दशहरा: राम कथा जग मंगल करनी, जीवन में राम के आदर्श उतारने का पर्व
रामचरितमानस की चौपाइयों से लेकर लोकजीवन की रामधुन तक, रामकथा का संदेश तभी सार्थक होगा जब उसके आदर्श हमारे कर्म और आचरण में दिखाई देंगे
लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव | विनायक फीचर्स
“धूमउ तजइ सहज करुआई, अगर प्रसंग सुगंध बसाई।
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी, राम कथा जग मंगल करनी॥”
(बालकांड, दोहा 10 से पूर्व की चौपाई)
गोस्वामी तुलसीदास ने मंगलाचरण और वंदना के बाद अपनी विनम्रता व्यक्त करते हुए रामकथा की महिमा का वर्णन किया है। इन पंक्तियों का भाव यह है कि अगर की संगति पाकर धुआं भी अपनी स्वाभाविक कड़वाहट छोड़कर सुगंधित हो जाता है। उसी तरह तुलसीदास अपनी कविता को भले ही साधारण मानते हों, लेकिन उसमें वर्णित रामकथा की महिमा उसे लोककल्याणकारी बना देती है।
यही रामकथा की विशेषता है। उसका उद्देश्य केवल कथा सुनाना या धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाना है। दशहरा इसी संदेश को याद करने और अपने भीतर अच्छाई को मजबूत करने का अवसर है।
रामनाम की धुन में लोकजीवन की आस्था
श्रीरामचरितमानस का एक-एक शब्द अपने भीतर कोई न कोई संदेश समेटे हुए है। रामनाम की महिमा भारतीय लोकजीवन में सदियों से रची-बसी है। रामनाम के स्मरण से वाल्मीकि के जीवन में आए परिवर्तन की कथा इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। परंपरा के अनुसार, ‘मरा-मरा’ का जाप करते-करते उनके मुख से ‘राम-राम’ का उच्चारण होने लगा और वे महान ऋषि तथा आदिकवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
आज भी गांवों की चौपालों से लेकर मंदिरों और घरों तक ‘श्रीराम जय राम, जय जय राम’ की धुन सुनाई देती है। ढोल, मंजीरे और झांझ की संगत में भक्त रामनाम का स्मरण करते हैं। अनेक लोगों के लिए यह साधना मन को शांति देने, दुखों को सहने और जीवन में आशा बनाए रखने का माध्यम है।
गोस्वामी तुलसीदास ने रामभक्ति के साथ विद्या, विनय, विवेक, साहस, सत्कर्म और सत्य के महत्व को भी रेखांकित किया है। रामनाम पर विश्वास का वास्तविक अर्थ केवल उच्चारण तक सीमित नहीं, बल्कि उन मूल्यों को जीवन में अपनाना भी है, जिनका प्रतिनिधित्व भगवान राम का चरित्र करता है।
रामकथा का श्रवण ही नहीं, आचरण भी जरूरी
श्रीरामचरितमानस का पाठ घर-घर में होता है। कहीं अखंड रामायण पाठ आयोजित किए जाते हैं, तो कहीं साप्ताहिक पाठ, मास पारायण और नवान्ह पारायण की परंपरा निभाई जाती है। पाठ करने वाले ही नहीं, श्रद्धा से सुनने वाले भी इससे आत्मिक संतोष और प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
रामकथा की महत्ता तब और बढ़ जाती है, जब उसका कोई संदेश हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। भगवान राम का सत्य के प्रति आग्रह, माता-पिता के प्रति सम्मान, भाई के प्रति स्नेह, मर्यादा का पालन और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व—ये सभी ऐसे आदर्श हैं, जिनसे आज भी प्रेरणा ली जा सकती है।
यदि कोई व्यक्ति रामकथा से प्रेरित होकर अपने व्यवहार में थोड़ा भी सुधार कर ले, किसी अन्याय से दूर हो जाए या किसी जरूरतमंद की सहायता करने लगे, तो रामकथा का लोककल्याणकारी उद्देश्य पूरा होने की दिशा में एक कदम बढ़ता है। यही ‘राम कथा जग मंगल करनी’ का सार है।
परिवार से समाज और राष्ट्र तक राम के आदर्श
