मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, लखनऊ के डॉक्टरों ने एक्यूट बड–कियारी सिंड्रोम का सफल इलाज किया; उन्नत DIPS प्रक्रिया से लिवर ट्रांसप्लांट टला
प्रयागराज निवासी सुश्री प्रेमा यादव को अत्यधिक कमजोरी, तेजी से बढ़ता पीलिया, पेट और पैरों में सूजन तथा लगातार उल्टी की शिकायत के साथ अस्पताल की इमरजेंसी में लाया गया। जांच में एक्यूट बड–कियारी सिंड्रोम की पुष्टि हुई। यह एक गंभीर स्थिति होती है, जिसमें लिवर से खून बाहर ले जाने वाली नसों में अचानक रुकावट या रक्त का थक्का बन जाता है, जिससे लिवर फेल होने का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। गंभीर मामलों में अक्सर लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र स्थायी उपचार माना जाता है।
मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए विभिन्न विशेषज्ञों की तत्काल सलाह के बाद डॉक्टरों की टीम ने उन्नत और बिना बड़ी सर्जरी वाली प्रक्रिया — डायरेक्ट इंट्राहेपेटिक पोर्टोसिस्टमिक शंट (DIPS) — करने का निर्णय लिया। इस प्रक्रिया में लिवर के भीतर एक नया मार्ग बनाया जाता है, जिससे रक्त प्रवाह सामान्य हो सके और लिवर पर बढ़ा हुआ दबाव कम किया जा सके।
यह प्रक्रिया अस्पताल की इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी और गैस्ट्रोसर्जरी टीम द्वारा सफलतापूर्वक की गई। टीम में डॉ. अजय यादव, निदेशक एवं प्रमुख – गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जरी एवं रोबोटिक जीआई सर्जरी; डॉ. शाहबाज़ मोहम्मद खान, एसोसिएट डायरेक्टर – इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी; तथा डॉ. स्विश कुमार सिंह, सीनियर कंसल्टेंट – इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी शामिल रहे।
टीमवर्क के महत्व पर जोर देते हुए डॉ. अजय यादव ने कहा, “इस मामले में लिवर की तेजी से बिगड़ती स्थिति को समय पर पहचानना और सभी विशेषज्ञों का समन्वित प्रयास बेहद जरूरी था। समय पर DIPS प्रक्रिया करने से मरीज का लिवर स्थिर हुआ और तत्काल ट्रांसप्लांट की आवश्यकता नहीं पड़ी। ऐसी अंग-संरक्षण वाली प्रक्रियाएं गंभीर लिवर रोगों में बेहतर परिणाम दे रही हैं।”
डॉ. शाहबाज़ मोहम्मद खान ने बताया, “मरीज की स्थिति तेजी से लिवर फेल होने की ओर बढ़ रही थी। शरीर में अत्यधिक द्रव संचय हो चुका था और लिवर की जांच रिपोर्ट लगातार बिगड़ रही थी। लिवर के भीतर नया मार्ग बनाकर हमने दबाव कम किया, रक्त प्रवाह सामान्य किया और स्थायी क्षति से बचा लिया।”
डॉ. स्विश कुमार सिंह ने कहा, “तीव्र बड–कियारी सिंड्रोम दुर्लभ है और इसके लक्षण कई बार अन्य लिवर रोगों से मिलते-जुलते होते हैं, जिससे पहचान में देरी हो सकती है। समय पर सही जांच और विशेषज्ञ केंद्र में रेफरल जीवनरक्षक सिद्ध हो सकता है। यह मामला दर्शाता है कि उन्नत इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी के माध्यम से गंभीर रक्तवाहिनी संबंधी लिवर रोगों का इलाज बिना प्रत्यारोपण भी संभव है।”
मरीज की हालत में तेजी से सुधार हुआ और उन्हें तीन दिन के भीतर स्थिर अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई — बिना लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता के।
यह सफलता जटिल लिवर बीमारियों के उपचार में उन्नत इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करती है और अंग-संरक्षण आधारित आधुनिक उपचार देने की अस्पताल की प्रतिबद्धता को और मजबूत करती है।
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