भरे पेट राजनेताओं का दिशाहीन आंदोलन
डॉ. सुधाकर आशावादी — विनायक फीचर्स
एक समय था, जब देश में कांग्रेस की सरकार के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान से एक बड़े जनआंदोलन का शंखनाद किया था। इस आंदोलन का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि सरकारी कुशासन, भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ व्यापक संघर्ष के साथ सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक व्यवस्था में बदलाव लाना था। इसी व्यापक लक्ष्य को ‘संपूर्ण क्रांति’ का नाम दिया गया।
जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसके पीछे व्यक्तिगत सत्ता या राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी। वे स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी विचारक और सर्वोदयी नेता के रूप में अपना जीवन गरीबों और वंचितों के उत्थान के लिए समर्पित कर चुके थे। उस दौर की राजनीति में ऐसे नेता भी थे, जिनके लिए व्यक्तिगत हित से अधिक राष्ट्र और समाज का हित महत्वपूर्ण था।
संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान ने तत्कालीन केंद्र सरकार के सामने गंभीर राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी। इसी दौर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रायबरेली लोकसभा चुनाव को निरस्त कर दिया। इसके बाद देश में राजनीतिक संकट गहराया और 1975 में आपातकाल लागू हुआ। विपक्षी दलों और लोकतंत्र समर्थक शक्तियों ने इसके खिलाफ व्यापक संघर्ष किया। अंततः 1977 के आम चुनाव में कई विपक्षी दल एकजुट होकर जनता पार्टी के रूप में सामने आए और केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ।

उस दौर के आंदोलनों को व्यापक जनसमर्थन इसलिए मिला क्योंकि उनके मुद्दे आम जनता के जीवन से सीधे जुड़े हुए थे। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे विषयों ने जनता को विपक्ष के साथ खड़ा किया।
आज राजनीतिक परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता कायम करना भी है। लोकतंत्र के स्वस्थ संचालन के लिए मजबूत और जिम्मेदार विपक्ष आवश्यक है। सत्ता पक्ष पर प्रभावी निगरानी और जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाना विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका है।
लेकिन जब राजनीतिक आंदोलन स्पष्ट मुद्दों, ठोस तथ्यों और व्यापक जनसमर्थन के बजाय केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो जाते हैं, तो उनकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। जनता किसी भी आंदोलन को तभी गंभीरता से स्वीकार करती है, जब उसे उसमें अपने सरोकार और समस्याओं की वास्तविक तस्वीर दिखाई दे।
वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग को लेकर कुछ विपक्षी दलों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन ऐसे सवालों के साथ ठोस तथ्य, प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सहारा लेना भी उतना ही आवश्यक है।
भारत में चुनावी विवादों और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मामलों के समाधान के लिए न्यायपालिका सहित कई संवैधानिक और कानूनी रास्ते मौजूद हैं। राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे इन प्रक्रियाओं का उपयोग करते हुए जनता के बीच तथ्य आधारित बहस को आगे बढ़ाएं।
विपक्ष की विश्वसनीयता केवल सरकार का विरोध करने से नहीं बनती। इसके लिए वैकल्पिक नीतियां, स्पष्ट नेतृत्व, संगठनात्मक मजबूती और जनता के बीच निरंतर सक्रियता जरूरी है। यदि हर चुनावी हार का कारण केवल चुनाव आयोग या किसी संवैधानिक संस्था को माना जाएगा, तो इससे राजनीतिक दल अपनी कमियों की समीक्षा से बच सकते हैं, लेकिन जनता का विश्वास हासिल करना कठिन होगा।
वर्तमान राजनीतिक आंदोलनों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितने व्यापक जनहित से जुड़े हैं और अपने आरोपों को कितने ठोस आधार के साथ सामने रखते हैं। लोकतंत्र में आंदोलन का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी जिम्मेदारी और मर्यादा भी है।
सरकार और विपक्ष, दोनों का दायित्व है कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करें। किसी भी आंदोलन को अराजकता या टकराव की दिशा में ले जाने के बजाय तथ्य, तर्क और संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से समाधान की ओर बढ़ना ही लोकतंत्र के हित में होगा।
