कर्नाटक से गोण्डा आईं डॉक्टर अनीता मिश्रा, अवधी बोलने के अंदाज ने जीता लोगों का दिल
गोण्डा। कर्नाटक के मंगलौर से उत्तर प्रदेश के गोण्डा तक का सफर तय करने वाली डॉ. अनीता मिश्रा आज सिर्फ अपनी चिकित्सा सेवा के लिए ही नहीं, बल्कि स्थानीय अवधी भाषा से अपने जुड़ाव के कारण भी चर्चा में हैं। कन्नड़ लहजे में अवधी बोलने का उनका सहज अंदाज सोशल मीडिया पर लोगों को खूब पसंद आ रहा है। स्थानीय मरीजों से अवधी में बातचीत करते हुए उनका वीडियो वायरल होने के बाद वह इंटरनेट पर चर्चा का विषय बन गई हैं।
डॉ. अनीता मिश्रा ने AapkiKhabar के पॉडकास्ट में अपने निजी जीवन, गोण्डा से जुड़ाव और अवधी सीखने के अनुभव साझा किए। उनके लिए अवधी सिर्फ मरीजों से बातचीत का माध्यम नहीं है, बल्कि अब यह भाषा उनकी जिंदगी और स्थानीय पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
मरीजों की अवधी ने सिखाई स्थानीय भाषा
डॉ. अनीता के सामने गोण्डा आने के बाद सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय भाषा को समझने की थी। शुरुआत में उन्हें हिंदी समझने में भी परेशानी होती थी। लेकिन लगातार मरीजों से संवाद के दौरान उन्होंने हिंदी सीखी और धीरे-धीरे अवधी को भी समझना शुरू किया।
स्थानीय मरीज जब अपनी बीमारी और तकलीफ को अवधी में बताते थे तो कई शब्द उनके लिए बिल्कुल नए होते थे। मसलन, शरीर में दर्द या परेशानी बताने के लिए मरीज ऐसे स्थानीय शब्दों का इस्तेमाल करते थे जिन्हें पहली बार सुनकर समझना आसान नहीं था।
एक मरीज के मुंह से “कनवा कुकुआत है, नटई कुकियात है” जैसे शब्द सुनकर डॉक्टर भी कुछ देर के लिए हैरान रह गई थीं। बाद में स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें इन शब्दों का अर्थ समझ आया। यही स्थानीय भाषा और मरीजों के बोलने का अंदाज उनके वीडियो की खासियत बन गया।
वायरल वीडियो के पीछे था एक खास संदेश
डॉ. अनीता के मुताबिक, वीडियो बनाने का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं था। वह चाहती हैं कि लोग अपनी स्थानीय भाषा या बोली बोलने में झिझक महसूस न करें।उनका मानना है कि बच्चों को अपनी मातृभाषा और स्थानीय बोली से जोड़ना जरूरी है। यदि घर में बच्चे अवधी बोलते हैं तो उन्हें केवल इसलिए रोकना नहीं चाहिए कि हिंदी या अंग्रेजी ज्यादा आधुनिक लगती है।उनके अनुसार, किसी भी भाषा को सम्मान देने का पहला कदम उसे आत्मविश्वास के साथ बोलना है।
मंगलौर से गोण्डा पहुंचने की कहानी
डॉ. अनीता मिश्रा का जन्म और शुरुआती जीवन कर्नाटक के मंगलौर में बीता। बचपन से ही उनका सपना डॉक्टर बनने का था। मेडिकल शिक्षा के दौरान उनकी मुलाकात उत्तर प्रदेश के गोण्डा निवासी डॉ. पुण्योदय मिश्रा से हुई। दोनों के बीच दोस्ती हुई और बाद में दोनों ने विवाह कर लिया।
शादी के बाद अनीता उत्तर प्रदेश आईं और गोण्डा को अपनी कर्मभूमि बनाया। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने वर्ष 2000 में राजीव गांधी यूनिवर्सिटी से एमएस की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वर्ष 2005 में उन्होंने और उनके पति ने गोण्डा में अपना निजी नर्सिंग होम शुरू किया।यहीं मरीजों के साथ लगातार संवाद करते हुए उन्होंने स्थानीय भाषा और संस्कृति को करीब से जाना।
