धरती आबा बिरसा मुंडा का उलगुलान और जल-जंगल-जमीन का वर्तमान संकट: महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं बलिदान दिवस

'Dharti Aaba' Birsa Munda’s Ulgulan and the Current Crisis Over Water, Forests, and Land: Martyrdom Days Have Been Reduced to Mere Formalities
 
धरती आबा बिरसा मुंडा का उलगुलान और जल-जंगल-जमीन का वर्तमान संकट: महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं बलिदान दिवस

विशेष आलेख (लेखक: कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स)

"महारानी राज जाएगा एवं अबुआ राज (हमारा राज) आएगा।"

धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 'जल-जंगल-जमीन' और आदिवासी सभ्यता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले महान जननायक भगवान बिरसा मुंडा का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। अंग्रेजों के दमन और सांस्कृतिक आक्रमण के खिलाफ उनके द्वारा फूका गया 'उलगुलान' (महाविद्रोह) केवल एक राजनीतिक लड़ाई नहीं थी, बल्कि वह आदिवासी समाज की आंतरिक कुरीतियों को दूर करने, स्वदेशी संस्कृति को बचाने और एक शोषणमुक्त 'आदिम साम्यवाद' की स्थापना का सामूहिक संकल्प था।

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व्यक्तित्व का निर्माण और सामाजिक पुनर्जागरण

15 नवम्बर 1875 को खूंटी जिले के उलिहातु गांव में जन्मे बिरसा मुंडा की प्रारंभिक शिक्षा ईसाई मिशनरियों के संरक्षण में हुई। हालांकि, जब उन्होंने देखा कि मिशनरी आदिवासियों की पारंपरिक धार्मिक जमीनों (भूतकेता, पहनाई आदि) पर कब्जा करने और उनकी संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं, तो उन्होंने इसका खुलकर विरोध किया और स्कूल छोड़ दिया।

  • वैष्णव पंथ का प्रभाव: इसके बाद उन्होंने वैष्णव संत आनंद पांडे से आचार-विचार का ज्ञान लिया और मुंडा जनजातीय समाज के पुनर्गठन के लिए एक नए 'बिरसाइट पंथ' की स्थापना की।

  • सादा जीवन, उच्च विचार: उन्होंने मुंडा समाज में फैले अंधविश्वासों, पशु बलि और नशाखोरी (हड़िया पीना) पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने 'सिंगबोंगा' (एक ईश्वर) की आराधना पर बल दिया और सात्विकता, एकता व बंधुता का पाठ पढ़ाया।

सरदार आंदोलन से उलगुलान तक का ऐतिहासिक सफर

वर्ष 1858 से शुरू हुआ भूमि सुधारों का 'सरदार आंदोलन' 1890 के दशक में तब एक प्रचंड राजनीतिक क्रांति में बदल गया, जब इसकी कमान बिरसा मुंडा ने संभाली।

  • पहला विद्रोह (1895): अगस्त 1895 में उन्होंने वन संबंधी बकाये की माफी के लिए रैयतों को एकजुट किया। अंग्रेजों द्वारा मांग ठुकराए जाने पर उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खात्मे का ऐलान कर दिया। उन्हें गिरफ्तार किया गया और 2 साल की सश्रम कारावास की सजा देकर हजारीबाग जेल भेज दिया गया।

  • डोम्बारी पहाड़ी पर महासंग्राम: 1897 में जेल से छूटने के बाद जब उन्होंने देखा कि क्षेत्र अकाल और चेचक की महामारी से जूझ रहा है, तो वे जनसेवा में जुट गए। 24 दिसम्बर 1899 को रांची से लेकर सिंहभूम तक विद्रोह की आग भड़क उठी। डोम्बारी और सैलरकब पहाड़ियों पर अंग्रेजों के साथ ऐतिहासिक गुरिल्ला युद्ध हुआ, जिसमें सैकड़ों आदिवासी शहीद हुए।

