द्रौपदी का कर्ज : भक्तिभाव और विश्वास की अमर कथा
यह सुनकर उत्तरा आश्चर्यचकित हो गई और विनम्र स्वर में पूछ बैठी –
“माता, आप ऐसा क्यों कह रही हैं?”
द्रौपदी ने गहरी साँस लेकर अपने जीवन का सबसे पीड़ादायक प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा जब मेरे पाँचों पति जुए के मोह में सब कुछ हार गए, तो उन्होंने मुझे भी दांव पर लगा दिया। भरी सभा में मेरा अपमान किया गया। मैंने सहायता के लिए अपने पतियों से लेकर पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और धृतराष्ट्र तक सभी को पुकारा, पर किसी ने भी मेरी ओर नहीं देखा। सभी मौन और असहाय बैठे रहे। निराश होकर अंत में मैंने श्रीकृष्ण को पुकारा और तभी वे तुरंत मेरी रक्षा के लिए प्रकट हुए।
इस घटना के पीछे भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के बीच का संवाद भी उल्लेखनीय है। जब यह अपमानजनक स्थिति उत्पन्न हो रही थी, तब द्वारका में श्रीकृष्ण अत्यंत व्यथित हो उठे। रुक्मिणी ने कारण पूछा तो उन्होंने बताया मेरी सबसे प्रिय भक्त द्रौपदी संकट में है। उसे भरी सभा में अपमानित किया जा रहा है।
रुक्मिणी ने उनसे तत्काल सहायता करने का आग्रह किया। इस पर श्रीकृष्ण बोले जब तक द्रौपदी स्वयं मुझे नहीं पुकारेगी, मैं उसके पास नहीं जा सकता। भक्त की पुकार ही मुझे बाँधती है। फिर उन्होंने रुक्मिणी को स्मरण दिलाया कि एक बार राजसूय यज्ञ के अवसर पर शिशुपाल वध के समय उनकी उंगली कट गई थी। उस समय सभी पत्नियाँ उपचार की व्यवस्था करने में व्यस्त थीं, लेकिन द्रौपदी ने बिना सोचे-समझे अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बाँध दिया था।
आज उसी ऋण को चुकाने का समय है,” श्रीकृष्ण ने कहा।जैसे ही द्रौपदी ने सच्चे हृदय से श्रीकृष्ण को पुकारा, वे तुरंत वहाँ पहुँचे और उसकी लाज की रक्षा की। Mयह प्रसंग स्पष्ट करता है कि संकट की घड़ी में सबसे बड़ा सहारा केवल ईश्वर ही हैं। द्रौपदी का यह अनुभव आज भी हमें सिखाता है कि विश्वास, समर्पण और भक्ति ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है।
॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥
