सामाजिक सद्भाव को खतरे में डालती विघटनकारी शक्तियां

Disruptive forces endangering social harmony
 
सामाजिक सद्भाव को खतरे में डालती विघटनकारी शक्तियां

(लेखक: डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)

देश के वर्तमान परिदृश्य पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए यह लेख समाज में बढ़ती अलगाववादी प्रवृत्तियों और राजनीतिक स्वार्थों के गठजोड़ पर प्रहार करता है। लेखक के अनुसार, आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती वे तत्व हैं जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुखौटा पहनकर अराजकता फैला रहे हैं।

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राजनीतिक स्वार्थ और 'किराये' के प्रदर्शनकारी

लेख में इस बात पर गहरा क्षोभ प्रकट किया गया है कि राजनीतिक दल जन-समस्याओं के समाधान के बजाय केवल अपना अस्तित्व बचाने में जुटे हैं।

  • भीड़ का व्यावसायीकरण: आज धरना-प्रदर्शनों में वास्तविक आक्रोश के बजाय किराये के प्रदर्शनकारी जुटाने का चलन बढ़ गया है। गरीब मजदूरों को यह तक पता नहीं होता कि उनके हाथ में थमाई गई विरोध पट्टिका पर क्या लिखा है और वे किसका विरोध कर रहे हैं।

  • दोमुंहे सांपों की राजनीति: राजनीति में ऐसे तत्वों की बाढ़ आ गई है जो केवल अपने स्वार्थ के आधार पर घटनाओं का चयन करते हैं। जहाँ राजनीतिक लाभ दिखता है, वहां ये सक्रिय हो जाते हैं और जहाँ स्वार्थ सिद्ध नहीं होता, वहां चुप्पी साध लेते हैं।

जातीय संकीर्णता और सामाजिक दरार

शिक्षण संस्थानों से लेकर सामाजिक क्षेत्रों तक, हर छोटी-बड़ी घटना को जातीय रंग देने की कोशिश की जा रही है।

  • षड्यंत्रकारी तत्व: आम आदमी को मंदिर, मस्जिद या किसी पूजा पद्धति से कोई विरोध नहीं है, लेकिन समाज में सक्रिय विघटनकारी शक्तियां हर घटना में धर्म और जाति ढूँढकर नागरिकों को आपस में भिड़ाने का षड्यंत्र रचती हैं।

  • कार्यपालिका की सुस्ती: लेख में कार्यपालिका और संवैधानिक न्याय प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। अराजकता फैलाने वालों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्यवाही न होना, अपराधियों के हौसले बुलंद कर रहा है।

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