समाज की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति है, फिर परिवार, समाज, राष्ट्र और अंततः पूरा विश्व। यदि व्यक्ति के भीतर सत्य, संयम, करुणा, कर्तव्यनिष्ठा और विवेक जैसे गुण विकसित हों, तो उसका प्रभाव परिवार पर पड़ता है। परिवारों में परस्पर सम्मान और विश्वास बढ़े, तो समाज में कटुता और संघर्ष कम हो सकते हैं।
राम के आदर्शों से प्रेरणा लेने का अर्थ केवल किसी एक पात्र की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि अपने जीवन में उन गुणों को अपनाना है जो रिश्तों को मजबूत बनाते हैं और जिम्मेदारियों का बोध कराते हैं। परिवार में प्रेम और सम्मान, समाज में न्याय तथा राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध—इन्हीं मूल्यों से बेहतर जीवन की नींव रखी जा सकती है।
रामराज्य की कल्पना भी केवल एक आदर्श शासन व्यवस्था का नाम नहीं है। उसका भाव न्याय, लोककल्याण, उत्तरदायित्व और सबके हित की भावना से जुड़ा है। जब व्यक्ति और व्यवस्था दोनों इन मूल्यों को महत्व देंगे, तभी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को व्यापक रूप दिया जा सकेगा।
भीतर के रावण का अंत करना होगा
यदि हमें मंथरा जैसी कुटिल चालों से बचना है और अपने भीतर मौजूद रावण का अंत करना है, तो केवल राम का नाम लेना पर्याप्त नहीं होगा। हमें विवेक से काम लेना होगा, गलत प्रवृत्तियों को पहचानना होगा और अपने आचरण को सुधारना होगा।
दशहरा हमें यही अवसर देता है कि हम प्रतीकात्मक रावण-दहन के साथ अपने भीतर के अहंकार, छल, क्रोध, अन्याय और स्वार्थ पर भी विचार करें। पुतला जलाना परंपरा है, लेकिन बुराइयों को अपने व्यवहार से दूर करना उसका वास्तविक संदेश है।
रामकथा को अपनाने का मार्ग आस्था और विश्वास से भी खुलता है और उसके भावार्थ को पढ़ने, समझने तथा जीवन में उतारने से भी। जब राम के आदर्श हमारे निर्णयों, रिश्तों और कर्मों में दिखाई देने लगेंगे, तभी राम का प्राकट्य हमारे भीतर अनुभव किया जा सकेगा।
“राम जाने कि क्यों राम आते नहीं”
कवि प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव की पंक्तियां आज के समाज की विडंबनाओं की ओर ध्यान खींचती हैं—
है सिसकती अयोध्या, दुखी नागरिक,
कट गए चित्रकूटों के रमणीक वन।
स्वर्ण मृग चर रहे, दंडकारण्य को,
पंचवटियों में बढ़ गए अपहरण।
घूमते हैं असुर साधु के वेश में,
अहिल्याएं कई बन गई हैं शिला।
सारी दुनिया में फैला अनाचार है,
रुकता दिखता नहीं यह बुरा सिलसिला।
हो रहा गांव-नगरों में सीता हरण,
राम जाने कि क्यों राम आते नहीं।
इन पंक्तियों में कवि ने प्रतीकों के माध्यम से समाज में मौजूद अन्याय, छल और अनाचार पर चिंता व्यक्त की है। सवाल यह है कि जब हम राम को मर्यादा, न्याय और धर्म का प्रतीक मानते हैं, तो हमारे आसपास ऐसी बुराइयां क्यों बनी हुई हैं?
इसका उत्तर केवल किसी चमत्कार की प्रतीक्षा में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य निभाने में छिपा है। राम अपने आप नहीं आएंगे। हमें अपने भीतर उनके आदर्शों के लिए जगह बनानी होगी। जिस तरह पुत्रेष्टि यज्ञ के प्रसंग में राम के जन्म की कथा जुड़ी है, उसी तरह आज हमें भी आत्ममंथन, संयम और सत्कर्म की अग्नि में अपने अहंकार तथा दुर्गुणों को तपाना होगा।
दशहरा तभी सार्थक होगा, जब रामकथा केवल हमारे घरों और मंदिरों में नहीं, बल्कि हमारे कर्मों, व्यवहार और चरित्र में भी दिखाई देगी। तभी राम हमारे भीतर प्रकट होंगे और ‘राम कथा जग मंगल करनी’ का शाश्वत संदेश वास्तविक जीवन में साकार हो सकेगा।
#दशहरा #विजयदशमी #रामकथा #श्रीरामचरितमानस #गोस्वामीतुलसीदास #रामराज्य #रामभक्ति #सामाजिकमूल्य #विवेकरंजनश्रीवास्तव #विनायकफीचर्स

