महंगाई की दोहरी मार: पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों के बीच कैसे संभलेगी आम आदमी की रसोई और जिंदगी?
विशेष वैचारिक आलेख — (लेखक: डॉ. सुधाकर आशावादी)
एक पुरानी और बेहद सटीक कहावत है— "खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर, कटना खरबूजे को ही पड़ता है।" आज के दौर में देश का आम आदमी ठीक इसी खरबूजे की स्थिति में पहुंच गया है। सत्ता के सिंहासन पर चाहे कोई भी काबिज हो, आर्थिक मोर्चे पर अंतिम प्रहार हमेशा सामान्य नागरिक पर ही होता है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की मूल्य-निर्धारण नीतियां और उनके फैसले अक्सर आम उपभोक्ता की समझ से परे होते हैं। महज 11 दिनों के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार की गई बढ़ोतरी ने मध्यम और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों की कमर तोड़कर रख दी है।
ईंधन की कीमतों में होने वाले इस इजाफे का सीधा और तात्कालिक असर देश के लॉजिस्टिक्स (यातायात), थोक बाजार और हर परिवार के मासिक बजट पर पड़ता है। इस मार को सबसे ज्यादा वो वर्ग झेलता है जो रोज कमाता और खाता है, जबकि नीति निर्माताओं और रसूखदार अभिजात्य वर्ग को बाजार की इस जमीनी कड़वाहट से शायद ही कोई सीधा सरोकार होता है।
आय और खर्च का बिगड़ता संतुलन
महंगाई का बढ़ना तब तक असहनीय नहीं होता, जब तक व्यक्ति की आय के साधनों और उसके रोजमर्रा के खर्चों के बीच एक स्वस्थ तालमेल बना रहे। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में घरेलू गैस (LPG) के दामों में बेतहाशा वृद्धि के साथ-साथ डीजल और पेट्रोल के दामों में बार-बार होने वाली बढ़ोतरी ने आम आदमी के सामने अपने अस्तित्व को बचाए रखने का एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि पेट्रोलियम पदार्थों की बिक्री आज केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों के लिए राजस्व (कमाई) का सबसे बड़ा और आसान जरिया बन चुकी है।
टैक्स की राजनीति और आम जनता की बेबसी
कड़वा सच: यदि सरकारें वास्तव में जनहित को सर्वोपरि मानतीं, तो टैक्स (VAT और एक्साइज ड्यूटी) की दरों में कटौती करके जनसाधारण को इस भीषण महंगाई से तुरंत राहत दे सकती थीं। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है।
सड़कों पर महंगाई का विरोध करने वाले कुछ राजनीतिक दल जिन राज्यों में सत्ता में हैं, वहां अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक टैक्स वसूला जा रहा है। यही कारण है कि देश के अलग-अलग राज्यों में ईंधन की कीमतों में एक बड़ा अंतर देखने को मिलता है, जिससे जनता के भीतर का असंतोष और बढ़ता है।
लोक-कल्याणकारी राज्य की असल जिम्मेदारी
किसी भी लोकतांत्रिक और लोक-कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की परिकल्पना में जनता और उसका हित सबसे ऊपर होना चाहिए। एक आम नागरिक बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक व्यवधान या मानसिक तनाव के अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को सुचारू रूप से चलाना चाहता है।
इसके लिए यह नितांत आवश्यक है कि केंद्र और राज्यों की सरकारें अपनी राजनीतिक खींचतान से ऊपर उठें और आम आदमी की दिनचर्या को सुलभ बनाने में अपना सकारात्मक योगदान दें। सरकारों को केवल राजस्व बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय बुनियादी उपभोक्ता वस्तुओं के दामों और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए कड़े व प्रभावी कदम उठाने चाहिए, ताकि देश के असल आधार— 'आम आदमी' को कुछ राहत मिल सके।
