डॉ. अंबेडकर जयंती: प्रतीकात्मक उत्सव या आत्ममंथन की जरूरत?
लेखक: आचार्य सुनील दास (संस्थापक, गुरु रविदास जागृति मिशन चैरिटेबल ट्रस्ट एवं गुरु रविदास सरोवर, जुंडला, करनाल)
हर साल 14 अप्रैल को समूचा भारत बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाता है। नीले झंडों, गगनभेदी नारों और भव्य रैलियों के बीच एक सवाल जो हर साल मौन रह जाता है, वह यह है कि—क्या हम वास्तव में उनके सिद्धांतों को जी रहे हैं, या हमने उनके व्यक्तित्व को केवल एक वार्षिक उत्सव तक सीमित कर दिया है?
नारों से परे: एक जीवन, एक क्रांति
डॉ. अंबेडकर का जीवन मात्र भाषणों या तस्वीरों का संग्रह नहीं था; वह एक विचारधारा और क्रांति का जीवंत उदाहरण था। उन्होंने एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की थी जहाँ व्यक्ति की पहचान उसकी जाति या धर्म से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, चरित्र और कर्मों से हो। उन्होंने मानवता को सर्वोपरि माना और ज्योतिराव फुले, पेरियार और कबीर जैसे महान समाज सुधारकों के मार्ग को प्रशस्त किया।
दिखावा बनाम सिद्धांत: कहाँ है कमी?
आज बाबासाहेब के नाम पर मूर्तियाँ लगाना और सोशल मीडिया पर पोस्ट डालना बहुत आसान हो गया है, लेकिन उनके बताए "शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो" के मंत्र को जीवन में उतारना आज भी एक चुनौती बना हुआ है।
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शिक्षा: क्या हमने वास्तव में समाज के अंतिम छोर पर खड़े बच्चे के हाथ में किताब पहुँचाई है? क्या हमारे गाँवों और मोहल्लों में पुस्तकालय या कोचिंग सेंटर उतने ही हैं जितने कि स्मारक?
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दिखावा: आज जयंती के अवसर पर डीजे और गाड़ियों के शोर में बाबासाहेब के गहरे विचारों की गूँज कहीं खोती जा रही है। विचारों की गहराई के बिना प्रदर्शन मात्र एक खोखला उत्सव है।
जातिवाद: विरोध या केवल भाषण?
सबसे कड़वा सच यह है कि हम मंचों से जातिवाद का विरोध तो खूब करते हैं, लेकिन क्या हमारे व्यक्तिगत जीवन में यह सोच बदली है?
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क्या हमने अपने परिवारों में जातिगत दीवारों को ढहाया है?
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क्या हम आज भी अपने और अपने बच्चों के रिश्तों को जाति के दायरे में ही देखते हैं?
विडंबना यह है कि जाति व्यवस्था का विरोध करने वाले लोग भी अक्सर अपने से "नीची जाति" ढूँढकर श्रेष्ठता का दंभ पालते हैं। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, कोई भी नारा समाज को वास्तव में नहीं बदल पाएगा।
वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत खुद से
डॉ. अंबेडकर ने कभी अपने नाम के प्रचार की कामना नहीं की। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि सच्चा काम करने वालों को पहचान की जरूरत नहीं होती, उनका कार्य ही बोलता है। आज हमें "जय भीम" बोलने के साथ-साथ उनके मूल्यों को व्यवहार में लाने की आवश्यकता है।
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आत्ममंथन: हमें खुद से पूछना होगा कि क्या हम वास्तव में समानता में विश्वास करते हैं या यह केवल भाषणों तक सीमित है?
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मानवता का पुजारी: बाबासाहेब को किसी एक वर्ग या जाति के दायरे में बांधना उनके विराट व्यक्तित्व का अपमान है। वे एक महान अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता और मानवता के उपासक थे।
संकल्प का दिन: 14 अप्रैल
डॉ. अंबेडकर की जयंती केवल एक छुट्टी का दिन या उत्सव नहीं, बल्कि संकल्प का दिन होना चाहिए।
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शिक्षा का विस्तार: संसाधनों के अभाव में पीछे रह रहे बच्चों की मदद करना।
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मानसिकता का परिवर्तन: अपने भीतर छिपे सूक्ष्म जातिवाद को पहचानना और उसे समाप्त करना।
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समानता का व्यवहार: न्याय को कागजों से निकालकर अपने आचरण में लाना।
समाज बदलना आसान है, लेकिन खुद को बदलना सबसे कठिन। यदि हमारी कोशिश से एक बच्चा शिक्षित हो जाता है या एक परिवार भेदभाव से मुक्त हो जाता है, तो वही बाबासाहेब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आइए, इस जयंती पर दिखावे को छोड़कर विचारों की क्रांति को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।

