पंजाब में सरकारी अस्पतालों से डॉक्टरों का मोहभंग: सुरक्षा की कमी और कम वेतन के कारण निजी सेक्टर बना पहली पसंद, स्वास्थ्य सेवाएं बेपटरी
(विशेष रिपोर्ट: सुभाष आनंद-विनायक फीचर्स)
चंडीगढ़/फिरोजपुर: देश के सरकारी अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझते मरीजों के लिए 'दूसरा भगवान' माने जाने वाले डॉक्टर अब खुद सरकारी तंत्र से किनारा कर रहे हैं। पंजाब के सरकारी अस्पतालों की स्थिति दिन-ब-दिन चिंताजनक होती जा रही है, जहाँ डॉक्टर सरकारी नौकरी को तरजीह देने के बजाय कॉर्पोरेट और निजी अस्पतालों की ओर रुख करना ज्यादा बेहतर समझ रहे हैं। राज्य के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और स्पेशलिस्टों (विशेषज्ञों) के सैकड़ों पद खाली पड़े हैं, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है।
हर साल डिग्री लेकर निकल रहे डॉक्टर, फिर भी खाली पड़े हैं पद
हैरानी की बात यह है कि पंजाब में हर साल बड़ी संख्या में एमबीबीएस (MBBS), बीडीएस (BDS), होम्योपैथी और आयुर्वेदिक डॉक्टर अपनी पढ़ाई पूरी करके निकल रहे हैं। इसके बावजूद सरकारी चिकित्सा केंद्रों में स्टाफ की भारी किल्लत है। डॉक्टरों का साफ तौर पर कहना है कि राज्य सरकार की वर्तमान नीतियां और कार्यप्रणाली ऐसी है कि वे सरकारी नौकरी में खुद को पूरी तरह से असुरक्षित और उपेक्षित महसूस करते हैं।
'राम भरोसे' डॉक्टरों की सुरक्षा, कानून बनने के बाद भी धरातल शून्य
सिविल अस्पतालों में ऑन-ड्यूटी डॉक्टरों की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। डॉक्टरों के साथ मारपीट, गाली-गलौज, मानसिक प्रताड़ना और प्रशासनिक दबाव अब आम बात हो चुकी है। हालाँकि, सरकार ने अस्पतालों में कड़े सुरक्षा गार्ड तैनात करने के बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन धरातल पर कुछ भी नजर नहीं आता।
राज्य में 'पंजाब प्रोटेक्शन फॉर मेडिकेयर पर्सन एंड मेडिकेयर इंस्टीट्यूशन बिल' लागू हुए कई साल बीत चुके हैं, लेकिन डॉक्टरों पर होने वाले हमलों पर पुलिसिया कार्रवाई न के बराबर है। हाल ही में फिरोजपुर सिविल अस्पताल में सीनियर मेडिकल अफसर (SMO) का पद सालों से खाली होने के बाद जब एक डॉक्टर की पदोन्नति की गई, तो उन्होंने पद संभालने से इंकार कर दिया। इसका मुख्य कारण राजनीतिक हस्तक्षेप और स्थानीय यूनियनों का अत्यधिक दबाव बताया जा रहा है। इसी दबाव के चलते कई नामचीन विशेषज्ञ डॉक्टर सरकारी सेवा से इस्तीफा देकर निजी प्रैक्टिस शुरू कर चुके हैं।
क्यों निजी सेक्टर की तरफ भाग रहे हैं डॉक्टर?
सरकारी नौकरियों को छोड़कर प्राइवेट कॉर्पोरेट अस्पतालों की तरफ जाने के पीछे डॉक्टरों ने मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण बताए हैं:
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अत्यधिक वर्कलोड बनाम बेहतर पैकेज: सरकारी अस्पतालों में एक-एक डॉक्टर पर रोजाना सैकड़ों ओपीडी (OPD) मरीजों का बोझ होता है, जबकि निजी अस्पतालों में वर्कलोड सीमित रहता है और वेतन पैकेज सरकारी की तुलना में कई गुना बेहतर होता है।
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वीआईपी ड्यूटी और बॉन्ड की मजबूरी: सरकारी डॉक्टरों को अक्सर वीआईपी ड्यूटी और कड़े बॉन्ड नियमों के तहत काम करना पड़ता है। जैसे ही डॉक्टरों का अनिवार्य बॉन्ड पीरियड पूरा होता है, वे तुरंत इस्तीफा दे देते हैं।
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पेंशन का बंद होना और कम सैलरी: नए डॉक्टरों को सरकारी स्तर पर बेहद सीमित वेतन दिया जा रहा है। इसके अलावा, सरकार ने नई भर्तियों के लिए पेंशन योजना भी बंद कर दी है, जिससे सरकारी नौकरी का आकर्षण खत्म हो गया है।
बुनियादी ढांचे की कमी: वेंटिलेटर हैं, पर चलाने वाले नहीं
पंजाब सरकार ग्रामीण क्षेत्रों की पुरानी डिस्पेंसरियों को बंद करके उनके स्थान पर 'आम आदमी क्लीनिक' (मोहल्ला क्लीनिक) खोल रही है। फिरोजपुर जैसे सीमावर्ती जिलों में चलने वाली 'आई मोबाइल टीम' भी अब बंद हो चुकी है। पीजीआई (PGI) का सैटेलाइट सेंटर बनाने का काम तो तेजी पर है, लेकिन डॉक्टरों की कमी सबसे बड़ा रोड़ा बनी हुई है।
आज आलम यह है कि सरकारी अस्पतालों में न्यूरोसर्जन और प्लास्टिक सर्जन जैसे क्रिटिकल स्पेशलिस्ट नाममात्र के हैं। कई जिला अस्पतालों में महंगे वेंटिलेटर और आधुनिक मशीनें तो धूल फांक रही हैं, लेकिन उन्हें ऑपरेट करने के लिए टेक्नीशियन और मैकेनिकों के पद ही स्वीकृत नहीं हैं। इसका खामियाजा गरीब मरीजों को भुगतना पड़ता है, जिन्हें मजबूरी में महंगे निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है जहाँ उनका आर्थिक शोषण होता है।
"कमियों को जल्द दूर किया जाएगा" – स्वास्थ्य मंत्री बलवीर सिंह
इस पूरे मामले पर पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. बलवीर सिंह का कहना है कि सरकार राज्य में डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए पूरी तरह गंभीर है। डॉक्टरों की नई भर्ती के लिए जल्द ही सीधे इंटरव्यू की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि आम आदमी क्लीनिकों में बेहतरीन डॉक्टर तैनात किए गए हैं और युवा डॉक्टरों का रुझान एक बार फिर सरकारी नौकरियों की तरफ बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार डॉक्टरों की सुरक्षा, अत्यधिक वर्कलोड, कम वेतन और राजनीतिक दबाव जैसे बुनियादी मुद्दों को गंभीरता से हल नहीं करेगी, तब तक सरकारी डॉक्टरों का पलायन रोकना नामुमकिन होगा। यदि डॉक्टर ही खुद को असुरक्षित और तनाव में महसूस करेंगे, तो वे मरीजों को बेहतर इलाज कैसे दे पाएंगे?