मरीज की भाषा समझना भी इलाज का हिस्सा
डॉ. अनीता का मानना है कि डॉक्टर और मरीज के बीच भरोसा बेहद जरूरी है। कई बार मरीज मेडिकल भाषा में अपनी समस्या नहीं बता पाता, लेकिन अपनी स्थानीय बोली में वह शरीर की तकलीफ को कहीं बेहतर तरीके से समझा देता है।
खासकर महिला मरीजों के मामले में यह संवाद और महत्वपूर्ण हो जाता है। जब मरीज डॉक्टर के सामने सहज महसूस करता है तो वह अपनी बीमारी से जुड़ी बातों के साथ कई व्यक्तिगत परेशानियां भी खुलकर साझा कर सकता है।इसीलिए डॉ. अनीता के लिए मरीज की भाषा समझना केवल संवाद का विषय नहीं, बल्कि बेहतर चिकित्सा सेवा का हिस्सा भी है।
'अवधी में बीमारी के लक्षण भी कविता जैसे लगते हैं'
डॉ. अनीता ने अवधी की खूबसूरती का जिक्र करते हुए बताया कि इस भाषा में बीमारी और दर्द को व्यक्त करने का अंदाज बेहद भावपूर्ण है।मरीज जब शरीर के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली परेशानी को स्थानीय शब्दों में बताते हैं तो कई बार उन्हें ऐसा लगता है जैसे बीमारी के लक्षण नहीं, बल्कि कोई कविता सुनाई जा रही हो।शुरुआत में जिन शब्दों को समझना उनके लिए चुनौती था, वही शब्द बाद में उनकी पहचान का हिस्सा बन गए।
2003 से अब तक गोण्डा में महसूस किया बदलाव
डॉ. अनीता ने गोण्डा में पिछले दो दशकों के दौरान सामाजिक सोच में आए बदलाव का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, वर्ष 2003 के आसपास बेटियों को लेकर समाज में कई जगह नकारात्मक सोच देखने को मिलती थी।
उन्होंने बताया कि समय के साथ लड़कियों की शिक्षा और उनके भविष्य को लेकर परिवारों की सोच में सकारात्मक बदलाव आया है। उनके अनुभव में अब पहले की तुलना में बेटियों को लेकर जागरूकता अधिक दिखाई देती है।
उनका मानना है कि शिक्षा और जागरूकता के विस्तार ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जरूरतमंद बेटियों की पढ़ाई में करती हैं मदद
डॉ. अनीता ने यह भी बताया कि वह ग्रामीण क्षेत्र की कुछ बेटियों की शिक्षा में अपनी ओर से सहयोग करती हैं। फीस के अलावा किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य शैक्षणिक जरूरतों में मदद करने का प्रयास करती हैं।उनका मानना है कि किसी बच्ची को शिक्षा का अवसर देना उसके पूरे भविष्य को बदल सकता है। बेटियों को अवसर मिलें तो वे परिवार के साथ-साथ समाज और देश का नाम भी रोशन कर सकती हैं।
'बड़े शहर में पहचान से ज्यादा जरूरी है लोगों का भरोसा'
डॉ. अनीता का मानना है कि किसी डॉक्टर की सफलता का पैमाना केवल महानगर में नौकरी या बड़ी पहचान नहीं होनी चाहिए।
छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने पर डॉक्टर को लोगों के साथ सीधे जुड़ने और लंबे समय तक उनका भरोसा हासिल करने का अवसर मिलता है। गोण्डा में मिले लोगों के प्यार और अपनापन को वह अपनी बड़ी उपलब्धियों में गिनती हैं।
मेडिकल प्रोफेशन के साथ मॉडलिंग और कला में भी पहचान
