फेशियल चेहरे का ही नहीं, व्यक्तित्व का भी कीजिए
विवेक रंजन श्रीवास्तव – विभूति फीचर्स
दीपावली आते ही घरों में सफाई का ऐसा शंखनाद होता है कि कोने-कोने की शामत आ जाती है। साल भर जिस कबाड़ को हाथ लगाना भी गुनाह समझा जाता रहा, वह अचानक आंखों की किरकिरी बन जाता है। पुराने अखबार, टूटे खिलौने, बेकार तार और न जाने कितनी ऐसी चीजें, जिन्हें किसी शुभ मुहूर्त में काम आने की उम्मीद से सहेजकर रखा गया था, अब घर से बाहर का रास्ता देखने लगती हैं। श्रीमती जी को इस कबाड़ से भी कुछ कमाई की उम्मीद होती है, इसलिए कबाड़ी का इंतजार शुरू हो जाता है। हर कोई झाड़ू लेकर मैदान में उतर पड़ता है और मोहल्ले के कूड़ाघर की क्षमता जवाब देने लगती है।
उधर, श्रीमान जी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगती हैं। उन्हें डर सताता है कि कहीं सफाई अभियान के नाम पर उनकी गोपनीय अलमारी न खुल जाए।
श्रीमती जी ने इस बार साफ फरमान सुना दिया कि घर का कोना-कोना चमकना चाहिए। श्रीमान जी ने मुंह लटकाकर कहा, “पिछले साल भी तो सफाई हुई थी।”
जवाब मिला, “पिछले साल घर चमका था, इस बार सबकी करतूतों पर जमी धूल भी झाड़ी जाएगी।”
यह सुनते ही श्रीमान जी के मुंह में दही जम गया। वे कुछ कहते भी तो क्या कहते! पत्नी के सामने ज्यादा जुबान चलाने का परिणाम वे पहले भी भुगत चुके थे। लिहाजा, मुंह की खाने से बेहतर उन्हें झाड़ू उठाकर कर्मयोगी बनना लगा।
बाजारों में भी चल रहा है सौंदर्य महोत्सव
इधर बाजारों में दीपावली का सौंदर्य महोत्सव चल रहा है। दुकानों का मेकओवर हो रहा है, सड़कों का मेकअप किया जा रहा है और दीवारों पर रंग-रोगन की ऐसी परत चढ़ रही है कि पुरानी बदसूरती मुंह छिपाती फिर रही है।
नगर की कुछ सड़कों पर अचानक सफाई देखकर नागरिकों के मुंह में घी-शक्कर घुलने लगती है। मगर कूड़े के ढेर से जरा-सा पर्दा हटते ही शहर की पुरानी तस्वीर फिर सामने आ जाती है। लगता है, सफाई ने भी ठान लिया है कि कुछ दिनों के लिए ही सही, शहर को दिखाने लायक बना दिया जाए।
राजनीति में सफाई का अपना ही अंदाज
राजनीति में सफाई का खेल तो और भी निराला है। नेता जी मंच से भ्रष्टाचार पर झाड़ू फेरने की घोषणा करते हैं। उनके मुंह से फूल झड़ते हैं, लेकिन जैसे ही उनके अपने कर्मों की फाइल खुलती है, दूध का दूध और पानी का पानी होने लगता है।
विरोधियों का मुंह काला करने में उन्हें महारत हासिल है, मगर अपने गिरेबान में झांकने की बारी आए तो सांप सूंघ जाता है। सवाल पूछिए तो मुंह पर ताला लग जाता है। सच सामने रखिए तो बगलें झांकने लगते हैं। और जब जनता हिसाब मांगती है, तब वही नेता जी मुंह छिपाते फिरते हैं।
वाह रे सफाई अभियान! कूड़ा हटाने से पहले कूड़ा फैलाने वालों की पहचान कौन करेगा?
मन के कचरे की सफाई भी जरूरी
सच तो यह है कि सफाई का सबसे बड़ा दुश्मन घर का कूड़ा नहीं, बल्कि मन का कचरा है। ईर्ष्या की धूल, अहंकार के जाले, स्वार्थ की चिकनाई और छल की कालिख चेहरे पर किए जाने वाले किसी फेशियल से नहीं उतरती।
किसी का हक मारकर, किसी को अपमानित करके और फिर दीप जलाकर पुण्य का हिसाब बराबर नहीं किया जा सकता। दूसरों को उपदेश देना आसान है, लेकिन अपनी बुरी आदतों पर झाड़ू फेरना कठिन।
इस दीपावली घर चमकाइए, गलियां संवारिए और शहर को स्वच्छ बनाइए। मगर अपना कूड़ा पड़ोसी के दरवाजे पर डालकर अपनी पीठ मत थपथपाइए। रिश्तों पर जमी धूल भी झाड़िए, कटु वचनों की गंदगी भी हटाइए और किसी जरूरतमंद के जीवन में आशा का दीप भी जलाइए।
आखिर चेहरे पर चमक हो और चरित्र पर कालिख, तो ऐसी सुंदरता किस काम की? लक्ष्मी जी के स्वागत में घर का दरवाजा खुला रखिए, लेकिन मनुष्यता के प्रवेश पर मुंह मत फेरिए।
इस दीपावली फेशियल चेहरे का ही नहीं, व्यक्तित्व का भी कीजिए। क्योंकि असली उजाला दीये की लौ से शुरू जरूर होता है, लेकिन उसकी सार्थकता मन, वचन और कर्म की सफाई से ही पूरी होती है।
— विवेक रंजन श्रीवास्तव | विभूति फीचर्स
