यादों की बूंदे

Drops of Memories
 
Drops of Memories

लेखिका   नीतू माथुर   

जाने हवा कैसे छू गई चेहरे को 
लहरा गई गोल घुंघराले बालों को 
जो कुछ नम कुछ इत्र से गीले थे 
भीनी खुशबू महका गई गालों को 

आँखों से पलकें उठती ढूँढती इधर उधर 
आरसी में देखती शरमाती इस कदर 
शायद मौसम में प्यार अभी बरकरार है 
दिल को छूकर नैनों को देता करार है 

अब ये बरसती बूंदे क्या कह रही हैं 
कैसे मन के तारों को छेड़ रही है 
ख़ुद किसी की याद में बरस रही हैं 
या मुझे कुछ याद दिला रही है

इन बूंदों का कुछ मक़सद तो ज़रूर है 
जन की आस ज़मीं की प्यास बुझा रही है 
ये सीप में मोती ताल में कमल खिला रही है 
ये हवा भीनी सिली सुगंध महका रही है 

बीते पलों का रश्क हो या आगे की फिकर 
वो नन्ही ख़ुशी जिसे महसूस ही नहीं किया 
वो लोग बहुत जो भाते थे चाय पे बतियाते थे
जिनके जिक्र से फ़िक्र मिट जाती थी 
ये हवा उन्हीं पलों का नज़ारा दिखा रही है 

ये मिलन है बिरहा भी सादगी सा रोमांच भी 
आशिकों की शायरी में मुहब्बत के दर्द में 
हर सुनहरे गीत की लड़ियों में इनके निशां हैं 
ये हवा ये बूँदें फिर से वही महफ़िल सजा रही है

अपने अधरों से मीठी बांसुरी बजा रही हैं 
यादों की ये बूंदे कमाल दिखा रही हैं।

लेखिका   नीतू माथुर

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