  • क्रांतिकारी का अंत: 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर के घने जंगलों से सोते समय बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर रांची जेल डाल दिया गया। अंग्रेजों के क्रूर दमन के बीच 9 जून 1900 को जेल में ही रहस्मयी परिस्थितियों (कथित हैजा) के कारण इस महान क्रांतिकारी का जीवन दीप बुझ गया।

सीएनटी एक्ट और अलग झारखंड राज्य की परिणति

बिरसा मुंडा के इस ऐतिहासिक बलिदान का ही परिणाम था कि ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा के लिए छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 (CNT Act) बनाना पड़ा। आगे चलकर जल-जंगल-जमीन की रक्षा की यही कड़ियां कड़ियों से जुड़ती गईं और अंततः एक अलग 'झारखंड राज्य' के रूप में परिणत हुईं।

'अबुआ दिशुम' का अधूरा सपना और आधुनिक निगमीकरण (Corporate) का संकट

आधुनिक दौर की कड़वी सच्चाई: लेखक कुमार कृष्णन आज के परिदृश्य पर एक बेहद तीखा और गंभीर सवाल उठाते हैं। आजादी के इतने दशकों बाद और अलग झारखंड राज्य बनने के बावजूद, क्या आदिवासियों को उनका हक मिला? जवाब अत्यंत निराशाजनक है। आज भी 'अबुआ दिशुम-अबुआ राईज' (हमारा देश, हमारा राज) मात्र एक नारा बनकर रह गया है।

वर्तमान समय में आदिवासियों के सामने चुनौतियां पहले से कहीं अधिक प्रतिकूल और जटिल हो चुकी हैं:

  • संसाधनों का वरदान या अभिशाप: भारत के आदिवासी क्षेत्र प्राकृतिक संपदा के मामले में बेहद समृद्ध हैं। देश का 71% जंगल, 92% कोयला, 78% लोहा, 100% यूरेनियम और 85% तांबा इन्हीं इलाकों में है। लेकिन यही समृद्धि आज इनके लिए अभिशाप बन गई है, क्योंकि वैश्विक और राष्ट्रीय कॉर्पोरेट घरानों की गिद्ध दृष्टि इन संसाधनों पर लगी है।

  • कौड़ियों के भाव विस्थापन: विकास परियोजनाओं, बांधों, सिंचाई परिसरों, बफर जोन और वन सौंदर्यीकरण के नाम पर पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों से आदिवासियों को नाममात्र का मुआवजा देकर बेदखल किया जा रहा है। इस अंधाधुंध विस्थापन की सबसे बड़ी मार इसी समाज पर पड़ रही है।

  • कानूनों का ढुलमुल क्रियान्वयन: सीएनटी-एसपीटी एक्ट, संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा (PESA) कानून, वनाधिकार अधिनियम और ऐतिहासिक 'समता जजमेंट' जैसे सुरक्षा चक्रों को प्रभावी ढंग से लागू करने में केंद्र और राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती।

  • अधिकार मांगने पर 'ठप्पा': जब भू-माफियाओं और अवैध कब्जों के खिलाफ आदिवासी समाज अपनी आवाज उठाता है, तो कई बार उन्हें 'नक्सलवादी' का ठप्पा लगाकर प्रताड़ित किया जाता है।

 सिर्फ श्रद्धांजलियां काफी नहीं

आज खूंटी के अनिगड़ा जैसे गांवों में 'बिरसाइट पंथ' के मानने वाले लोग नाममात्र के रह गए हैं। वे अपनी गरीबी से नहीं, बल्कि आजाद भारत की सरकारों की उपेक्षा और धोखे से दुखी हैं। ऐसे में, हर साल बिरसा मुंडा के बलिदान दिवस पर उन्हें याद करना, माला चढ़ाना और बड़े-बड़े भाषण देना महज एक राजनीतिक औपचारिकता प्रतीत होता है।

यदि हम सच में 'धरती आबा' को सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो हमें उनकी विरासत को बचाना होगा— यानी आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के पारंपरिक अधिकारों को सुरक्षित करना होगा और कथित विकास की अंधी दौड़ में उनके अस्तित्व को उजड़ने से रोकना होगा।

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