डॉ. अनीता मिश्रा की पहचान केवल डॉक्टर के तौर पर नहीं है। वह सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहती हैं और अपने जीवन के अलग-अलग पहलुओं से जुड़े वीडियो साझा करती हैं। वह कथक में भी रुचि रखती हैं और समय-समय पर प्रस्तुतियां देती हैं। इसके अलावा वह खुद के अनुसार मिसेज इंडिया और मिसेज एशिया प्रतियोगिताओं में खिताब जीतने का अनुभव भी साझा करती हैं। इस तरह चिकित्सा के साथ कला, फिटनेस और सामाजिक गतिविधियां भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं।
'अपनी भाषा बोलने में शर्म नहीं, गर्व होना चाहिए'
अवधी को लेकर डॉ. अनीता का संदेश बेहद स्पष्ट है। उनका कहना है कि स्थानीय भाषा बोलने में किसी को संकोच नहीं करना चाहिए।
उनके मुताबिक, बच्चों को अंग्रेजी और हिंदी सीखने के साथ अपनी मातृभाषा तथा स्थानीय बोली से भी जुड़े रहना चाहिए। भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी क्षेत्र की संस्कृति, इतिहास और भावनाओं को भी अपने भीतर समेटे रहती है।
गोण्डा ने बनाया 'अपनी बहू'
कर्नाटक से आईं डॉ. अनीता अब गोण्डा में खुद को बाहरी नहीं मानतीं। यहां के लोगों ने जिस तरह उन्हें अपनाया, वह उनके लिए बेहद भावुक अनुभव है।स्थानीय लोगों का अपनापन और रिश्तों के जरिए उन्हें संबोधित करना उन्हें यह महसूस कराता है कि उन्होंने गोण्डा को केवल कर्मभूमि नहीं, बल्कि अपना घर बना लिया है। यही वजह है कि 'गोण्डा की बहू' के रूप में मिली पहचान उनके लिए खास मायने रखती है।
अवधी को चाहिए डिजिटल प्लेटफॉर्म
डॉ. अनीता का मानना है कि अवधी भाषा में फिल्मों, गानों और डिजिटल कंटेंट को बढ़ावा देने की जरूरत है। उनका कहना है कि भोजपुरी ने मनोरंजन उद्योग के जरिए देशभर में अपनी पहचान बनाई है, उसी तरह अवधी को भी बेहतर मंच मिल सकता है। उनका वायरल वीडियो इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय भाषा और संस्कृति को आधुनिक डिजिटल माध्यम से पेश किया जाए तो उसे व्यापक दर्शक वर्ग मिल सकता है।
भाषा के साथ संस्कृति से भी जुड़ने की कोशिश
डॉ. अनीता सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य संबंधी विषयों के अलावा धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों से जुड़े वीडियो भी बनाती हैं। उनका प्रयास है कि बच्चों और युवाओं को भारतीय परंपराओं और संस्कृति के बारे में भी जानकारी मिले।
उनका मानना है कि आधुनिक जीवनशैली अपनाते हुए भी नई पीढ़ी अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रह सकती है।कर्नाटक के मंगलौर से गोण्डा पहुंचीं डॉ. अनीता मिश्रा की कहानी एक वायरल वीडियो से कहीं आगे की है। मरीजों से संवाद करने के लिए सीखी गई अवधी धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गई। कन्नड़ लहजे में अवधी बोलने का उनका अंदाज लोगों को आकर्षित कर रहा है और स्थानीय भाषा को लेकर एक सकारात्मक संदेश भी दे रहा है। उनकी कहानी यह बताती है कि किसी क्षेत्र की भाषा और संस्कृति को अपनाने के लिए वहां जन्म लेना जरूरी नहीं है। सम्मान, संवाद और अपनापन हो तो कोई भी व्यक्ति उस संस्कृति का हिस्सा बन सकता है।
