिए सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा हैं। दुर्भाग्यवश, इस संकीर्ण राजनीति की कीमत पूरे सनातन समाज को अपनी सामूहिक शक्ति के क्षरण के रूप में चुकानी पड़ रही है।
ऐसे अंधकारमय समय में हमारे वेद, पुराण, शास्त्र और उपनिषद ही वह दीपस्तंभ हैं, जो समाधान का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यदि हम निष्पक्ष भाव से अपने आध्यात्मिक इतिहास के पन्नों को पलटें, तो अनेक ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जो आज खड़ी की गई कृत्रिम दीवारों को ध्वस्त करने में सक्षम हैं। इन्हीं में से एक कालजयी और हृदयस्पर्शी प्रसंग है— माता शबरी का।
माता शबरी की कथा केवल एक भक्त और भगवान के मिलन की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता का वह सर्वोच्च प्रतिमान है, जिसे स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने स्थापित किया। आज के विकृत सामाजिक मानकों के आधार पर देखें तो श्रीराम को क्षत्रिय होने के कारण सवर्ण वर्ग का प्रतीक और शबरी को उनके भील मूल के कारण दलित या आदिवासी वर्ग की श्रेणी में रखा जा सकता है। किंतु सनातन संस्कृति की मूल चेतना इस प्रकार के वर्गीकरण को सिरे से नकारती है।
भारतीय मनीषियों का स्पष्ट मत रहा है कि मनुष्य जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और भाव से महान बनता है। प्रत्येक जीव अपने पूर्व संचित कर्मों के अनुसार प्रारब्ध प्राप्त करता है और भक्ति मार्ग पर अग्रसर होकर वह समस्त लौकिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। माता शबरी का जीवन इसी सनातन सत्य का जीवंत उदाहरण है। गुरु मतंग ऋषि के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा और आज्ञापालन भाव ने उन्हें निर्जन वन में साधु-संतों की सेवा के पथ पर अग्रसर किया।
तत्कालीन समाज में भी कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग थे, जो उन्हें अछूत मानकर तिरस्कार करते थे। किंतु शबरी की महानता देखिए कि वे उन्हीं लोगों की भी गुप्त रूप से सेवा करती रहीं। वे नहीं चाहती थीं कि सेवा पाने वालों को यह जानकर ग्लानि हो कि उनकी सेवा किसी तथाकथित निम्न वर्ग की स्त्री ने की है। यह अहंकार-शून्य, निस्वार्थ सेवा ही उन्हें उस आध्यात्मिक ऊँचाई तक ले गई, जहाँ बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं पहुँच सके।
माता शबरी की इसी निष्कलुष भक्ति से अभिभूत होकर मतंग ऋषि ने समस्त ऋषि समाज के समक्ष यह घोषणा की थी कि स्वयं भगवान राम चलकर उनके आश्रम में आएँगे। यह प्रसंग उन लोगों के लिए करारा उत्तर है, जो स्वयं को श्रेष्ठ मानकर दूसरों को तुच्छ समझते हैं, और उनके लिए भी चेतावनी है, जो अपनी दुर्दशा के लिए दूसरों को दोषी ठहराते हैं।
जब शबरी प्रभु राम की प्रतीक्षा कर रही थीं, उसी समय अनेक तथाकथित उच्च कुलीन, विद्वान ऋषि-मुनि भी वहाँ तपस्या में लीन थे, जिन्हें यह दंभ था कि भगवान सबसे पहले उनके पास आएँगे। वे कर्मकांड और पांडित्य में उलझे रहे, जबकि भगवान राम ने उन सभी आश्रमों को छोड़कर उस भीलनी की कुटिया को चुना, जिसने अपना संपूर्ण जीवन प्रेम और सेवा में समर्पित कर दिया था।
रामायण और रामचरितमानस में यह प्रसंग इसलिए भी अद्वितीय है, क्योंकि माता शबरी ही वह एकमात्र भक्त हैं, जिन्हें स्वयं भगवान श्रीराम ने नवधा भक्ति का उपदेश दिया। प्रभु ने स्पष्ट कहा—
“मानहुँ एक भगति कर नाता”अर्थात ईश्वर के लिए केवल भक्ति का संबंध ही सर्वोपरि है। शबरी के जूठे बेरों को प्रेमपूर्वक स्वीकार करना इस बात का प्रतीक है कि श्रद्धा और प्रेम के आगे छुआछूत और ऊँच-नीच जैसी कुरीतियाँ अर्थहीन हैं।
आज के सवर्ण और आरक्षित— दोनों वर्गों को इस प्रसंग से गंभीर आत्मचिंतन करना चाहिए। हम किस आधार पर स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ या हीन घोषित करते हैं? यदि हम स्वयं को सनातनी कहते हैं, तो यह स्वीकार करना होगा कि हम सभी एक ही परमात्मा की संतान हैं। जब हमारे आराध्य ने जाति-पाति का कोई भेद नहीं किया, तो मनुष्य को यह अधिकार किसने दिया?
आज आवश्यकता है एकात्म मानववाद के उसी मूल मंत्र को पुनः आत्मसात करने की, जो मनुष्य और मनुष्य के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार करता है। जाति की दीवारें हमारी शक्ति नहीं, हमारी सबसे बड़ी कमजोरी हैं, जिनका लाभ बाहरी और विभाजनकारी शक्तियाँ उठाती रही हैं।समरसता का अर्थ केवल औपचारिक मेल-जोल नहीं, बल्कि हृदय से एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना है। सवर्ण समाज को श्रेष्ठता के दंभ से मुक्त होकर सबको साथ लेकर चलने की उदारता दिखानी होगी, वहीं आरक्षित वर्ग को भी अतीत की कटुता से ऊपर उठकर सकारात्मक भाव से मुख्यधारा में आगे बढ़ना होगा।
माता शबरी का आश्रम केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक विचारधारा था— जहाँ समर्पण ने ऊँच-नीच को परास्त कर दिया। आज प्रत्येक हिंदू को अपने भीतर वही शबरी-दृष्टि विकसित करनी होगी, जो सामने वाले में जाति नहीं, मानवता देखे।जब तक हम जातियों के मोहजाल में उलझे रहेंगे, एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं। समय की पुकार है कि हम जातिगत चश्मे उतार फेंकें और एक ऐसे समाज की रचना करें, जहाँ केवल सद्गुणों और कर्मों की पूजा हो। यही सनातन धर्म का वास्तविक सार है और यही भारत की अखंडता का स्थायी मार्ग। यदि हम इस सत्य को आत्मसात कर लें, तो कोई भी बाहरी साजिश हमारी एकता को खंडित नहीं कर पाएगी, और भारत पुनः विश्वगुरु के पथ पर अग्रसर होगा।
