विशिष्ट बेचैनी’, ‘बेलौस मस्ती’ और कटाक्ष की कसौटी पर दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें

Dushyant Kumar's ghazals on 'Vishisht Kami', 'Belaus Masti' and presentation of sarcasm
 
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विवेक रंजन श्रीवास्तव (विभूति फीचर्स)
दुष्यन्त कुमार आधुनिक हिन्दी साहित्य के ऐसे विशिष्ट ग़ज़लकार हैं जिन्होंने ग़ज़ल को रूमानियत और शृंगार के परम्परागत दायरे से बाहर निकालकर समकालीन यथार्थ, सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक विद्रूपताओं के सशक्त माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनकी काव्य-चेतना का केन्द्र ‘आम आदमी’ की पीड़ा, आकांक्षा और संघर्ष है। इसी चेतना को स्वर देने के लिए उन्होंने हिन्दी ग़ज़ल को प्रतिरोध का औज़ार बनाया।

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दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों में व्यंग्य, कटाक्ष और तंज केवल अलंकार नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था की जड़ता, संवेदनहीनता और विडम्बनाओं पर सीधा प्रहार हैं। उनका व्यंग्य जनचेतना को झकझोरता है और पाठक को केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि आत्मावलोकन के लिए विवश करता है। इस दृष्टि से उनकी ग़ज़लों में निहित व्यंग्य का स्वरूप, विषयवस्तु और अभिव्यक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण हो उठती है।

दुष्यन्त कुमार के कटाक्ष की जड़ें उनकी गहरी सामाजिक प्रतिबद्धता में निहित हैं। उनकी ग़ज़लों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक विसंगतियों को बेबाकी से उभारने के असंख्य उदाहरण मिलते हैं। ‘साये में धूप’ जैसे संग्रह के माध्यम से वे स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडम्बनाओं को उजागर करते हैं और जनता की सुप्त संवेदनाओं को जागृत करते हैं।
उनका व्यंग्य दो स्तरों पर काम करता है—एक ओर वे शोषित जनता के प्रति करुणा और पक्षधरता रखते हैं, तो दूसरी ओर उसकी जड़ता और उदासीनता पर भी कटाक्ष करने से नहीं चूकते। इस प्रकार उनकी ग़ज़लें केवल विरोध की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि वैकल्पिक चेतना के निर्माण का छंदबद्ध आह्वान बन जाती हैं।
राजनीतिक व्यवस्था और खोखले वादों पर किया गया कटाक्ष दुष्यन्त कुमार की लोकप्रियता की सबसे बड़ी शक्ति है। उनकी अत्यंत चर्चित ग़ज़ल—
“कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए…”
राजनीतिज्ञों की कथनी और करनी के अंतर पर तीखा प्रहार है। ‘चिराग़’ यहाँ विकास, सुविधा और आश्वासन का प्रतीक है, जबकि यथार्थ यह है कि—
“कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।”
यह ग़ज़ल राजनीतिक आश्वासनों की काग़ज़ी चमक और जनता के जीवन की अँधेरी सच्चाई के बीच की खाई को उजागर करती है।
इसी तरह ग़ज़ल—
“मत कहो, आकाश में कुहरा घना है”
सामाजिक यथार्थ की कड़वी सच्चाइयों को व्यंग्यात्मक शैली में सामने रखती है। सड़क के कीचड़ और संसद की खोखली बहसों के बीच का विरोधाभास हो या वर्षों से खौलते जन-आक्रोश को ‘क्षणिक उत्तेजना’ कहकर टाल देने की प्रवृत्ति—दुष्यन्त हर स्तर पर व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करते हैं।
“दोस्तो! अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में संभावना है”
जैसी पंक्तियाँ सत्ता के केन्द्रों से आम आदमी के लगातार बाहर किए जाने की विडम्बना को रेखांकित करती हैं।
ग़ज़ल—
“वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है”
सत्ता के उस खोखले प्रतिनिधि का चित्र प्रस्तुत करती है जो स्वयं कुछ नहीं, केवल घोषणाओं और बयानों का पुलिंदा है।उसके झोले में कोई संविधान है”
जैसी पंक्ति संवैधानिक दिखावे और वास्तविक निरंकुशता के बीच के अंतर को उजागर करती है। आज भी जब नेता संविधान की प्रतियाँ लहराते दिखाई देते हैं, दुष्यन्त कुमार की यह ग़ज़ल और अधिक प्रासंगिक हो उठती है।
“कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
ग़ज़ल में आधुनिक समाज की अमानवीयता और पाखंड का भयावह चित्रण है। धर्म, कानून और नई सभ्यता के नाम पर मनुष्यता के भक्षण की प्रवृत्ति पर किया गया यह व्यंग्य आज की वीभत्स सामाजिक घटनाओं के संदर्भ में और भी तीखा प्रतीत होता है।
दुष्यन्त कुमार के व्यंग्य की प्रभावोत्पादकता उनकी भाषा-शैली में निहित है। उर्दू-हिन्दी के सहज, बोलचाल के शब्दों में उनकी ग़ज़लें एक विशिष्ट ‘बेचैनी’ और ‘बेलौस मस्ती’ लिए हुए हैं। प्रतीकों और विरोधाभासों का उनका प्रयोग—
“दरख़्तों के साये में धूप लगती है”
जैसी पंक्तियों के माध्यम से व्यवस्था की अमानवीय सच्चाई को गहरे व्यंग्य में बदल देता है।
दुष्यन्त कुमार का व्यंग्य कोरी नकारात्मकता नहीं, बल्कि रचनात्मक प्रतिरोध है। उन्होंने ग़ज़ल की कोमल तान को सामाजिक यथार्थ की कठोर जमीन पर उतार दिया। राजनीतिक खोखलेपन, सामाजिक विडम्बनाओं, नैतिक मूल्यों के क्षरण और जनता की उदासीनता पर उनकी व्यंग्य दृष्टि ने हिन्दी ग़ज़ल को नया विस्तार और गरिमा प्रदान की।
दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि उनमें चित्रित विसंगतियाँ समय के साथ और अधिक उजागर होती चली गई हैं। उनका काव्य-संसार इस बात का सशक्त प्रमाण है कि जब साहित्य जन-पक्षधर होता है, तो उसका व्यंग्य केवल विध्वंसक नहीं, बल्कि नई चेतना के निर्माण का सृजनात्मक औज़ार बन जाता है।

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