भारत की साझी संस्कृति के सूत्रधार डॉ. ज़ाकिर हुसैन
(ओंकारेश्वर पांडेय - विनायक फीचर्स)
“वे इक़बाल के सपनों के पूर्ण मुसलमान थे। उनमें अरबों का जन्मजात उत्साह था और ईरानियों का वह कोमल स्वभाव जिसकी दुनिया कायल है। वे निजी मुलाकातों में अत्यंत सौम्य थे, लेकिन कार्यक्षेत्र में सक्रियता की मिसाल। वे उस ओस की बूंद की तरह थे जो गुलाब के दिल की आग को ठंडक पहुँचाती है और उस तूफान की तरह भी, जो समंदर का दिल दहला दे... वे जानते थे कि तूफानों के बीच चिराग को कैसे जलाए रखा जाता है।”
ये शब्द किसी कांग्रेसी नेता या उनके किसी करीबी सहयोगी के नहीं, बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी के हैं। आज के दौर में, जहाँ राजनीतिक संवाद अक्सर विभाजनकारी दिखाई देता है, एक वैचारिक विरोधी द्वारा दी गई यह श्रद्धांजलि डॉ. ज़ाकिर हुसैन के विराट व्यक्तित्व का प्रमाण है।

इतिहास उन्हें भारत के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में याद करता है, लेकिन उनकी असली पहचान एक शिक्षक और राष्ट्रनिर्माता की थी। उनका मानना था कि “राष्ट्रीय प्रगति का रास्ता स्कूल की इमारतों से होकर गुजरता है।” इसी सोच के साथ उन्होंने 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके नेतृत्व में जामिया केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं रहा, बल्कि ‘बौद्धिक स्वराज’ का प्रयोग बना। ब्रिटिश सहायता को अस्वीकार कर जन-सहयोग से संस्थान चलाना उस दौर में एक साहसिक कदम था। महात्मा गांधी के साथ मिलकर उन्होंने ‘नई तालीम’ की अवधारणा को आगे बढ़ाया, जिसका उद्देश्य केवल पढ़ाई नहीं बल्कि चरित्र निर्माण था।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन का जीवन साझा राष्ट्रवाद का जीवंत उदाहरण था। धार्मिक आस्था से गहरे जुड़े होने के बावजूद उन्होंने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का स्पष्ट विरोध किया। 1935 में उनका कथन था — “इसी देश की मिट्टी से हमारा निर्माण हुआ है और इसी मिट्टी में हमें वापस लौट जाना है।”
विभाजन की त्रासदी के दौरान जालंधर रेलवे स्टेशन पर एक उग्र भीड़ ने उन्हें घेर लिया था, लेकिन एक हिंदू नागरिक कुंदन लाल कपूर और एक सिख स्टेशन मास्टर ने अपनी जान जोखिम में डालकर उनकी रक्षा की। डॉ. हुसैन ने इस घटना को भारतीय समाज की अविनाशी मानवता का प्रतीक माना।
उनकी विद्वत्ता कई धाराओं का संगम थी — जर्मनी से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट, इस्लामी दर्शन का गहरा ज्ञान और गांधीवादी मूल्यों के प्रति निष्ठा। इसी समन्वय ने उन्हें समाज के हर वर्ग से संवाद करने की शक्ति दी। राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय उनके शब्द — “संपूर्ण भारत मेरा घर है और इसके लोग मेरा परिवार हैं” — आज भी भारतीय संविधान की आत्मा को अभिव्यक्त करते हैं।
आज जब पहचान की राजनीति और सामाजिक ध्रुवीकरण का दौर है, तब डॉ. ज़ाकिर हुसैन का जीवन सौम्यता, संवाद और साझा संस्कृति का महत्वपूर्ण संदेश देता है। उन्होंने कभी अपनी धार्मिक पहचान को देशभक्ति के आड़े नहीं आने दिया और न ही उसका राजनीतिक उपयोग किया।
उनके पौत्र सलमान खुर्शीद के शब्दों में, “उनके आदर्श हमें विनम्र रहने और ईमानदारी से राष्ट्र की सेवा करने की याद दिलाते हैं।”
3 मई 1969 को पद पर रहते हुए उनका निधन हो गया। वे भारत के पहले राष्ट्रपति थे जिनका निधन कार्यकाल के दौरान हुआ। लेकिन उन्होंने केवल राष्ट्रपति पद की गरिमा नहीं बढ़ाई, बल्कि भारत की साझी संस्कृति, बहुलवाद और मानवीय मूल्यों को नई ऊँचाई दी।
आज भी डॉ. ज़ाकिर हुसैन की विरासत हमें यह याद दिलाती है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता, सहअस्तित्व और साझा भविष्य की भावना में निहित है।
