Diesel to Hydrogen Train India: डीजल से हाइड्रोजन तक भारतीय रेलवे का ऐतिहासिक सफर, जानें कैसे 'ग्रीन रेल' से साकार होगा 'विकसित भारत @2047'
Indian Railways Green Hydrogen Mission: भारतीय रेल सिर्फ देश की जीवनरेखा ही नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक एकता का सबसे मजबूत स्तंभ है। प्रतिदिन करोड़ों यात्रियों और लाखों टन माल को गंतव्य तक पहुँचाने वाला यह विशाल नेटवर्क आज एक ऐतिहासिक तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। कोयले और डीजल इंजनों से शुरू हुआ यह सफर शत-प्रतिशत विद्युतीकरण के बाद अब स्वदेशी 'हाइड्रोजन फ्यूल सेल' (Hydrogen Fuel Cell) तकनीक तक पहुँच चुका है।
17 जुलाई 2026 को भारत की पहली हाइड्रोजन चालित ट्रेन के व्यावसायिक परिचालन की शुरुआत ने न केवल देश के रेल इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ा है, बल्कि भारत को शून्य-उत्सर्जन हरित परिवहन (Zero-Emission Transport) का नेतृत्व करने वाले विश्व के अग्रणि राष्ट्रों की कतार में खड़ा कर दिया है।
वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत उपस्थिति
हाइड्रोजन ट्रेन संचालन के साथ भारत अब जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है। जहां अन्य देशों ने इस तकनीक को अपनाया, वहीं भारत ने इसे स्वदेशी अनुसंधान एवं स्थानीय निर्माण के माध्यम से कम लागत पर विकसित करने का प्रयास किया है। इससे भविष्य में अन्य विकासशील देशों के लिए भी किफायती और स्वच्छ परिवहन का मार्ग खुल सकता है।
कैसे काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन?
हाइड्रोजन ट्रेन में पारंपरिक डीजल इंजन की तरह ईंधन नहीं जलाया जाता। इसमें लगे प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (PEM) फ्यूल सेल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली उत्पन्न करते हैं, जिससे ट्रेन संचालित होती है। इस पूरी प्रक्रिया में केवल जलवाष्प और ऊष्मा निकलती है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य प्रदूषक गैसों का उत्सर्जन नहीं होता।
आधुनिक तकनीक से लैस ट्रेन
नई ट्रेन में 10 आधुनिक कोच और दोनों सिरों पर दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार लगाई गई हैं। इसमें कुल 2,400 किलोवाट क्षमता की प्रणोदन प्रणाली और ऊर्जा संरक्षण के लिए लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरियां लगाई गई हैं। यह ट्रेन लगभग 2,600 यात्रियों को ले जाने में सक्षम है। इसकी अधिकतम डिजाइन गति 110 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि फिलहाल इसे 75 किलोमीटर प्रति घंटा की परिचालन गति से चलाया जा रहा है।
जींद बना देश का पहला हाइड्रोजन हब
ट्रेन संचालन के लिए हरियाणा के जींद में देश का पहला समर्पित हाइड्रोजन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग प्लांट स्थापित किया गया है। यहां लगभग 3,000 किलोग्राम ग्रीन हाइड्रोजन सुरक्षित रखने की क्षमता विकसित की गई है। सुरक्षा के लिए आधुनिक गैस लीकेज सेंसर, फ्लेम डिटेक्टर और स्वचालित शटडाउन सिस्टम लगाए गए हैं। ट्रेन के रखरखाव के लिए दिल्ली के शकूरबस्ती में विशेष डिपो भी बनाया गया है।
पर्यावरण संरक्षण में बड़ी भूमिका
हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन से डीजल की खपत में उल्लेखनीय कमी आएगी और कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य रहेगा। इससे भारत के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और जलवायु लक्ष्यों को मजबूती मिलेगी। भविष्य में कालका-शिमला, दार्जिलिंग, नीलगिरी और माथेरान जैसे पर्वतीय एवं विरासत रेलमार्गों पर भी ऐसी ट्रेनों के संचालन की संभावना है।
तेजी से बदल रही भारतीय रेलवे
भारतीय रेलवे ने पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े परिवर्तन किए हैं—
- ब्रॉड गेज नेटवर्क का 95 प्रतिशत से अधिक विद्युतीकरण पूरा।
- स्वदेशी सुरक्षा प्रणाली 'कवच' का विस्तार।
- वंदे भारत, अमृत भारत और नमो भारत जैसी आधुनिक ट्रेनों का संचालन।
- समर्पित मालवाहक कॉरिडोर से लॉजिस्टिक क्षमता में वृद्धि।
- 1,300 से अधिक रेलवे स्टेशनों का आधुनिक सुविधाओं के साथ पुनर्विकास।
- दो लाख से अधिक बायो-टॉयलेट और सौर ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार।
2030 तक नेट-जीरो का लक्ष्य
भारतीय रेलवे वर्ष 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन हासिल करने की दिशा में कार्य कर रही है। इसके तहत हाइड्रोजन ट्रेन, पूर्ण विद्युतीकरण, सौर ऊर्जा, जल पुनर्चक्रण, बायो-टॉयलेट और ऊर्जा दक्ष तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाया जा रहा है।
चुनौतियां भी कम नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की लागत, सुरक्षित भंडारण व्यवस्था और देशभर में रिफ्यूलिंग नेटवर्क विकसित करना अभी बड़ी चुनौतियां हैं। हालांकि सरकार के हरित हाइड्रोजन मिशन और तकनीकी प्रगति से आने वाले वर्षों में इन चुनौतियों के कम होने की उम्मीद है।
भारतीय रेलवे का यह परिवर्तन केवल तकनीकी उन्नयन नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक दीर्घकालिक रणनीतिक पहल है, जो आने वाले वर्षों में देश की परिवहन व्यवस्था को नई पहचान देने वाली है।

